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  • पिरखौली गौशाला के गोबर से बने 5100 दीपकों से जगमगाएगी अयोध्या, दीपोत्सव में दिखेगी गौसेवा और आत्मनिर्भरता की अनूठी मिसाल

    पिरखौली गौशाला के गोबर से बने 5100 दीपकों से जगमगाएगी अयोध्या, दीपोत्सव में दिखेगी गौसेवा और आत्मनिर्भरता की अनूठी मिसाल

    पिरखौली गौशाला के गोबर से बने 5100 दीपकों से जगमगाएगी अयोध्या, दीपोत्सव में दिखेगी गौसेवा और आत्मनिर्भरता की अनूठी मिसाल 

    रमेश सिंह सेवा संस्थान ने दीपोत्सव के लिए मुख्य विकास अधिकारी को सौंपे 5100 गोबर निर्मित दीपक, गौशालाओं को आत्मनिर्भर बनाने और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने की दिशा में उठाया महत्वपूर्ण कदम

    अयोध्या। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की नगरी अयोध्या में दीपोत्सव की तैयारियों के बीच गौसेवा, पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने वाली एक अनूठी पहल सामने आई है। रमेश सिंह सेवा संस्थान ने पिरखौली स्थित अस्थायी गौआश्रय स्थल में संरक्षित निराश्रित गोवंश के गोबर से 5100 दीपक तैयार किए हैं। इस बार ये दीपक अयोध्या के दीपोत्सव की शोभा बढ़ाने के साथ ही गौसंरक्षण और स्वदेशी उत्पादों के महत्व का संदेश भी देंगे। संस्थान की ओर से तैयार किए गए इन 5100 दीपकों को मुख्य विकास अधिकारी केके सिंह को भेंट किया गया।

    यहपहल केवल दीपोत्सव के अवसर पर दीपक उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे गौशालाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने, गोबर जैसे प्राकृतिक संसाधन का बेहतर उपयोग करने और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार की संभावनाएं विकसित करने का व्यापक उद्देश्य भी जुड़ा हुआ है। संस्थान का मानना है कि यदि गौशालाओं में उपलब्ध संसाधनों का योजनाबद्ध तरीके से उपयोग किया जाए तो निराश्रित गोवंश के संरक्षण के साथ-साथ गौशालाओं की आर्थिक स्थिति को भी मजबूत किया जा सकता है।

    दीपोत्सव के अवसर पर अयोध्या की धरती लाखों दीपों की रोशनी से जगमगाती है। ऐसे में पिरखौली गौशाला के गोबर से तैयार किए गए 5100 दीपकों का इस आयोजन से जुड़ना अपने आप में विशेष महत्व रखता है। इससे धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा के साथ प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण तथा स्वदेशी उत्पादों को प्रोत्साहित करने का संदेश भी समाज तक पहुंचेगा।

    मुख्य विकास अधिकारी ने की पहल की सराहना

    रमेश सिंह सेवा संस्थान की ओर से गोबर से तैयार किए गए 5100 दीपक मुख्य विकास अधिकारी केके सिंह को सौंपे गए। इस दौरान गौशाला में किए जा रहे नवाचार और गोबर से उपयोगी वस्तुएं तैयार करने के प्रयास की जानकारी दी गई। मुख्य विकास अधिकारी ने संस्थान के इस प्रयास की सराहना करते हुए कहा कि गोबर जैसे प्राकृतिक संसाधन का सदुपयोग करके पर्यावरण के अनुकूल उत्पाद तैयार करना एक सकारात्मक और सराहनीय पहल है।

    उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता इस बात की है कि परंपरागत संसाधनों को आधुनिक उपयोगिता से जोड़कर ऐसे उत्पाद तैयार किए जाएं, जिनसे पर्यावरण को नुकसान न पहुंचे और स्थानीय स्तर पर आर्थिक गतिविधियों को भी बढ़ावा मिले। गोबर से दीपक तैयार करना इसी सोच का उदाहरण है। इससे जहां स्वदेशी उत्पादों को प्रोत्साहन मिलेगा, वहीं गौशालाओं को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में भी मदद मिलेगी।

    मुख्य विकास अधिकारी ने इस बात पर भी जोर दिया कि सरकारी और सामाजिक संस्थाओं के सहयोग से इस प्रकार के नवाचारों को आगे बढ़ाया जाना चाहिए। गौशालाओं में संरक्षित गोवंश से प्राप्त होने वाले गोबर का उपयोग केवल पारंपरिक तरीकों तक सीमित न रखकर उससे विभिन्न उपयोगी उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं। इससे गौशालाओं के संचालन में आर्थिक सहयोग मिलने की संभावनाएं बढ़ेंगी।

    संस्थान की ओर से भेंट किए गए दीपकों के माध्यम से यह संदेश देने का प्रयास किया गया कि धार्मिक आयोजनों को सामाजिक सरोकारों और पर्यावरण संरक्षण से जोड़कर भी मनाया जा सकता है। दीपोत्सव जैसे बड़े आयोजन में स्थानीय स्तर पर तैयार प्राकृतिक उत्पादों को स्थान मिलना निश्चित रूप से अन्य संस्थाओं और गौशाला संचालकों को भी प्रेरित कर सकता है।

    गोबर को अपशिष्ट नहीं, उपयोगी संसाधन मानने की पहल

    गौशाला संचालक उत्तम सिंह ने बताया कि रमेश सिंह सेवा संस्थान का मुख्य उद्देश्य निराश्रित गोवंश का संरक्षण करने के साथ गौशालाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना है। उन्होंने कहा कि आमतौर पर गोबर को केवल कृषि कार्यों या पारंपरिक उपयोग तक ही सीमित समझा जाता है, जबकि इसका उपयोग करके अनेक प्रकार के उपयोगी उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं।

    इसी सोच के तहत पिरखौली स्थित अस्थायी गौआश्रय स्थल में गोबर से दीपक सहित विभिन्न उपयोगी वस्तुओं के निर्माण का प्रयास किया जा रहा है। संस्थान का उद्देश्य गौशालाओं में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर उपयोग करना है, ताकि गोवंश के संरक्षण के साथ-साथ गौशालाओं के संचालन के लिए अतिरिक्त आर्थिक संसाधन भी विकसित हो सकें।

    उत्तम सिंह के अनुसार, गोबर से तैयार होने वाले उत्पादों की उपयोगिता को समाज तक पहुंचाना आवश्यक है। यदि लोग ऐसे उत्पादों को अपनाते हैं तो इससे गौशालाओं को प्रोत्साहन मिलेगा और स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर भी पैदा हो सकते हैं। इस दिशा में गोबर से दीपक तैयार करना एक महत्वपूर्ण शुरुआत है।

    उन्होंने कहा कि दीपोत्सव जैसे धार्मिक एवं सांस्कृतिक आयोजन इस प्रकार के उत्पादों को आम लोगों तक पहुंचाने का बेहतर माध्यम बन सकते हैं। जब लोग इन दीपकों को अपने घरों, मंदिरों और सार्वजनिक आयोजनों में उपयोग करेंगे तो उन्हें यह भी जानकारी मिलेगी कि गौशालाओं में उपलब्ध संसाधनों से किस प्रकार उपयोगी वस्तुएं तैयार की जा सकती हैं।

    5100 दीपकों के माध्यम से गौसेवा का संदेश

    अयोध्या का दीपोत्सव देश-दुनिया में अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। भगवान श्रीराम की नगरी में दीप जलाने की परंपरा धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी हुई है। ऐसे अवसर पर पिरखौली गौशाला के गोबर से तैयार 5100 दीपकों का उपयोग इस आयोजन को एक नया सामाजिक संदेश देगा।

    इन दीपकों के माध्यम से संस्थान गौसेवा को केवल गोवंश के संरक्षण तक सीमित न रखकर उसे आत्मनिर्भरता और पर्यावरण संरक्षण से जोड़ने का प्रयास कर रहा है। संस्थान का मानना है कि गौशालाओं में संरक्षित गोवंश की देखभाल के साथ वहां उपलब्ध संसाधनों का सदुपयोग भी जरूरी है।

    गोबर से दीपक बनाने की पहल के जरिए यह संदेश दिया जा रहा है कि ग्रामीण क्षेत्रों में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों से स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं। इससे एक ओर परंपरागत ज्ञान और स्थानीय कौशल को बढ़ावा मिलता है, तो दूसरी ओर लोगों को स्वदेशी उत्पादों के उपयोग के लिए प्रेरणा मिलती है।

    दीपोत्सव में इन दीपकों की भागीदारी से गौशाला के कार्यों को भी व्यापक पहचान मिलने की उम्मीद है। धार्मिक आयोजनों के माध्यम से सामाजिक संस्थाओं को अपने सकारात्मक प्रयासों को सामने लाने का अवसर मिलता है। इससे समाज के अन्य लोग भी गौसंरक्षण और पर्यावरण से जुड़े अभियानों में भागीदारी के लिए प्रेरित हो सकते हैं।

    गौशालाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने का लक्ष्य

    गौशालाओं के संचालन में सबसे महत्वपूर्ण विषय निराश्रित गोवंश के लिए भोजन, पानी, देखभाल और आवश्यक सुविधाओं की निरंतर व्यवस्था करना है। इसके लिए आर्थिक संसाधनों की आवश्यकता होती है। कई बार गौशालाओं का संचालन सामाजिक सहयोग और उपलब्ध संसाधनों के आधार पर किया जाता है। ऐसे में यदि गौशालाओं में उपलब्ध गोबर से उपयोगी उत्पाद तैयार किए जाएं तो आर्थिक संसाधनों के नए विकल्प विकसित हो सकते हैं।

    रमेश सिंह सेवा संस्थान इसी दिशा में काम करने का प्रयास कर रहा है। संस्थान का मानना है कि गौशालाओं को केवल संरक्षण केंद्र के रूप में संचालित करने के बजाय उन्हें ऐसे केंद्रों के रूप में विकसित किया जाना चाहिए, जहां प्राकृतिक संसाधनों के माध्यम से उपयोगी उत्पाद तैयार किए जा सकें।

    गोबर से दीपक निर्माण इस दिशा में एक उदाहरण है। इसके अलावा गोबर से अन्य उपयोगी वस्तुओं के निर्माण की संभावनाएं भी मौजूद हैं। इन उत्पादों को स्थानीय बाजारों, धार्मिक आयोजनों और सामाजिक कार्यक्रमों से जोड़कर उनकी मांग विकसित की जा सकती है।

    यदि इस प्रकार की गतिविधियों को व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ाया जाए तो गौशालाओं को अपनी आय के अतिरिक्त स्रोत प्राप्त हो सकते हैं। इससे गोवंश के रखरखाव और संरक्षण संबंधी गतिविधियों को भी सहयोग मिल सकता है।

    उत्तम सिंह ने बताया कि संस्थान का प्रयास है कि गौशालाओं में उपलब्ध संसाधनों को बेकार न जाने दिया जाए। गोबर का उचित उपयोग करके ऐसे उत्पाद तैयार किए जाएं, जिनकी समाज में उपयोगिता हो और जिनसे गौशालाओं को भी लाभ मिल सके।

    स्थानीय स्तर पर रोजगार और स्वरोजगार की संभावनाएं

    इस पहल का एक महत्वपूर्ण पहलू ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार की संभावनाओं का विकास भी है। गोबर से दीपक और अन्य उत्पाद तैयार करने की प्रक्रिया में स्थानीय लोगों की भागीदारी सुनिश्चित की जा सकती है। इससे ग्रामीण महिलाओं, युवाओं और जरूरतमंद परिवारों को स्वरोजगार से जुड़ने का अवसर मिल सकता है।

    यदि गौशालाओं में उत्पाद निर्माण की गतिविधियों का विस्तार किया जाता है तो कच्चे माल की उपलब्धता, उत्पाद निर्माण, पैकेजिंग और वितरण जैसे विभिन्न कार्यों में स्थानीय लोगों की भागीदारी बढ़ सकती है।

    ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए स्थानीय संसाधनों पर आधारित छोटे उद्योगों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। गोबर से बनने वाले उत्पाद इसी श्रेणी में आते हैं। इनके निर्माण के लिए बड़े औद्योगिक ढांचे की आवश्यकता के बजाय स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों और कौशल का उपयोग किया जा सकता है।

    हालांकि इस तरह के प्रयासों को सफल बनाने के लिए उत्पादों की गुणवत्ता, निर्माण की नियमितता, उचित मूल्य और बाजार तक पहुंच पर विशेष ध्यान देना होगा। संस्थान की पहल इसी दिशा में आगे बढ़ने का एक प्रयास मानी जा रही है।

    इससे यह भी स्पष्ट होता है कि गौशालाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए केवल आर्थिक सहायता पर निर्भर रहने के बजाय उनके संसाधनों से आय के नए रास्ते विकसित करने की जरूरत है।

    अगले वर्ष एक लाख गोबर निर्मित दीपक दान करने का लक्ष्य

    रमेश सिंह सेवा संस्थान ने इस पहल को व्यापक स्तर पर आगे बढ़ाने की योजना बनाई है। गौशाला संचालक उत्तम सिंह ने बताया कि संस्थान ने आगामी वर्ष प्रदेशभर में संचालित अपनी गौशालाओं के माध्यम से एक लाख गोबर निर्मित दीपक दान करने का लक्ष्य निर्धारित किया है।

    इस लक्ष्य के माध्यम से संस्थान गौसेवा और पर्यावरण संरक्षण के संदेश को प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों तक पहुंचाना चाहता है। संस्थान की योजना है कि गोबर से तैयार दीपकों को धार्मिक और सामाजिक आयोजनों से जोड़कर अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाया जाए।

    एक लाख दीपक दान करने का लक्ष्य केवल संख्या बढ़ाने की योजना नहीं है, बल्कि इसके पीछे गौशालाओं में उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग करने और स्वदेशी उत्पादों को प्रोत्साहित करने का उद्देश्य भी शामिल है।

    यदि यह पहल निर्धारित योजना के अनुसार आगे बढ़ती है तो प्रदेश की विभिन्न गौशालाओं में गोबर से उत्पाद तैयार करने की गतिविधियों को प्रोत्साहन मिल सकता है। इससे गौशालाओं के बीच आपसी सहयोग और अनुभवों के आदान-प्रदान की संभावनाएं भी विकसित होंगी।

    उत्तम सिंह ने कहा कि संस्थान चाहता है कि गौशालाओं में संरक्षित गोवंश के संरक्षण के साथ वहां उपलब्ध गोबर का उपयोग समाज के हित में किया जाए। इससे गौशालाओं की उपयोगिता और सामाजिक भूमिका दोनों को मजबूत किया जा सकता है।

    धार्मिक परंपरा के साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेश

    अयोध्या में दीपोत्सव का आयोजन केवल दीप जलाने का कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह भगवान श्रीराम के आदर्शों, भारतीय संस्कृति और परंपराओं से जुड़ा एक महत्वपूर्ण उत्सव है। इस आयोजन में गोबर से निर्मित दीपकों को शामिल करने की पहल धार्मिक परंपरा को प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से जोड़ती है।

    भारत में गोबर का उपयोग लंबे समय से ग्रामीण जीवन का हिस्सा रहा है। पारंपरिक रूप से इसका इस्तेमाल खेती, खाद और विभिन्न घरेलू कार्यों में किया जाता रहा है। समय के साथ इसके उपयोग के नए तरीके भी सामने आए हैं। गोबर से दीपक तैयार करना भी इसी दिशा में एक प्रयास है।

    इस प्रकार के उत्पादों के माध्यम से लोगों को यह समझाने का अवसर मिलता है कि प्राकृतिक संसाधनों का सही उपयोग करके पर्यावरण के अनुकूल विकल्प विकसित किए जा सकते हैं।

    आज पर्यावरण संरक्षण को लेकर समाज में जागरूकता बढ़ रही है। ऐसे में धार्मिक आयोजनों में स्थानीय स्तर पर तैयार प्राकृतिक उत्पादों को प्रोत्साहित करना सकारात्मक कदम हो सकता है। इससे स्वदेशी वस्तुओं के प्रति लोगों की रुचि बढ़ेगी और स्थानीय उत्पादकों को भी प्रोत्साहन मिलेगा।

    संस्थान की पहल का उद्देश्य यही है कि दीपोत्सव की रोशनी के साथ गौसेवा, स्वदेशी भावना और पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी घर-घर पहुंचे।

    स्वदेशी उत्पादों को मिलेगा प्रोत्साहन

    देश में स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग पर लगातार जोर दिया जा रहा है। गोबर से तैयार दीपक इस दिशा में एक ऐसा उत्पाद है, जो स्थानीय संसाधनों और पारंपरिक सोच को आधुनिक उपयोगिता से जोड़ता है।

    दीपोत्सव जैसे बड़े आयोजन में इन दीपकों को स्थान मिलने से ऐसे उत्पादों के प्रति लोगों की जागरूकता बढ़ सकती है। आमतौर पर त्योहारों के दौरान बाजार में विभिन्न प्रकार के दीपक उपलब्ध होते हैं। ऐसे में गोबर से तैयार दीपकों को अपनाने से गौशालाओं में किए जा रहे प्रयासों को भी सहयोग मिल सकता है।

    संस्थान का मानना है कि यदि समाज के लोग इस प्रकार के उत्पादों को प्राथमिकता दें तो गौशालाओं के लिए आय के नए स्रोत विकसित करने में मदद मिलेगी। इसके लिए आवश्यक है कि उत्पादों की गुणवत्ता बनाए रखी जाए और लोगों तक उनके निर्माण तथा उपयोगिता की जानकारी पहुंचाई जाए।

    गोबर से निर्मित दीपकों को धार्मिक आयोजनों, मंदिरों और सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से भी प्रोत्साहित किया जा सकता है। इससे स्थानीय स्तर पर उत्पाद निर्माण की गतिविधियों को निरंतरता मिल सकती है।

    गौसंरक्षण को जनभागीदारी से जोड़ने की जरूरत

    गौसंरक्षण एक ऐसा विषय है, जिसमें सरकारी प्रयासों के साथ समाज की सक्रिय भागीदारी भी आवश्यक है। निराश्रित गोवंश की देखभाल, उनके लिए भोजन और आश्रय की व्यवस्था तथा गौशालाओं के संचालन में सामाजिक संस्थाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।

    रमेश सिंह सेवा संस्थान की पहल इसी सामाजिक जिम्मेदारी को आर्थिक आत्मनिर्भरता से जोड़ने का प्रयास है। संस्थान का मानना है कि गौशालाओं को मजबूत बनाने के लिए समाज को केवल दान देने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि वहां उपलब्ध संसाधनों के बेहतर उपयोग और उत्पादों को प्रोत्साहन देने में भी भागीदारी करनी चाहिए।

    यदि गौशालाओं में तैयार होने वाले उत्पादों को स्थानीय बाजार में उचित स्थान मिलता है तो इससे उनके संचालन में सहयोग मिलने की संभावना बढ़ सकती है। साथ ही लोगों में गोवंश संरक्षण के प्रति जागरूकता भी विकसित होगी।

    पिरखौली गौशाला में गोबर से 5100 दीपक तैयार करना इसी सोच का परिणाम है। संस्थान ने दीपोत्सव के अवसर पर इन दीपकों को भेंट करके एक ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया है, जिसमें धार्मिक आस्था, सामाजिक दायित्व और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी एक साथ दिखाई देती है।

    अयोध्या से प्रदेशभर तक पहुंचाने की तैयारी

    अयोध्या की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान के कारण यहां होने वाले सामाजिक एवं पर्यावरण संबंधी प्रयासों का विशेष महत्व है। भगवान श्रीराम की नगरी में आयोजित दीपोत्सव देशभर के लोगों का ध्यान आकर्षित करता है। ऐसे में पिरखौली गौशाला के गोबर से तैयार दीपकों की भागीदारी संस्थान की पहल को व्यापक पहचान दिला सकती है।

    संस्थान की आगामी वर्ष एक लाख दीपक दान करने की योजना भी इसी उद्देश्य से जुड़ी है। प्रदेशभर में संचालित गौशालाओं को इस अभियान से जोड़कर प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग और गौसंरक्षण के संदेश को विस्तार देने का प्रयास किया जाएगा।

    इस तरह की पहल को सफल बनाने के लिए विभिन्न स्तरों पर सहयोग की जरूरत होगी। गौशालाओं में उत्पाद निर्माण की व्यवस्था, प्रशिक्षित लोगों की भागीदारी, उत्पादों की गुणवत्ता और वितरण की उचित व्यवस्था जैसे विषय महत्वपूर्ण होंगे। साथ ही समाज और प्रशासन का सहयोग भी इस अभियान को गति दे सकता है।

    मुख्य विकास अधिकारी केके सिंह द्वारा इस प्रयास की सराहना किए जाने से संस्थान को प्रोत्साहन मिला है। इससे यह उम्मीद भी बढ़ी है कि भविष्य में गौशालाओं में किए जा रहे नवाचारों को प्रशासनिक और सामाजिक स्तर पर प्रोत्साहन मिल सकता है।

    गौशालाओं की बदलती भूमिका का उदाहरण

    पिरखौली स्थित अस्थायी गौआश्रय स्थल में तैयार किए गए 5100 दीपक गौशालाओं की बदलती भूमिका का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। पहले जहां गौशालाओं को मुख्य रूप से निराश्रित गोवंश के आश्रय और संरक्षण के केंद्र के रूप में देखा जाता था, वहीं अब उन्हें प्राकृतिक संसाधनों के सदुपयोग और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जोड़ने के प्रयास भी किए जा रहे हैं।

    गौशालाओं में उपलब्ध गोबर से उपयोगी उत्पाद तैयार करके उन्हें आर्थिक गतिविधियों का केंद्र बनाया जा सकता है। इससे गौशालाओं के संचालन में सहयोग मिलने के साथ स्थानीय लोगों को भी रोजगार से जुड़ने के अवसर मिल सकते हैं।

    हालांकि इसके लिए निरंतर प्रयास, उचित योजना और बाजार से जुड़ाव जरूरी है। केवल उत्पाद तैयार करना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उनकी गुणवत्ता और उपयोगिता के प्रति लोगों का विश्वास भी विकसित करना होगा।

    रमेश सिंह सेवा संस्थान की पहल इसी दिशा में एक सकारात्मक कदम है। 5100 दीपकों के माध्यम से संस्थान ने यह संदेश देने का प्रयास किया है कि गौसेवा को आधुनिक आवश्यकताओं और आत्मनिर्भरता के विचार से जोड़कर नए अवसर विकसित किए जा सकते हैं।

    दीपोत्सव की रोशनी में दिखेगा आत्मनिर्भरता का संदेश

    पिरखौली गौशाला के गोबर से तैयार 5100 दीपक इस बार अयोध्या के दीपोत्सव में विशेष पहचान बनाएंगे। इन दीपकों की रोशनी के साथ गौसंरक्षण, पर्यावरण संरक्षण और स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा देने का संदेश भी समाज तक पहुंचेगा।

    रमेश सिंह सेवा संस्थान की यह पहल बताती है कि सामाजिक संस्थाएं स्थानीय संसाधनों का उपयोग करके समाजहित में नए प्रयोग कर सकती हैं। गौशालाओं में संरक्षित गोवंश से प्राप्त गोबर को उपयोगी उत्पादों में बदलने से न केवल संसाधनों का सदुपयोग होगा, बल्कि आत्मनिर्भरता की दिशा में भी रास्ते खुलेंगे।

    गौशाला संचालक उत्तम सिंह ने स्पष्ट किया कि संस्थान का उद्देश्य निराश्रित गोवंश की सेवा और संरक्षण के साथ गौशालाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाना है। आगामी वर्ष एक लाख गोबर निर्मित दीपक दान करने का लक्ष्य इसी संकल्प को आगे बढ़ाने की योजना है।

    अयोध्या की पावन धरती पर दीपोत्सव के दौरान जब ये 5100 दीपक अपनी रोशनी बिखेरेंगे, तब इनके माध्यम से एक महत्वपूर्ण संदेश भी सामने आएगा कि गौसेवा, स्वदेशी भावना और पर्यावरण संरक्षण को एक-दूसरे से जोड़कर समाज के लिए उपयोगी पहल की जा सकती है। पिरखौली गौशाला का यह प्रयास अन्य गौशालाओं और सामाजिक संगठनों के लिए भी प्रेरणादायक उदाहरण बन सकता है।

    इस प्रकार रमेश सिंह सेवा संस्थान की पहल दीपोत्सव को केवल रोशनी का उत्सव बनाने के बजाय गौसेवा, प्राकृतिक संसाधनों के सदुपयोग, ग्रामीण स्वरोजगार और आत्मनिर्भर भारत की भावना से जोड़ने का प्रयास है।

    संवाददाता अरविंद कुमार तिवारी