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कुंभ पर किसी प्रकार की अनर्गल टिप्पणी बर्दाश्त नहीं: स्वामी जीतेंद्रानंद सरस्वती
प्रयागराज कुंभ को लेकर तथाकथित सेकुलर राजनीतिज्ञों की अनर्गल टिप्पणियां बर्दाश्त नहीं की जाएगी। इस समय कुंभ के माध्यम से विश्व में सनातन की पताका लहरा रही है। पृथ्वी पर अब तक के सबसे बड़े मानव समागम की अपार सफलता से सनातन विरोधियों के होश उड़ गए हैं। दुनिया सनातन हिंदू समाज की आस्था, श्रद्धा और शक्ति को प्रणाम कर रही है।
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महाकुंभ मेला क्षेत्र में फिर लगी आग, टेंट से उठीं ऊंची लपटें, फायर ब्रिगेड की टीम ने आग पर पाया काबू
प्रयागराज।महाकुंभ मेला क्षेत्र में शुक्रवार को एक बार फिर आग लग गई। इस बार आग हरिहरानंद के टेंट में लगी। टेंट से ऊंची लपटें उठती हुई दिखाई दी। मौके पर पहुंची फायर ब्रिगेड की टीम ने आग पर काबू पा लिया है।
शंकराचार्य मार्ग स्थित सेक्टर 18 में लगी थी आग,
महाकुंभ मेला क्षेत्र के शंकराचार्य मार्ग स्थित सेक्टर 18 में आग लगी। टेंट में आग की लपटे उठती हुई दिखाई दी। जानकारी मिलते ही मौके पर पहुंचकर फायर ब्रिगेड की टीम ने तुंरत ही आग पर काबू पा लिया। मेला क्षेत्र में आग लगने की घटना में कोई भी हताहत नहीं हुआ।
आग लगने के कारणों का लगाया जा रहा पता,
पुलिस ने बताया कि मौके पर पहुंची दमकल की गाड़ियों ने आग पर काबू पा लिया। खाक चौक थाना के प्रभारी निरीक्षक योगेश चतुर्वेदी ने कहा कि ओल्ड जीटी रोड पर तुलसी चौराहे के पास एक शिविर में आग लग गई थी।
थाना प्रभारी ने बताया कि “मौके पर अग्निशमन विभाग के अधिकारी भी पहुंच गए। आग लगने के कारणों का पता लगाया जा रहा है।”
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किन्नर अखाड़े की महामंडलेश्वर लक्ष्मी त्रिपाठी ने ममता कुलकर्णी के बारे में बात की
किन्नर अखाड़े की महामंडलेश्वर लक्ष्मी त्रिपाठी ने ममता कुलकर्णी के बारे में बात की थी. उन्होंने कहा था- पिछले 2 सालों से ममता हमारे सम्पर्क में थीं. वह सनातन से जुड़ना चाहती थीं. वह पहले जूना अखाड़े में शिष्या थीं. फिर हमारे सम्पर्क में आईं. फिर उन्होंने पद की मांग की. उन्होंने कहा कि उन्हें महामंडलेश्वर बनना है. फिर हमने बताया कि यह सब करना होता है.
संगम में ममता कुलकर्णी ने अपना पिंडदान किया. इसमें उन्होंने फूलों से सजी एक थाल में दीया रखकर उनसे गंगा में प्रवाहित किया. इसके बाद एक्ट्रेस ने उन्होंने पवित्र जल में डुबकी लगाई. मीडिया से बातचीत में ममता कुलकर्णी ने कहा- महादेव, मां काली और मेरे गुरु का ये आदेश था. ये सब उन्होंने डिसाइड किया था. आज का दिन भी उन्होंने डिसाइड किया था. मैंने कुछ नहीं किया है.
ममता कुलकर्णी की चोटी काटी जाएगी. फिर पिंडदान होगा. जैसे किन्नर अखाड़े का कानून होता है वैसे ही यहां भी होगा। -

महाकुंभ के दौरान अब तक 8.26 करोड़ श्रद्धालुओं ने संगम में डुबकी लगाई
प्रयागराज में महाकुंभ के दौरान अब तक 8.26 करोड़ श्रद्धालुओं ने संगम में डुबकी लगाई है।
कल तक 8.26 करोड़ श्रद्धालुओं ने स्नान किया, जबकि 10 लाख से अधिक लोग महाकुंभ में कल्पवास कर रहे हैं।
12.79 लाख श्रद्धालु सुबह से महाकुंभ में पहुंच चुके हैं, और आज सुबह से 22.79 लाख लोगों ने संगम में स्नान किया है।
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महानिर्वाणी अखाड़े के महंत रवींद्र पुरी ने बताया, कुंभ के बाद कहां चले जाते हैं नागा साधु ?
धर्म की ख़बरें : महानिर्वाणी अखाड़े के महंत रवींद्र पुरी ने बताया, कुंभ के बाद कहां चले जाते हैं नागा साधु ?
महाकुंभ में आकर्षण का केंद्र होते हैं साधु संन्यासियों के अखाड़े. इनमें भी नागा साधुओं की दुनिया पूरी दुनिया को अपनी ओर खींचती है. आइए जानते हैं इस दुनिया के झरोखे में.
जगद्गुरु शंकराचार्य ने सनातन की सुरक्षा के लिए ईसवी सदी से करीब सात सौ साल पहले बौद्ध धर्म में आए बदलाव और अन्य मान्यताओं से सनातन को सुरक्षित करने के लिए युवा संन्यासियों की सेना बनाई. नाम दिया गया- ‘अखंड.’
बस आगे चलकर वही अखाड़ा बना. उत्तम प्रबंधन के लिए अखंड में भी विभाजन हुआ और सेना बढ़ती गई. आज शैव मत के संन्यासियों के सात मुख्य अखाड़े हैं. जूना, आवाहन, अग्नि, महानिर्वाणी, अटल, निरंजनी और आनंद.
महानिर्वाणी अखाड़ा के श्री महंत रवींद्र पुरी ने बताया कि अखाड़ों के मूल देव तो शिव हैं, लेकिन आराध्य देवता अलग-अलग. धर्म की रक्षा के लिए बनाए गए अखाड़े अब समाज निर्माण में अपना योगदान करते हैं.
महाकुंभ से पहले सभी अखाड़ों में धर्म ध्वजा स्थापित की जाती है. ध्वजा स्थापना का अर्थ है कि अब अखाड़े के सभी संन्यासियों और श्रद्धालुओं के रहने और भोजन की व्यवस्था के लिए अखाड़ा तैयार है. अखाड़ों की धर्म ध्वजा का रंग तो भगवा होता है लेकिन उन्हें ध्वज दंड पर फहराने के तरीके अलग अलग हैं.
सदियों बाद भी ये नागा संन्यासी कमांडो की भूमिका में तो आज भी रहते हैं. शास्त्रों के साथ शस्त्रों की शिक्षा भी लेते हैं. लेकिन अब इनकी भूमिका समाज को शिक्षित और अपनी सनातनी परंपरा के प्रति जागरूक करने की भी है.
शरीर पर भस्म, माथे पर तिलक, कानों में कुंडल… 16 नहीं नागा साधु करते हैं 17 शृंगार,
प्रयागराज महाकुंभ में आए ‘चश्मे वाले नागा बाबा’,
‘नागा देश के दुश्मनों से लड़ने को तैयार, बंदूक चलाना आता’, महाकुंभ में बोले ‘चश्मे वाले बाबा’,
भाला फेंकते हैं, लाठी भांजते हैं और स्कूल… कैसा होता है बाल नागा साधुओं का जीवन,
ऐबक, अब्दाली और औरंगजेब… जब नागा साधुओं ने उठाए हथियार और आक्रांताओं से ली टक्कर,
नागा साधुओं को नहीं दी जाती मुखाग्नि… फिर कैसे होता है अंतिम संस्कार,
महंत रवींद्र पुरी बताते हैं कि सनातन की इस कमांडो फोर्स को अपने इस लोक और परलोक की भी चिंता नहीं. क्योंकि इन्होंने स्वयं को स्वयं से स्वयं ही मुक्त कर लिया है. सभी चारों कुंभ में पहले अमृत स्नान के बाद और दूसरे से पहले नए नागा संन्यासी दीक्षित किए जाते हैं. उसकी भी पारंपरिक विधि है. नागा संन्यासी बनना आसान नहीं होता.
अब बड़ा प्रश्न लोगों के जेहन में उठता है कि कुंभ में हजारों की संख्या में दिखते ये नागा संन्यासी कुंभ के बाद कहां गायब हो जाते हैं? इस सवाल का भी उत्तर जान लीजिए.
निरंजनी अखाड़ा के महंत रवींद्र पुरी ने बताया कि अब इतना जान लीजिए कि साधना और सुअवसरों में नागा संन्यासी नग्न यानी दिगंबर रहते हैं. लेकिन समाज में आते जाते समय लोक मर्यादा से उपवस्त्र यानी कौपीन लंगोट या गमछा धारण करते हैं. ये संन्यासी गांव, खेड़ों, कस्बों शहरों में स्थित मंदिरों मठों आश्रमों का प्रबंधन करते हुए समाज में भी रहते हैं, तो कई गिरी गुफाओं में अपनी साधना से देश-दुनिया कल्याण के लिए ध्यान तपस्या में मग्न रहते हैं।




