17 सितंबर, 2024 गोरखपुर।गोरखनाथ मंदिर कथा
युगपुरुष ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज की 55 वीं तथा राष्ट्रसंत ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज की 10 वीं पुण्यतिथि के अवसर पर आयोजित साप्ताहिक श्रीमद्भागवत महापुराण कथा के चौथे दिन श्री राममंदिर गुरुधाम वाराणसी से पधारे श्रीमद्जगतगुरु अनंतानंद द्वाराचार्य काशीपीठाधीश्वर स्वामी डॉ रामकमल दास वेदांती जी महाराज ने व्यास पीठ कहा कि *जीवन की किसी भी समस्या से निजात दिलाता हैं गजेंद्र मोक्ष का पाठ। भगवान् नारायण ने गजराज को जिस प्रकार ग्राह से मुक्ति दिलाई, उसी प्रकार इस स्तोत्र का पाठ करने वाले मनुष्य के जीवन मे ग्राह रुपी जो भी समस्याए होती हैं उनसे भगवान् उसको मुक्ति दिलाते हैं। हमारा यह मनुष्य जीवन स्वयं में भी ग्राह ही हैं। जीवन रूपी ग्राह से मुक्ति के लिए सत्संग करे, और भगवान के नाम का जप करे। नाम जप करने का अभ्यास पूर्व से रहने पर अंत समय में भी भगवान का नाम जिह्वा पर आता है जिसके द्वारा इस जीवन रूपी ग्राह से सदा के लिए मुक्ति मिल जाती हैं ।
उन्होने कहा कि जो लक्ष्मी जी के पीछे पीछे दौड़ते हैं उन्हें लक्ष्मी नहीं मिलती, क्योंकि लक्ष्मी जी छाया की तरह है, छाया को दौड़ा कर पकड़ना चाहे तो कभी नहीं पकड़ सकते। लक्ष्मी जी उसी को मिलती हैं जो उनका तिरस्कार कर नारायण को पाना चाहता है। लक्ष्मी स्वयं नारायण के भक्तो के पास चली जाती हैं।
स्वामी विवेकानन्द का उद्धरण देते हुए बताया कि स्वामी जी अमेरिका में पूछे जाने पर कहते हैं कि भारत देश में चित्र की नहीं चरित्र की पूजा होती है। व्यक्ति का स्वरूप चाहे जैसा हो, यदि उसका चरित्र उत्तम होता है तो समाज में उसकी पूजा होती हैं। रूप,रंग, जाती धर्म के आधार पर किसी का मान अपमान करना यह भारत की संस्कृति नहीं रहीं हैं।
युवाओं को आगाह करते हुए कहा कि आत्महत्या जीवन का सबसे बड़ा पाप है, यह किसी समस्या का समाधान नहीं है। यदि हम जीवन में असफल होते हैं तो हमें आत्महत्या नहीं सत्संग करना चाहिए। हमे ईश्वर से हमेशा यही कामना करनी चाहिए कि मुझे जीवन में और कुछ मिले न मिले आपका सहारा जरूर मिले। उन्होंने ‘आसरा इस जहाँ का मिले ना मिले, मुझे तेरा सहारा सदा चाहिए’ भजन गाकर श्रद्धालुओं को भाव विभोर कर दिया।
उन्होंने कहा कि मानव का जीवन अत्यन्त दुर्लभ होता है, यह मानव तन प्राप्त करने के लिए देवता भी तरसते रहते हैं। जीवन में कोई गलती हो भी जाए तो उसके सुधार का अवसर ईश्वर देते हैं । जो गिरकर सभलता है वहीं अपने लक्ष्य को प्राप्त करता है। हमारे जीवन का परम लक्ष्य ईश्वर की प्राप्ति है, उसके लिए हमें भगवान की कथा सुनते रहनी चाहिए, जिन्दगी का कोई भरोसा नही है, पता नही कब तक साथ रहेगी। उन्होंने “क्या भरोसा है इस जिंदगी का, साथ देती नहीं ये किसी का” गाकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध दिया ।
रघुकुल के राजाओं का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि राजा दशरथ बड़े महान व सौभाग्यशाली राजा थे, उनके पहले राजा भगीरथ ने भगवान के चरणोदक के रूप में गङ्गा जी को पृथ्वी पर उतारा लेकिन राजा दशरथ ने साक्षात् हरि का ही प्राकट्य करा दिया।
रामावतार के दशानन और दशरथ का अर्थ बताते हुए उन्होने कहा कि *जो अपनी दस इंद्रियों की कामनाओं के अनुसार जीवन को चलाता है वह दशानन बन जाता है, तथा जो अपनी दसों इंद्रियों रूपी घोड़ो को लगाम लगाकर अपने जीवन रथ को चलाता है वह दशरथ बन जाता है। हम जब दशानन बनते हैं तो हमारे घर में मेघनाद पैदा होता है, और जब हम दशरथ बनते हैं तो हमारे घर में भगवान राम पैदा होते हैं।
आज कथा में उन्होंने गजेंद्र मोक्ष, समुद्र मंथन, परशुराम अवतार कथा,श्री रामामावतार की कथा तथा श्री कृष्ण जन्म की कथा कही।
कथा का समापन आरती और प्रसाद से हुआ। इस अवसर पर योगी कमल नाथ जी महाराज, महन्त नरसिंह दास जी महाराज, योगी धर्मेन्द्र नाथ जी, चेचाईराम के महंत पंचानन पुरी सहित यजमानगण श्री सीताराम जायसवाल ( पूर्व मेयर ) , श्री अवधेश सिंह , अजय सिंह, महेश पोद्दार आदि उपस्थित रहे ।
संचालन श्री गोरक्षनाथ संस्कृत विद्यापीठ के प्राचार्य डॉ अरविंद कुमार चतुर्वेदी ने किया ।
गोरखनाथ मंदिर कथा 17 सितंबर

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