“न्याय की राह देखता एक पिता, कराहता एक बेटा और उदासीन व्यवस्था”
“दयानंद मिश्रा पर सुनियोजित हमला — ईंट-पत्थर, लाठी-डंडे और तलवार से सजी साजिश की रात”
” प्रशासन मौन, पुलिस निष्क्रिय और समाज आंदोलित — क्या यह कानून का मुँह चिढ़ाता अपराध नहीं ? “
यह हमला उस भरोसे का कत्ल है जो हर आम आदमी ‘कानून और व्यवस्था’ पर करता है।
घटना का सारांश:
दिनांक — 9 जून 2025
स्थान — रक्सा गांव, थाना मेहदावल, जनपद संतकबीरनगर
पीड़ित — दयानंद मिश्रा, युवक, ग्राम निवासी, सपनों का घर बना रहा था।
घटना — पीछे से जानलेवा हमला, लोहे की रॉड, तलवार और डंडों से निर्मम पिटाई, अधमरी हालत में जिला अस्पताल में भर्ती।
वह बस अपना घर बना रहा था…
दयानंद मिश्रा, एक साधारण युवक, एक असाधारण सपना — अपना खुद का घर।
जिस दिन उसके खून और पसीने से खड़ा हो रहा वह मकान आकार ले रहा था, उसी दिन उसे मिटा देने की तैयारी कुछ दरिंदों ने कर ली थी।
रात 8:30 बजे, वह अपने निर्माणाधीन मकान पर भोजन लेकर पहुँचा था। लेकिन जैसे ही उसने कदम बढ़ाया, घात लगाए लोगों ने उस पर लोहे की रॉड, लाठी, भाला और तलवार से हमला बोल दिया।
उसके शरीर पर पड़ते वारों की आवाज़ें रात की नीरवता को चीरती रहीं,
पर पुलिस चौकी, जो महज़ 300 मीटर दूर थी, वह मौन रही।
अस्पताल में अधमरी हालत — टूटी हड्डियाँ, फटी त्वचा, डरी आत्मा
गांववालों की मदद से दयानंद को जिला अस्पताल पहुँचाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने कहा — “इस हमले में मरना तय था, लेकिन वह किसी चमत्कार से बच गया।”
उनकी पसलियाँ टूटी, सिर में गंभीर चोटें, हाथ-पैरों की हड्डियाँ चटक चुकीं — वह सिर्फ शरीर से नहीं, अपने सपनों से भी घायल हो चुका है।
प्रशासनिक चुप्पी — क्या यह अपराध को संरक्षण नहीं ?
सबसे चौंकाने वाली बात यह कि:
•हमला नामजद आरोपियों द्वारा किया गया,
•हथियारों का खुलेआम प्रयोग हुआ,
•मेडिकल रिपोर्ट में गंभीर चोटों की पुष्टि हुई,
•प्रत्यक्षदर्शियों की मौजूदगी है,
•एफआईआर दर्ज हो चुकी है — संगीन धाराओं में।
फिर भी एक भी गिरफ्तारी नहीं !
क्या न्याय व्यवस्था अब केवल रस्म अदायगी बन गई है ?
परिवार की चीख — “हमारे बेटे को न्याय दो!”
दयानंद के वृद्ध पिता पंडित परमात्मा प्रसाद मिश्रा का स्वर कांपता है, लेकिन शब्दों में एक ज्वाला है:
“हमारे बेटे को बेरहमी से पीटा गया। पुलिस हमें सिर्फ ‘तारीख़ पे तारीख़’ दे रही है। अगर हम आम नागरिक हैं, तो क्या हम इंसाफ़ के लायक नहीं ?”
दयानंद की बहनें अस्पताल के गलियारे में हर आने-जाने वाले अधिकारी से एक ही सवाल पूछती हैं:
“क्या हमारे भाई की जान की कोई कीमत नहीं?”
गांव का कोना-कोना आक्रोशित: “अब चुप नहीं बैठेंगे”
गांव के लोग इसे सिर्फ दयानंद का हमला नहीं, बल्कि सम्पूर्ण गांव की आत्मा पर किया गया वार मान रहे हैं। न्याय नहीं मिलने पर ग्रामवासी जल्द मुख्यमंत्री से न्याय की गुहार लगाने के लिए जाएंगे,
एक बुजुर्ग किसान ने कहा:
“आज दयानंद को पीटा गया, कल कोई और होगा। अगर अब हम चुप रहे, तो हम सबके घरों पर यह खतरा मंडराता रहेगा।”
कानून का सवाल — क्या आज न्याय सिर्फ रसूख़दारों के लिए है?
जब न्याय की गति मद्धम हो जाए, जब पुलिस निष्क्रिय हो जाए, और जब पीड़ित की चीखों पर व्यवस्था के कान बहरे हो जाएँ — तब लोकतंत्र घायल होता है।
यह हमला केवल दयानंद पर नहीं था, यह एक सोच पर हमला था — कि न्याय सबके लिए समान है।
परिवार की पाँच माँगें :
1. नामजद आरोपियों की त्वरित गिरफ्तारी।
2. पीड़ित को सरकारी चिकित्सा सहायता व आर्थिक मुआवज़ा।
3. पुलिस निष्क्रियता की उच्च स्तरीय जांच।
4. परिवार को सुरक्षा प्रदान की जाए।
5. घटना की स्वतंत्र, निष्पक्ष एवं समयबद्ध जांच।
दयानंद की आँखें पूछ रही हैं — “क्या मैं अकेला हूँ ?”
उसका शरीर जवाब नहीं दे रहा, लेकिन आँखों में एक मौन प्रश्न है :
“क्या मेरे सपनों की कोई क़ीमत नहीं ?”
“क्या मैं सिर्फ इसलिए मारा गया क्योंकि मैं कमजोर हूँ?”
“क्या यह देश अब सिर्फ प्रभावशाली लोगों के लिए है?
समाज को अब चुप नहीं रहना चाहिए…
यह कोई व्यक्तिगत लड़ाई नहीं, यह हर उस व्यक्ति की लड़ाई है जो व्यवस्था से न्याय की उम्मीद करता है।
आज दयानंद है, कल कोई और होगा।
यदि अब हम चुप रहे, तो अन्याय को बल मिलेगा और इंसाफ़ फिर इतिहास की किताबों में ही सिमट जाएगा।
दयानंद मिश्रा के लिए नहीं — हर उस आवाज़ के लिए जो चुप करा दी गई है।
हर उस सपने के लिए जो निर्माणाधीन ही कुचल दिए जाते हैं।
हर उस भरोसे के लिए जो अब भी संविधान में यक़ीन करता है।
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