SPECIAL REPORT | टोल वसूली पर उठे गंभीर सवाल

गोरखपुर /लखनऊ ब्यूरो निष्पक्ष टुडे :-

NHAI के अधिकृत सिस्टम के समानांतर सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल की जांच, ED की 14 ठिकानों पर कार्रवाई


सरकारी टोल व्यवस्था में कथित अनियमितताओं की पड़ताल

देश के हाईवे पर सफर करने वाले लाखों वाहन रोजाना टोल टैक्स का भुगतान करते हैं।

टोल वसूली की पूरी प्रक्रिया को डिजिटल और पारदर्शी बनाने के लिए FASTag और NHAI के अधिकृत सॉफ्टवेयर सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता है।लेकिन अब इसी व्यवस्था से जुड़ी कथित अनियमितताओं ने कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

NHAI के अधिकृत टोल सिस्टम के समानांतर एक अनधिकृत सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल के आरोपों की जांच चल रही है।

इसी मामले में प्रवर्तन निदेशालय यानी ED ने उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में 14 ठिकानों पर तलाशी की कार्रवाई की है।

हमारी इस विशेष रिपोर्ट में समझिए—

आरोप क्या हैं, सरकारी रिकॉर्ड में क्या सामने आया है और जांच एजेंसियां किन सवालों के जवाब तलाश रही हैं।

1. ED की कार्रवाई से फिर चर्चा में आया मामला :-

टोल वसूली से जुड़ी कथित अनियमितताओं के मामले में ED की कार्रवाई के बाद यह मामला एक बार फिर चर्चा में है।

जांच एजेंसी कथित तौर पर टोल वसूली से जुड़े डिजिटल रिकॉर्ड, दस्तावेजों और वित्तीय लेनदेन की पड़ताल कर रही है।

ED की तलाशी को जांच की कार्रवाई के तौर पर देखा जाना चाहिए; इससे किसी व्यक्ति या संस्था का अपराध सिद्ध नहीं होता।

2. समानांतर सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल का आरोप

मामले की जांच में यह आरोप सामने आया है कि कुछ टोल प्लाजा पर NHAI के अधिकृत सिस्टम के अलावा एक समानांतर या अनधिकृत सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया गया।

जांच एजेंसियों को संदेह है कि इस व्यवस्था के जरिए कुछ टोल लेनदेन का रिकॉर्ड अधिकृत सिस्टम से अलग रखा जा सकता था।

अगर जांच में यह आरोप प्रमाणित होता है, तो इससे टोल वसूली की निगरानी और राजस्व मिलान की व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठ सकते हैं।

3. 5% और 95% वाला दावा—क्या है सच्चाई?

जांच के दौरान सामने आए कुछ बयानों में यह दावा किया गया कि कुछ परिस्थितियों में वसूली गई रकम का एक छोटा हिस्सा ही NHAI के अधिकृत सिस्टम में दर्ज किया जाता था और शेष रकम अलग व्यवस्था में रहती थी।

इसी संदर्भ में 5 प्रतिशत और 95 प्रतिशत के आंकड़े का उल्लेख किया गया है।

लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है—

यह आंकड़ा अभी देशभर के सभी टोल प्लाजा पर लागू कोई अंतिम सरकारी निष्कर्ष नहीं है।
इसलिए इसे जांच में सामने आए दावे के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

यह जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगा कि कथित अनियमितता कितने टोल प्लाजा पर हुई, कितनी रकम प्रभावित हुई और वास्तविक वित्तीय नुकसान कितना था।

4. जांच की शुरुआत उत्तर प्रदेश से :-

मामले की जांच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा उत्तर प्रदेश STF की कार्रवाई से जुड़ा है।

जनवरी 2025 में मिर्जापुर के अतरैला शिव गुलाम टोल प्लाजा पर कार्रवाई के बाद टोल वसूली और कथित समानांतर सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल से जुड़े आरोपों की जांच आगे बढ़ी।
जांच में सामने आए आरोपों के आधार पर यह सवाल भी उठा कि क्या ऐसी व्यवस्था किसी एक टोल प्लाजा तक सीमित थी या दूसरे स्थानों पर भी इसकी जांच जरूरी है।

5. 200 से अधिक टोल प्लाजा की जांच की बात

मीडिया रिपोर्टों में जांच का दायरा 200 से अधिक टोल प्लाजा तक पहुंचने की बात कही गई है।

इनमें लगभग 100 टोल प्लाजा उत्तर प्रदेश के बताए जा रहे हैं।
हालांकि, यहां अंतर समझना जरूरी है—

जांच के दायरे में शामिल होना अनियमितता या अपराध साबित होने के बराबर नहीं है।
अंतिम स्थिति जांच पूरी होने के बाद ही सामने आएगी।

6. संसद में सरकार ने क्या बताया?

सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने संसद में दिए एक जवाब में टोल वसूली से संबंधित अनियमितता की शिकायत का उल्लेख किया था।सरकार के अनुसार मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित की गई थी।

यह सरकारी जवाब इस बात की पुष्टि करता है कि टोल वसूली की प्रक्रिया को लेकर शिकायतें जांच के स्तर तक पहुंची थीं। हालांकि, किसी विशेष टोल प्लाजा या संस्था की जिम्मेदारी तय करने के लिए संबंधित जांच के अंतिम निष्कर्ष देखना जरूरी होगा।

7. NHAI की कार्रवाई भी महत्वपूर्ण :-

टोल वसूली में अनियमितताओं से जुड़े मामलों में NHAI की ओर से भी कार्रवाई की गई।
सरकारी जानकारी के अनुसार 14 User Fee Collection Agencies को डिबार किया गया और 100 करोड़ रुपये से अधिक की Performance Security से संबंधित कार्रवाई की गई।

यह कार्रवाई टोल संचालन में नियमों के अनुपालन को लेकर NHAI की सख्ती को दर्शाती है।

8. लालानगर टोल प्लाजा का अलग मामला :-

वाराणसी-प्रयागराज हाईवे के लालानगर टोल प्लाजा से जुड़ा ₹62.87 करोड़ का स्टांप ड्यूटी विवाद भी सामने आया है।

रिपोर्टों के अनुसार टोल संचालन के एक बड़े अनुबंध को लेकर स्टांप शुल्क की देनदारी पर विवाद हुआ।लेकिन यहां सावधानी जरूरी है।

यह मामला स्टांप ड्यूटी/राजस्व विवाद से संबंधित है और इसे सीधे कथित समानांतर टोल सॉफ्टवेयर मामले की रकम के रूप में पेश नहीं किया जाना चाहिए।दोनों मामलों की प्रकृति अलग है।

9. सबसे बड़ा सवाल—निगरानी व्यवस्था कितनी प्रभावी थी?

इस पूरे प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण सवाल केवल संभावित राजस्व नुकसान का नहीं है।

सवाल यह भी है कि—

क्या अधिकृत टोल सिस्टम के बाहर किसी सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल संभव था?

अगर ऐसा हुआ, तो इसकी जानकारी निगरानी तंत्र को कितने समय बाद मिली?

क्या डिजिटल रिकॉर्ड और वास्तविक टोल वसूली के बीच अंतर की नियमित जांच होती थी?

और अगर कोई वित्तीय अंतर पाया गया, तो उसकी जिम्मेदारी किस स्तर पर तय होगी?

10. जांच के नतीजे का इंतजार :-

फिलहाल ED और अन्य एजेंसियों की जांच जारी है।

जांच के दौरान बरामद दस्तावेज, डिजिटल रिकॉर्ड, सॉफ्टवेयर डेटा और वित्तीय लेनदेन से यह पता लगाने की कोशिश होगी कि कथित अनियमितता वास्तव में हुई या नहीं और यदि हुई तो उसका दायरा कितना था।

इसलिए फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात है—

आरोप और प्रमाण के बीच अंतर बनाए रखना।
टोल वसूली में अनियमितता के आरोप गंभीर हैं, लेकिन अंतिम निष्कर्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही सामने आएगा।

SPECIAL REPORT | 
टोल प्लाजा से जुड़ी यह जांच एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा करती है—

जब सरकारी राजस्व की निगरानी डिजिटल सिस्टम से हो रही हो, तो क्या उस सिस्टम के समानांतर किसी अनधिकृत व्यवस्था की गुंजाइश रह सकती है?

अगर जांच में आरोप सही साबित होते हैं, तो यह सिर्फ टोल संचालन का मामला नहीं होगा, बल्कि डिजिटल मॉनिटरिंग, ठेकेदारों की जवाबदेही और सरकारी राजस्व की सुरक्षा से जुड़ा महत्वपूर्ण मामला होगा,और अगर आरोप प्रमाणित नहीं होते, तो जांच के जरिए उन संस्थाओं और व्यक्तियों को भी स्पष्ट रूप से अलग किया जाना जरूरी होगा जिन पर केवल संदेह या जांच के आधार पर सवाल उठे हैं।

फिलहाल जांच जारी है—और अंतिम सच जांच रिपोर्ट तथा न्यायिक प्रक्रिया से ही सामने आएगा।

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