कन्यादान से बड़ा कोई यज्ञ नहीं, कोई दान नहीं:राजनजी महाराज,
रामकथा के दूसरे दिन शिव विवाह की कथा सुन भावविभोर हुए श्रोता,
बड़हलगंज /गोरखपुर (निष्पक्ष टुडे) बड़हलगंज के नेशनल इण्टर कालेज खेल मैदान में चल रही नौ दिवसीय रामकथा के दूसरे दिन कथा वाचक राजन जी महाराज ने शिव पार्वती के विवाह का प्रसंग सुनाकर श्रोताओं को भाव विभोर कर दिया। इस दौरान हजारों की संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।
शुक्रवार को उपस्थित श्रद्धालुओं पर भक्ति रस की बौछार करते हुए कथा वाचक राजन जी महाराज ने कहा कि इस संसार में बेटी के कन्या दान से बड़ा कोई यज्ञ नहीं।कोई दान नहीं।जिस घर में बेटियों का सम्मान होता है,जहां पर बेटी के पायल की छम-छम की आवाज सुनाई देती है,उस घर में देवताओं का निवास होता है।शिव-पार्वती विवाह का प्रसंग सुनाते हुए उन्होंने कहा कि नारद जी के कहने से माता पार्वती ने कई वर्षों तक शिव को पति के रूप में पाने के लिए तपस्या किया। उधर तारकासुर ब्रह्मा जी से शिव पुत्र के हाथों मृत्यु का वरदान पा खुद को अमर मान देवताओं को भयंकर दुःख दे रहा था। सभी देवता ब्रह्मा जी के पास पहुंचे तो उन्होंने शिव को समाधि से जगाने के लिए कामदेव को कहा। कामदेव खुद की आहुति दे शिव को समाधि से बाहर किया। इसके बाद उन्हें विवाह के लिए ब्रह्मा जी ने तैयार किया। शिव बारात का बेहतरीन वर्णन करते हुए राजन जी महाराज ने बताया कि जब शंकर जी दूल्हा बनकर चले तो उनके साथ देवताओं, भूत-प्रेत नाना प्रकार के रूप बनाकर हिमाचल के नगर की तरफ शोर-गुल मचाते हुए चल दिए।बारात जब राजा हिमाचल के नगर में प्रवेश करती है तो उसे देखते ही लोग लोग भाग खड़े हुए।रानी मैनावती के हाथों से पूजा की थाली गिर जाती है। विकराल वेश में शंकर को देखकर सभी लोग नारद जी को दोष देने लगे। मैनावती माता पार्वती को गोद में लेकर जोर से विलाप करने लगीं। कहती हैं कि इस पागल के साथ मैं अपनी बेटी का विवाह नहीं करूंगी चाहे जो भी हो जाए। नारद जी आये और बताया कि जिसे आप अपनी बेटी समझ रहीं हैं, वे शक्ति स्वरूपा हैं। किसी तरह विवाह संपन्न हुआ।विदाई के समय मैना रानी पार्वती जी से कह रही हैं कि हमेशा अपने पति की सेवा करना। पति-धर्म से बड़ा कोई धर्म नहीं है। पत्नी के लिए पति से बड़ा संसार में कोई देवता नहीं है।श्रद्धालुओं को रामकथा का अमृतपान कराते हुए राजनजी ने कहा कि माता पार्वती जी महल छोड़कर आईं थीं और कैलाश के पत्थरों पर भी काफी खुश थीं।उनके जीवन से यह सीख मिलती है कि जीवन में सुख साधन से नहीं हो सकता है। जीवन में सुख मन के स्वीकार करने की शक्ति से होता है।अगर आपने परिस्थिति को स्वीकार कर लिया तो दुनिया की कोई ताकत आपको दु:खी नहीं कर सकती है।उन्होंने कहा कि शिव-पार्वती का विवाह संसार में अद्वितीय है।इनके विवाह से काफी प्रसन्न देवता वर्षों तक संतान उत्पन्न न होने से काफी दुःखी रहने लगे क्योंकि तारकासुर नामक राक्षस का उत्पात बढ़ता जा रहा था और उसका संहार शिवपुत्र के हाथों ही होना था।देवताओं की प्रबल इच्छा कुछ समय बाद पूर्ण हुई और छः मुख वाले भगवान कार्तिकेय का जन्म हुआ।शिव-शिवा के इन्हीं पुत्र के हाथों तारकासुर का वध हुआ।देवता चिन्तामुक्त हुए और प्रसन्न हो पुष्प वर्षा किये।इसके पूर्व आज के मुख्य यजमान डाक्टर ए एन चौबे के साथ रानी चौबे, प्रवीण राय के साथ सुप्रिया, शिवम् शुक्ला के साथ जया शुक्ला एवं नागेन्द्र सिंह रघुवंशी के साथ अमरावती सिंह ने व्यास पीठ का पूजन व आरती कर कथा का शुभारम्भ कराया।आयोजक सूबेदार राय ने सभी आगंतुकों के प्रति आभार ज्ञापित किया। इस अवसर पर एन पी जी के प्राचार्य डॉ राकेश पाण्डेय , डा अचला पाण्डेय,अनिल पाण्डेय, कुलदीप राय,शैलेश शाही, कमलेश सिंह आदि सहित हजारों की संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।
Leave a Reply