ऐड गुरु प्रभाकर शुक्ला ने बदला अपना क्रियेटिव टेस्ट, साइबर क्राइम की पोल खोलेगी उनकी “डिजिटल अरेस्ट”

प्रयागराज की पावन धरित्री पर एक पुष्प की नाईं पल्लवित हुए प्रभाकर आज मायानगरी मुंबई में विज्ञापन की दुनिया में एक प्रदीप्त सितारा बन ऐड गुरु के नाम से सुशोभित हो विराजमान हैं। पूरा नाम है – प्रभाकर शुक्ला। किन्तु, यौवन का उत्पात, विज्ञता की बरसात, चपलता और प्रत्युत्पन्नमतित्वता के साथ प्रभावशाली व्यक्तित्व धारण करनेवाले लेखक निर्माता निर्देशक प्रभाकर शुक्ला को ऐड गुरु के बदले विज्ञापन जगत् का रचनाशील राजकुमार कहना श्रेयस्कर समझूंगा। मेरी दृष्टि में, वाणी में वह एक ऐड प्रिंस हैं, क्राउन प्रिंस जिनका सिंहासनारूढ़ होना अभी शेष है। लेकिन, प्रभाकर त्रिवेणी संगम की छटा देखते उसमें गोते लगाते बड़े हुए हैं। इसलिए, सिर्फ विज्ञापन फिल्मों तक पहुंच कर ही उनका गंतव्य विराम नहीं पाता। वह भी त्रिधारा में गतिमान हैं। विज्ञापन की दुनिया में मग्न रहते हुए भी ऐड प्रिंस शुक्ला का मस्तिष्क नये नये शिल्प की तलाश में सतत शोध करता रहता है, रचनात्मकता को गतिमान करने के नित नए ढब तलाशता है।

 

एक दशक से एम डी एच मसाला को आधुनिक अंदाज़ में पुनर्स्थापित कर एक बार फिर सरताज बनाने में प्रभाकर शुक्ला की ही महती भूमिका है। वह एक ऐड कमर्शियल (विज्ञापन ) को भी एक फीचर फिल्म की तरह गंभीरता से लेते हैं। इनके बनाये विज्ञापन में भी आप ज़िंदगी के विभिन्न रस रंग का अनुभव आस्वादन कर सकते हैं। भावनात्मक जुड़ाव किसी विज्ञापन फिल्म में देखा, महसूस किया है कभी ? नहीं? तो प्रभाकर शुक्ला के फिल्माए विज्ञापन फिल्मों का अवलोकन करें — एम डी एच, एम डी एच करते हुए जान जाएंगे ज़िंदगी और रिश्तों के बीच के ताने-बाने का सच, सचमुच बिल्कुल सच सच!
प्रभाकर शुक्ला जो विज्ञापन के साथ डॉक्यूमेंट्री (वृत्त चित्र) अथवा फीचर फिल्म (कथा चित्र) के लिए भी बने हैं, दो दशक पूर्व *”कहानी गुड़िया की”* (दिव्या दत्ता, आरिफ जकारिया, राजपाल यादव) बनाकर वह सब कुछ प्रमाणित कर चुके हैं। अभी वह एक बिल्कुल ही नये और सर्वथा प्रासंगिक विषय को लेकर मन मस्तिष्क को झंकझोर देनेवाला मुद्दा उठाकर प्रस्तुत करने जा रहे हैं – “डिजिटल अरेस्ट” ! डिजिटल अरेस्ट औचक आया हुआ एक ऐसा साइबर क्राइम है जिसके चंगुल में कोई भी व्यक्ति आ सकता है, आता जा रहा है और कुछ कारगर और आक्रामक कदम नहीं उठाए गए तो होता रहेगा। ऐसा कोई नियम कानून नहीं है कि पुलिस विभाग अथवा बैंक व अन्य किसी संस्थागत इकाई से आपको फोन कर डराया धमकाया जाए और अवांछित भुगतान के लिए विवश कर दिया जाए। परन्तु, डिजिटल अरेस्ट में यह सब ही होता है और खूब होता है। वीडियो कॉलिंग कर इस फ्रॉड को विश्वसनीय बना आपकी नब्ज़ टटोली जाती है। फिर आपको असहज एवं असहाय बना कर बर्बाद कर दिया जाता है। सामान्य व्यक्ति डिजिटल अरेस्ट के इस मकड़जाल को समझ नहीं पाता और फंसता चला जाता है। इसी रैकेट का भंडाफोड़ होगा प्रभाकर शुक्ला की “डिजिटल अरेस्ट” में जो अभी लेखन की मेज पर मूर्तरूप ले रहा है। इस विषय पर गहन शोध संपर्क और परिचर्चा की ज़रूरत है जिसमें प्रभाकर पिल पड़े हैं।
इलाहाबाद (अब प्रयागराज) रेडियो और दूरदर्शन पर अपने आरंभिक जौहर दिखाते दिखाते प्रभाकर शुक्ला का कुछ तकनीकी कार्यवश मायानगरी मुंबई में भी आना जाना आरंभ हो गया। फिर तो वह यहीं आ बसे। तीन दशक पूर्व प्रभाकर ने एक ठोस निर्णय लिया और उसने मुंबई में खूंटा ठोक दिया। उनकी चपलता और हाजिरजवाबी बड़ा काम आई। ड्रीम पूरा हुआ, सामने ड्रीम गर्ल हेमा मालिनी थीं, हाथ में था “राहत रूह” और वह आत्मविश्वास से बोल रही थीं — तेल में जादू है। हुर्रे!!! प्रभाकर शुक्ला उछल पड़े, बन गए ऐड मेकर। राहत रूह की ठंढक इतनी असरदार हुई कि जोड़ों के दर्द गठिया दूर कराने हेतु “नूरानी तेल” वाले भी आ धमके। शुक्ला जी की तो बल्ले बल्ले। और इसी बीच शुक्ला कैम्पस पधारे – एम डी एच, एम डी एच। विश्वास करें, सच सच !!
ऑल द बेस्ट, फिलहाल, डिजिटल अरेस्ट!

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