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  • AIIMS गोरखपुर में प्रथम वर्ष एमबीबीएस छात्रों हेतु मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता एवं संवेदनशीलता कार्यक्रम का आयोजन

    AIIMS गोरखपुर में प्रथम वर्ष एमबीबीएस छात्रों हेतु मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता एवं संवेदनशीलता कार्यक्रम का आयोजन

    गोरखपुर ब्यूरो निष्पक्ष टुडे ;-

    भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय (MoHFW) की संस्तुतियों तथा माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य एवं कल्याण को बढ़ावा देने हेतु जारी दिशानिर्देशों के अनुपालन में, एआईआईएमएस गोरखपुर के मनोरोग विभाग द्वारा SAATHI नामक एक विशेष मॉड्यूल विकसित किया गया है,जिसका पूर्ण रूप “Student Awareness And Training for Holistic Intervention” है।

    इस मॉड्यूल का उद्देश्य चिकित्सा छात्रों में मानसिक स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशीलता, पीयर सपोर्ट तथा गेटकीपर प्रशिक्षण को सुदृढ़ करना है।गेटकीपर प्रशिक्षण के अंतर्गत छात्रों को यह सिखाया गया कि वे अपने सहपाठियों में मानसिक तनाव या जोखिम के शुरुआती संकेतों को पहचानकर समय रहते उचित सहायता एवं विशेषज्ञ सेवाओं तक पहुँचाने में सेतु की भूमिका निभा सकें।

    इसी क्रम में, 07 फरवरी 2026 को, एआईआईएमएस गोरखपुर के प्रथम वर्ष एमबीबीएस छात्रों (एमबीबीएस बैच 2025) के लिए मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता एवं संवेदनशीलता कार्यक्रम का आयोजन किया गया।

    यह कार्यक्रम निदेशक, मेजर जनरल डॉ. विभा दत्ता के सक्षम एवं प्रेरणादायी नेतृत्व में आयोजित किया गया। कार्यक्रम के अंतर्गत मनोरोग विशेषज्ञों द्वारा तैयार किया गया मॉड्यूल अत्यंत जीवंत, सहभागितापूर्ण एवं संवादात्मक रहा, जिसमें छात्रों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।

    इस अवसर पर

    कार्यकारी निदेशक ने छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को शैक्षणिक उत्कृष्टता का अभिन्न अंग बताते हुए ऐसे कार्यक्रमों की आवश्यकता पर बल दिया।

    डीन (शैक्षणिक) ने कहा कि मानसिक रूप से सशक्त विद्यार्थी ही भविष्य के सक्षम और संवेदनशील चिकित्सक बन सकते हैं।
    डीन (छात्र कल्याण) ने छात्रों को समय रहते सहायता लेने, एक-दूसरे का सहयोग करने तथा मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने का संदेश दिया।

    कार्यक्रम के अंत में छात्रों ने इसे अत्यंत उपयोगी बताते हुए भविष्य में भी ऐसे सत्रों के आयोजन की अपेक्षा व्यक्त की। यह SAATHI मॉड्यूल एआईआईएमएस गोरखपुर के मनोरोग विभाग की समर्पित टीम द्वारा विकसित किया गया है, जिसका नेतृत्व डॉ. मनोज पृथ्वीराज द्वारा किया गया।

    इस मॉड्यूल के विकास एवं प्रभावी प्रस्तुतीकरण में डॉ. समन्त तथा डॉ. रिचा का महत्वपूर्ण योगदान रहा। टीम द्वारा तैयार यह मॉड्यूल वैज्ञानिक, व्यावहारिक एवं संवादात्मक दृष्टिकोण पर आधारित है, जो छात्रों से सहज रूप से जुड़ने में सफल रहा।

    इस अवसर पर डॉ. मनोज पृथ्वीराज ने जानकारी दी कि SAATHI मॉड्यूल को वर्ष के दौरान चरणबद्ध रूप से न विभिन्न एमबीबीएस बैचों के लिए, नर्सिंग छात्रों, रेज़िडेंट डॉक्टर्स तथा पैरामेडिकल छात्रों के लिए भी लागू किया जाएगा, जिससे संस्थान में मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता एवं सहयोगात्मक वातावरण को व्यापक रूप से सुदृढ़ किया जा सके।

  • आधुनिक रीजनल एनेस्थीसिया व एनाल्जीसिया से सर्जरी हुई अधिक सुरक्षित और दर्द-मुक्त

    आधुनिक रीजनल एनेस्थीसिया व एनाल्जीसिया से सर्जरी हुई अधिक सुरक्षित और दर्द-मुक्त

    गोरखपुर ब्यूरो निष्पक्ष टुडे :-

    GRACE-1.0 में एनेस्थीसियोलॉजिस्ट की अहम भूमिका पर विशेषज्ञों की विस्तृत चर्चा

    आज के दौर में सर्जरी की सफलता केवल ऑपरेशन टेबल तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि मरीज की संपूर्ण सुरक्षा, ऑपरेशन के बाद दर्द से राहत और शीघ्र सामान्य जीवन में वापसी भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो गई है। इन सभी पहलुओं में एनेस्थीसियोलॉजिस्ट की भूमिका अत्यंत केंद्रीय और निर्णायक होती है।

    इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), गोरखपुर के एनेस्थीसियोलॉजी, पेन मेडिसिन एवं क्रिटिकल केयर विभाग द्वारा GRACE-1.0 (Gorakhpur Regional Anaesthesia Continuing Education 2026) का आयोजन किया गया।

    यह शैक्षणिक कार्यक्रम संस्थान की कार्यकारी निदेशक मेजर जनरल डॉ. विभा दत्ता, (सेवानिवृत्त) के सक्रिय एवं दूरदर्शी नेतृत्व में आयोजित हुआ, जिसका मुख्य उद्देश्य मरीजों को सुरक्षित, वैज्ञानिक तथा दर्द-मुक्त एनेस्थीसिया एवं पेन मैनेजमेंट सेवाएं प्रदान करना है।

    कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि रीजनल एनेस्थीसिया केवल सर्जरी के दौरान शरीर के किसी हिस्से को सुन्न करने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका महत्वपूर्ण उद्देश्य ऑपरेशन के बाद लंबे समय तक दर्द से राहत (एनाल्जीसिया) प्रदान करना भी है।

    अनेक सर्जरी में जनरल एनेस्थीसिया के साथ-साथ अल्ट्रासाउंड की सहायता से नर्व ब्लॉक्स दिए जाते हैं, जिससे सर्जरी के बाद होने वाला दर्द काफी हद तक कम हो जाता है। कुछ विशेष परिस्थितियों में केवल रीजनल एनेस्थीसिया से ही सर्जरी संभव होती है, जबकि कई जटिल मामलों में एक से अधिक नर्व ब्लॉक्स का संयोजन भी किया जाता है।

    विशेषज्ञों के अनुसार आधुनिक रीजनल एनेस्थीसिया तकनीकों से मरीजों को कई लाभ मिलते हैं, जिनमें शामिल हैं—

    * जनरल एनेस्थीसिया की दवाओं की आवश्यकता में कमी
    * ऑपरेशन के बाद तेज दर्द की संभावना कम होना
    * ओपिऑइड एवं तीव्र दर्द निवारक दवाओं पर निर्भरता घटना
    * उल्टी, चक्कर, अत्यधिक सुस्ती और सांस संबंधी जटिलताओं में कमी
    * मरीज का जल्दी बैठना, चलना और फिजियोथेरेपी शुरू कर पाना

    GRACE-1.0 में विशेषज्ञों ने बताया कि—

    * कंधे और हाथ की सर्जरी में नर्व ब्लॉक्स से लंबे समय तक प्रभावी दर्द राहत मिलती है
    * घुटने और हिप सर्जरी के बाद मरीज जल्दी चलने-फिरने में सक्षम हो जाता है
    * पेट और छाती की सर्जरी में विशेष ब्लॉक्स से ऑपरेशन के बाद कई घंटों तक आराम मिलता है

    इन सभी तकनीकों का उद्देश्य केवल सर्जरी कराना नहीं, बल्कि सर्जरी के बाद मरीज को अधिकतम आराम और शीघ्र रिकवरी प्रदान करना है।

    मल्टीमोडल एनाल्जीसिया: दर्द प्रबंधन का आधुनिक दृष्टिकोण

    कार्यक्रम में यह भी बताया गया कि आज दर्द नियंत्रण के लिए एक ही दवा पर निर्भर रहने के बजाय विभिन्न तरीकों का संयोजन अपनाया जाता है, जिसे मल्टीमोडल एनाल्जीसिया कहा जाता है।

    इसमें नर्व ब्लॉक्स, हल्की दर्द निवारक दवाएं और अन्य सहायक उपाय शामिल होते हैं, जिससे मरीज अधिक सुरक्षित रहता है और गंभीर दवाओं की आवश्यकता कम पड़ती है।
    कार्यक्रम के दौरान अल्ट्रासाउंड मशीन की सहायता से नसों को प्रत्यक्ष देखकर दवा देने का व्यावहारिक प्रशिक्षण भी दिया गया। इससे दवा सही स्थान पर पहुंचती है और जटिलताओं की संभावना न्यूनतम हो जाती है।

    विशेषज्ञों ने बताया कि एनेस्थीसियोलॉजिस्ट—
    * सर्जरी से पहले मरीज का संपूर्ण मूल्यांकन करते हैं
    * ऑपरेशन के दौरान जीवन-रक्षक निगरानी रखते हैं
    * ऑपरेशन के बाद दर्द नियंत्रण और रिकवरी की जिम्मेदारी निभाते हैं
    * आईसीयू और इमरजेंसी सेवाओं में भी अहम भूमिका निभाते हैं
    इस कार्यक्रम का आयोजन प्रो. (डॉ.) संतोष कुमार शर्मा,
    प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, एनेस्थीसियोलॉजी, पेन मेडिसिन एवं क्रिटिकल केयर, एम्स गोरखपुर
    के नेतृत्व में किया गया। कार्यक्रम की आयोजन सचिव डॉ. प्रियंका द्विवेदी रहीं।
    मरीजों के लिए महत्वपूर्ण संदेश

    डॉक्टरों ने मरीजों को सलाह दी कि सर्जरी से पहले वे—
    * ऑपरेशन के बाद दर्द से राहत के उपलब्ध विकल्पों के बारे में जानकारी लें
    * अपनी सभी बीमारियों और दवाओं की सही जानकारी दें
    * एनेस्थीसियोलॉजिस्ट से खुलकर संवाद करें
    इससे उपचार अधिक सुरक्षित, दर्द-मुक्त और शीघ्र स्वास्थ्य लाभ देने वाला बनता है।

  • एम्स में प्रो. (डॉ.) मनोज कुमार सिंह का विशेष व्याख्यान विषयों के एकीकरण और मानवीय मूल्यों पर जोर

    एम्स में प्रो. (डॉ.) मनोज कुमार सिंह का विशेष व्याख्यान विषयों के एकीकरण और मानवीय मूल्यों पर जोर

    गोरखपुर, 6 सितम्बर 2025: आज एम्स गोरखपुर के सभागार में एक विशेष शैक्षणिक सत्र आयोजित किया गया, जिसमें प्रो. (डॉ.) मनोज कुमार सिंह, पूर्व प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, पैथोलॉजी विभाग, एम्स नई दिल्ली ने एमबीबीएस छात्रों, नर्सिंग स्टाफ और संकाय सदस्यों को संबोधित किया।

    कार्यक्रम की शुरुआत एम्स गोरखपुर की कार्यकारी निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी, मेजर जनरल (डॉ.) विभा दत्ता एस.एम. (सेवानिवृत्त) द्वारा प्रो. सिंह के परिचय और स्वागत से हुई। उन्होंने प्रो. सिंह के डर्माटोपैथोलॉजी के क्षेत्र में अग्रणी योगदान को रेखांकित किया। उन्होंने यह भी जोर दिया कि चिकित्सा विज्ञान जितना महत्त्वपूर्ण है, उतना ही महत्त्वपूर्ण है मानवता और सहानुभूति। डॉक्टरों और नर्सों को हमेशा मरीजों के साथ करुणा, सम्मान और संवेदनशीलता से व्यवहार करना चाहिए।

    प्रो. सिंह ने छात्रों को निरंतर जिज्ञासा, नवाचार और परिश्रम की भावना बनाए रखने के लिए प्रेरित किया और कहा कि यही दृष्टिकोण उन्हें उत्कृष्ट चिकित्सक और संवेदनशील इंसान बनाएगा। व्याख्यान के अंत में छात्रों ने उत्साहपूर्वक प्रश्नोत्तर सत्र में भाग लिया और इसे अत्यंत प्रेरणादायी व उपयोगी बताया।

    एम्स गोरखपुर प्रशासन ने प्रो. सिंह का आभार व्यक्त किया और कहा कि ऐसे अतिथि व्याख्यान छात्रों की शैक्षणिक यात्रा को और समृद्ध बनाते हैं तथा उन्हें बेहतर चिकित्सक और बेहतर इंसान बनने की दिशा में मार्गदर्शन देते हैं।

    अपने प्रेरणादायी व्याख्यान में प्रो. सिंह ने कहा कि एमबीबीएस पाठ्यक्रम के प्रत्येक विषय का महत्व है और छात्रों को पहले सेमेस्टर से लेकर इंटर्नशिप और आगे एमडी/एमएस तक हर विषय का गहन अध्ययन करना चाहिए। उन्होंने बताया कि यही ज्ञान भविष्य में मरीजों की रोज़मर्रा की देखभाल और उपचार का आधार बनता है।

  • एम्स गोरखपुर के एमबीबीएस छात्र डीएचआर–एसटीएस 2025 के लिए चयनित

    एम्स गोरखपुर के एमबीबीएस छात्र डीएचआर–एसटीएस 2025 के लिए चयनित

    “हर वर्ष छात्र हासिल कर रहे हैं सफलता, संस्थान में अनुसंधान संस्कृति को मिल रहा बढ़ावा”

    गोरखपुर। 16 अगस्त 2025; एआईआईएमएस गोरखपुर ने एक बार फिर गौरव हासिल किया है। संस्थान के चार एमबीबीएस छात्रों का चयन इस वर्ष डीएचआर (स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग) की मानव संसाधन विकास योजना अंतर्गत प्रतिष्ठित “शॉर्ट-टर्म स्टूडेंटशिप (STS–2025)” में हुआ है। यह उपलब्धि संस्थान की उस निरंतर परंपरा को दर्शाती है जिसमें हर वर्ष एआईआईएमएस गोरखपुर के छात्र इस राष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धात्मक योजना में चयनित होकर संस्थान का नाम रोशन करते हैं।

    इस वर्ष चयनित छात्र और उनके शोध विषय इस प्रकार हैं:
    1. सुश्री दिशा शर्मा (द्वितीय वर्ष, बैच 2023)
    – मार्गदर्शक: डॉ. तेजस पटेल, अतिरिक्त प्रोफेसर, फार्माकोलॉजी विभाग
    – विषय: भारत में स्व-चिकित्सा (Self-Medication) की व्यापकता और धारणा का सिस्टमैटिक रिव्यू व मेटा-विश्लेषण।

    2. श्री सक्षम रावत (द्वितीय वर्ष, बैच 2023)
    – मार्गदर्शक: डॉ. मौसुमी पाणिग्राही, सहायक प्रोफेसर, फार्माकोलॉजी विभाग
    – विषय: एसीएल रिकन्स्ट्रक्शन सर्जरी मरीजों में नींद की गुणवत्ता और दर्द उपचार के बीच संबंध का अध्ययन।

    3. सुश्री श्रुतिप्रज्ञा महापात्र (द्वितीय वर्ष, बैच 2023)
    – lमार्गदर्शक: डॉ. राम शंकर रथ, सह-प्रोफेसर, सामुदायिक एवं परिवार चिकित्सा विभाग
    – विषय: मातृ-शिशु जोड़ी में एनीमिया की व्यापकता एवं उसका पोषण और संक्रमण से संबंध।

    4. श्री अभिनव त्रिपाठी (प्रथम वर्ष, बैच 2024)
    – मार्गदर्शक: डॉ. अमर प्रीत कौर, सह-प्रोफेसर, बायोकैमिस्ट्री विभाग
    – विषय: सोरायसिस में सर्केडियन रिद्म जीन (BMAL1 और PER1) की अभिव्यक्ति का अध्ययन।

    इस अवसर पर मेजर जनरल (डॉ.) विभा दत्ता, कार्यकारी निदेशक, एआईआईएमएस गोरखपुर ने छात्रों एवं उनके मार्गदर्शकों को बधाई दी। उन्होंने कहा,“एसटीएस–2025 में चयन हमारे लिए गर्व का क्षण है। यह उपलब्धि दर्शाती है कि एआईआईएमएस गोरखपुर न केवल उत्कृष्ट चिकित्सा शिक्षा प्रदान कर रहा है, बल्कि अनुसंधान संस्कृति को भी प्रोत्साहित कर रहा है। हमारे छात्र हर वर्ष इस योजना में चयनित होते रहे हैं, जो संस्थान की गुणवत्ता और प्रतिबद्धता का प्रमाण है।”

    एआईआईएमएस गोरखपुर ने चयनित छात्रों और उनके मार्गदर्शकों को शुभकामनाएँ दीं और आशा व्यक्त की कि उनका शोध चिकित्सा विज्ञान और जनस्वास्थ्य को नई दिशा प्रदान करेगा।

  • एम्स गोरखपुर मे पाथ एवं उत्तर प्रदेश स्वास्थ्य निदेशालय के सहयोग से वेक्टर जनित रोग प्रबंधन कार्यशाला का सफल आयोजन

    एम्स गोरखपुर मे पाथ एवं उत्तर प्रदेश स्वास्थ्य निदेशालय के सहयोग से वेक्टर जनित रोग प्रबंधन कार्यशाला का सफल आयोजन

    गोरखपुर। जनस्वास्थ्य क्षमता को सुदृढ़ बनाने एवं वेक्टर जनित रोगों (Vector-Borne Diseases – VBDs) के प्रति क्षेत्रीय प्रतिक्रिया को बेहतर करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) गोरखपुर ने PATH एवं उत्तर प्रदेश शासन के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य निदेशालय के सहयोग से एक दिवसीय वेक्टर जनित रोग केस मैनेजमेंट कार्यशाला का सफल आयोजन किया।
    PATH (Programme for Appropriate Technologies in Health) एक अंतरराष्ट्रीय गैर-लाभकारी संगठन है, जो विज्ञान, तकनीक और साझेदारी के माध्यम से स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक सुलभ, प्रभावी और न्यायसंगत बनाने के लिए कार्य करता है।

    कार्यशाला का उद्देश्य एवं दायरा :
    इस कार्यशाला का उद्देश्य चिकित्सकों, सामुदायिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों एवं जनस्वास्थ्य पेशेवरों को मलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया, लिम्फैटिक फाइलेरिया एवं विसरल लीशमैनियासिस (काला आजार ) जैसे रोगों के निदान, प्रबंधन एवं रोकथाम में उन्नत ज्ञान और व्यावहारिक कौशल प्रदान करना था। प्रतिभागियों ने विशेषज्ञ व्याख्यान, इंटरैक्टिव केस डिस्कशन और कौशल-आधारित डेमोंस्ट्रेशन सत्रों में भाग लिया।

    कार्यशाला की मुख्य विशेषताएं :
    • साक्ष्य-आधारित प्रोटोकॉल: राष्ट्रीय दिशा-निर्देशों एवं डब्ल्यूएचओ-अनुरूप उपचार प्रोटोकॉल के साथ नवीनतम निगरानी रणनीतियों की समीक्षा।
    • व्यावहारिक प्रशिक्षण: निदान तकनीक, रोगी ट्रायेज मॉडल और प्रकोप प्रबंधन उपकरणों पर अभ्यास।
    • सहयोगात्मक दृष्टिकोण: जिला स्वास्थ्य प्राधिकरण, अग्रिम पंक्ति के स्वास्थ्यकर्मी (आशा, एएनएम) और एआईआईएमएस गोरखपुर की क्लीनिकल टीमों के बीच समन्वित प्रतिक्रिया पर जोर।
    • रणनीतिक योजना: रेफरल सिस्टम, जन-जागरूकता अभियानों एवं डाटा-आधारित निर्णय प्रक्रिया को मजबूत करने के ढांचे पर चर्चा।
    इस मौके पर
    • मेजर जनरल (डॉ.) विभा दत्ता, कार्यकारी निदेशक, एआईआईएमएस गोरखपुर ने कहा: “यह कार्यशाला जनस्वास्थ्य क्षमता निर्माण और सामुदायिक लचीलापन बढ़ाने के प्रति हमारे संस्थान की प्रतिबद्धता का उत्कृष्ट उदाहरण है। मैं सभी चिकित्सकों से आग्रह करती हूँ कि इन रोगों के उन्मूलन के लिए सक्रिय योगदान दें। एआईआईएमएस इस क्षेत्र में उत्कृष्टता के लिए प्रतिबद्ध है।”
    • डॉ. सत्यब्रत, एनटीडी निदेशक, पीएटीएच ने कहा: “स्थानीय चिकित्सकों एवं जनस्वास्थ्य कर्मियों को सशक्त बनाना, इस क्षेत्र में वेक्टर जनित रोगों के खतरे को नियंत्रित करने और कम करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।”
    • उत्तर प्रदेश चिकित्सा एवं स्वास्थ्य निदेशालय के प्रतिनिधि ने कहा: “हम ऐसे साझेदारी प्रयासों के लिए प्रतिबद्ध हैं जो हमारी अग्रिम पंक्ति की स्वास्थ्य संरचना को मजबूत बनाते हैं।”
    • डॉ. अनिल कोपरकर, एआईआईएमएस गोरखपुर ने कहा: “शीघ्र निदान और त्वरित उपचार इन रोगों के नियंत्रण की कुंजी है। सामूहिक औषधि सेवन (MDA) की सफलता ही फाइलेरिया उन्मूलन की सफलता होगी। राज्य स्वास्थ्य प्राधिकरण के सहयोग से एआईआईएमएस वेक्टर जनित रोगों के निदान और उपचार के लिए उत्कृष्ट केंद्र बन सकता है।”
    विशेषज्ञ योगदान

    कार्यशाला में डॉ. जया चक्रवर्ती (बीएचयू), डॉ. शहवार काज़मी (WHO), डॉ. शोएब अनवर, राज्य एनटीडी लीड (PATH), तथा डॉ. कनिष्क एवं डॉ. बृजेश (एआईआईएमएस गोरखपुर) ने तकनीकी सत्र लिए।

    आयोजन में योगदान :
    इस आयोजन को सफल बनाने में डॉ. आनंद दीक्षित के नेतृत्व में डॉ. अनिल कोपरकर एवं डॉ. प्रदीप खार्या (सामुदायिक एवं परिवार चिकित्सा विभाग, एआईआईएमएस गोरखपुर) के साथ डॉ. सिद्धार्थ चक्रवर्ती एवं उनकी पाथ टीम का विशेष योगदान रहा।

    भविष्य की दिशा:
    यह कार्यशाला क्लीनिकल तत्परता एवं सामुदायिक प्रतिक्रिया तंत्र को और मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। प्रतिभागियों से प्राप्त फीडबैक के आधार पर आगामी प्रशिक्षण मॉड्यूल, कैस्केडिंग वर्कशॉप्स और क्षेत्रीय वेक्टर जनित रोग निगरानी एवं प्रबंधन टास्क फोर्स के गठन की योजना बनाई जाएगी।

    एम्स गोरखपुर पाथ, डब्ल्यूएचओ और उत्तर प्रदेश सरकार के साथ मिलकर पूर्वी उत्तर प्रदेश में जनस्वास्थ्य प्रणाली को मजबूत करने और वेक्टर जनित रोगों से बेहतर तैयारी सुनिश्चित करने के लिए सतत प्रयासरत है।

  • एम्स गोरखपुर में पहली बार हुआ सफल कॉर्निया प्रत्यारोपण, दृष्टिहीन महिला को मिली नई रोशनी

    एम्स गोरखपुर में पहली बार हुआ सफल कॉर्निया प्रत्यारोपण, दृष्टिहीन महिला को मिली नई रोशनी

    गोरखपुर, 30 जुलाई 2025। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), गोरखपुर में चिकित्सा क्षेत्र की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि दर्ज की गई है। कार्यकारी निदेशक मेजर जनरल (डॉ.) विभा दत्ता, एसएम (सेवानिवृत्त) के कुशल मार्गदर्शन में संस्थान में पहली बार कॉर्निया प्रत्यारोपण (Penetrating Keratoplasty) की सफल सर्जरी की गई।

    इस सर्जरी से लाभान्वित होने वाली 75 वर्षीय महिला मरीज विगत पांच वर्षों से एक आंख की कॉर्नियल ब्लाइंडनेस से पीड़ित थीं, जो मोतियाबिंद सर्जरी के जटिल परिणामस्वरूप उत्पन्न हुई थी। सर्जरी के बाद अब उन्हें 5 से 7 दिनों में दृष्टि लौटने की संभावना है, जिससे उनके जीवन की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार होगा।

    इस जटिल प्रक्रिया को नेत्र रोग विशेषज्ञों की एक समर्पित टीम ने अंजाम दिया, जिसमें डॉ. अलका त्रिपाठी, डॉ. नेहा सिंह, डॉ. ऋचा अग्रवाल, डॉ. अमित सिंह तथा रेज़िडेंट डॉक्टर साक्षी, डॉ. निवेदिता, डॉ. शगुन और डॉ. मैत्रेयी शामिल थीं। इस ऑपरेशन में नर्सिंग ऑफिसर प्राची और दिव्या ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

    इस प्रत्यारोपण के लिए कॉर्निया वारणसी स्थित ‘लायंस आई बैंक’ से प्राप्त किया गया, जो कि नेत्रदान के क्षेत्र में एक प्रमुख संस्था है।

    भारत में वर्तमान में लगभग 11 लाख लोग कॉर्नियल अंधत्व से ग्रसित हैं और प्रतिवर्ष 25,000 से अधिक नए मामले सामने आते हैं। दुर्भाग्यवश, कॉर्निया प्रत्यारोपण के लिए आवश्यक दान की संख्या अभी भी बहुत कम है। नेत्रदान मृत्यु उपरांत किया जाने वाला एक पूर्णतः स्वैच्छिक, निःस्वार्थ और सामाजिक कल्याणकारी कार्य है। मृत व्यक्ति के परिजन उनकी इच्छा के बिना भी नेत्रदान की अनुमति दे सकते हैं।

    एम्स गोरखपुर द्वारा की गई यह पहली कॉर्निया सर्जरी केवल एक चिकित्सा उपलब्धि नहीं, बल्कि समाज में नेत्रदान के प्रति जागरूकता फैलाने की दिशा में एक प्रेरणादायक पहल है। यह सफलता आने वाले समय में अनेक दृष्टिहीनों के जीवन में उजाला लाने की दिशा में एक मजबूत आधार बनेगी।

  • एम्स गोरखपुर में पहली बार सूजनयुक्त आंत्र रोग या आंतों का सूजन संबंधी रोग (IBD) के इलाज में बड़ी उपलब्धि

    एम्स गोरखपुर में पहली बार सूजनयुक्त आंत्र रोग या आंतों का सूजन संबंधी रोग (IBD) के इलाज में बड़ी उपलब्धि

    गोरखपुर, 23 जुलाई 2025। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), गोरखपुर में चिकित्सा के क्षेत्र में एक नई कामयाबी हासिल हुई है। यहां पहली बार छोटी आंत से पाउच बनाकर मलद्वार से जोड़ने की सर्जरी, Ileal Pouch Anal Anastomosis (IPAA) नाम की जटिल सर्जरी को सफलतापूर्वक अंजाम दिया गया है। यह सर्जरी उन मरीजों के लिए की जाती है जो Inflammatory Bowel Disease (IBD) से पीड़ित होते हैं और जिनका इलाज दवाओं से संभव नहीं होता।

    एम्स गोरखपुर में इससे पहले भी चार Subtotal Colectomy सर्जरी सफलतापूर्वक की जा चुकी हैं। इस उपलब्धि के साथ अब पूर्वांचल के मरीजों को जटिल आंत की बीमारियों का इलाज अपने ही क्षेत्र में मिल सकेगा।

    यह सर्जरी मल्टी-डिसिप्लिनरी टीम (MDT) के प्रयासों का परिणाम है, जिसमें सर्जरी विभाग, गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग और एनेस्थीसिया विभाग ने मिलकर काम किया।

    सर्जरी विभाग के प्रमुख डॉ. गौरव गुप्ता ने कहा, “यह हमारे विभाग और संस्थान के लिए गर्व की बात है। अब हम IBD के जटिल मरीजों का बेहतर इलाज दे सकते हैं।”

    गैस्ट्रो विभाग के प्रो. डॉ. सौरभ केडिया ने बताया, *“IBD का इलाज सिर्फ दवाओं से नहीं होता। जब दवाएं असर नहीं करतीं, तब सर्जरी की जरूरत पड़ती है। हम हर मरीज की स्थिति के अनुसार इलाज की योजना बनाते हैं।”*जीवनशैली में क्या बदलाव करें?

    IBD से पीड़ित मरीजों को अपने खानपान और जीवनशैली में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव करने चाहिए:

     सादा, सुपाच्य भोजन लें
    तेल, मसाले, तले हुए और प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों से बचें
    ज्यादा पानी पिएं, हाइड्रेटेड रहें
    धीरे-धीरे खाएं और खाना अच्छी तरह चबाएं
    तनाव कम करें – योग, ध्यान या हल्की कसरत मददगार हो सकती है
    धूम्रपान और शराब से बचें
    नियमित फॉलो-अप और दवा का पालन करें

    एनेस्थीसिया विभाग के डॉ. भूपेंद्र ने कहा कि इस तरह की लंबी और जटिल सर्जरी के दौरान मरीज की सुरक्षा और आराम सुनिश्चित करना बेहद जरूरी होता है। ऑपरेशन के दौरान नाड़ी, रक्तचाप और सांस की लगातार निगरानी की जाती है।

    सर्जरी करने वाली टीम में डॉ. रवि गुप्ता, डॉ. आशीष मिश्रा, डॉ. स्वाति और डॉ. हर्षा जागनानी शामिल रहे। एनेस्थीसिया टीम में डॉ. शांतोष, डॉ. भूपेंद्र, डॉ. आशीषुतोष और डॉ. नीरज ने अहम भूमिका निभाई।

    डॉ. रवि गुप्ता ने बताया कि इस सर्जरी में तीन चरण होते हैं :

    1. पहले चरण में बड़ी आंत को निकाल दिया जाता है।
    2. दूसरे में छोटी आंत से एक पाउच बनाया जाता है और उसे गुदा से जोड़ा जाता है।
    3. तीसरे चरण में बाहर निकाले गए रास्ते (स्टोमा) को बंद किया जाता है, ताकि मरीज बिना बाहरी स्टोमा बैग के सामान्य रूप से मल त्याग कर सके।
    संस्थान की कार्यकारी निदेशक मेजर जनरल (डॉ.) विभा दत्ता (सेवानिवृत्त) ने इस सफलता पर खुशी जताते हुए कहा, “यह सर्जरी पूर्वांचल के लिए एक नया अध्याय है। मरीजों को अब जटिल इलाज के लिए दूर नहीं जाना पड़ेगा। हम पूरी टीम को इस बड़ी उपलब्धि के लिए बधाई देते हैं।”

    मरीज की कहानी :
    उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले का 16 वर्षीय युवक, जिसे गंभीर अल्सरेटिव कोलाइटिस था, को अक्टूबर 2024 में एम्स लाया गया। पहले चरण में उसकी आपातकालीन सर्जरी की गई। फिर 9 महीने तक पोषण, दवाएं और स्वास्थ्य में सुधार लाने पर ध्यान दिया गया। अंततः 17 जुलाई 2025 को दूसरी सर्जरी कर IPAA प्रक्रिया पूरी की गई। अब मरीज स्वस्थ है और तेजी से ठीक हो रहा है।

    IBD क्या है ?
    IBD यानी Inflammatory Bowel Disease एक पुरानी बीमारी है जिसमें आंतों में बार-बार सूजन होती है। इसके लक्षणों में बार-बार दस्त, खून आना, पेट दर्द, वजन घटना, और थकान शामिल हैं। दवाओं से इलाज न होने पर सर्जरी की जरूरत पड़ती है।

    इस सर्जरी का महत्व :
    IPAA सर्जरी से मरीज को स्टोमा बैग से छुटकारा मिल सकता है और उसकी जीवन गुणवत्ता बेहतर होती है। यह एम्स गोरखपुर की एक बड़ी उपलब्धि है जो पूर्वांचल के हजारों मरीजों को उम्मीद और राहत देगी।

  • 15 वर्षों से चलने में असमर्थ व्यक्ति को एम्स गोरखपुर ने दी नई ज़िंदगी

    15 वर्षों से चलने में असमर्थ व्यक्ति को एम्स गोरखपुर ने दी नई ज़िंदगी

    गोरखपुर: जुलाई 2025। एम्स गोरखपुर ने एक असाधारण उपलब्धि हासिल करते हुए पिछले 15 वर्षों से चलने और खड़े होने में असमर्थ एक मरीज को सफल कूल्हा प्रत्यारोपण (Hip Replacement Surgery) के ज़रिए नई ज़िंदगी दी है। यह जटिल ऑपरेशन एम्स की कार्यकारी निदेशक मेजर जनरल (कार्यान्वित) डॉ. विभा दत्ता के कुशल नेतृत्व और हड्डी रोग विभाग के समर्पित प्रयासों से संभव हो पाया।

    मामले का विवरण:

    उत्तर प्रदेश के महाराजगंज निवासी 46 वर्षीय यह मरीज वर्ष 2002 में ऊँचाई से गिरकर ‘नेक ऑफ फीमर’ फ्रैक्चर (कूल्हे की हड्डी में गंभीर टूट) का शिकार हुआ था। स्थानीय निजी अस्पताल में प्राथमिक ऑपरेशन के बावजूद, अगले कुछ वर्षों में उसे दोबारा तेज़ दर्द और चलने-फिरने में असुविधा शुरू हो गई। होम्योपैथिक इलाज और अनेक डॉक्टरों से परामर्श लेने के बावजूद समस्या बनी रही। अंततः जब पिछले छह माह से पीड़ा असहनीय हो गई, तब वे एम्स गोरखपुर की हड्डी रोग ओपीडी में पहुँचे।

    जांच में पता चला कि कूल्हे के जोड़ की दोनों सतहें पूरी तरह खराब हो चुकी थीं, मांसपेशियां सिकुड़ चुकी थीं, और उनका बायां पैर छोटा हो गया था — जिससे खड़ा होना और चलना लगभग असंभव हो गया था।

    सफल सर्जरी:

    हड्डी रोग विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. अजय भारती के नेतृत्व में, एनेस्थीसिया विभाग के सहयोग से जटिल कूल्हा प्रत्यारोपण सर्जरी की गई, जो करीब 3.5 घंटे तक चली। ऑपरेशन पूर्णतः सफल रहा और मरीज अब बेहतर रिकवरी की ओर अग्रसर है।

    ऑपरेशन टीम में शामिल रहे

    हड्डी विभाग से: प्रो. डॉ. अजय भारती, सह-प्रो. डॉ. विवेक कुमार, डॉ. आशुतोष, डॉ. दिलीप, डॉ. दीपक
    एनेस्थीसिया विभाग से: विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. संतोष शर्मा, सह-प्रो. डॉ. गणेश निमजे

    निदेशक की सराहना:

    एम्स की कार्यकारी निदेशक मेजर जनरल डॉ. विभा दत्ता ने इस सराहनीय उपलब्धि पर दोनों विभागों को बधाई दी और कहा,
    “इस तरह की जटिल सर्जरी एम्स गोरखपुर की चिकित्सकीय उत्कृष्टता और टीम भावना का प्रमाण है। हम निरंतर ऐसे ही कार्यों से पूर्वांचल के लोगों को जीवन की नई आशा देते रहेंगे।”

  • एम्स गोरखपुर में नवजात शिशु की दुर्लभ जन्मजात विकृति की सफल सर्जरी

    एम्स गोरखपुर में नवजात शिशु की दुर्लभ जन्मजात विकृति की सफल सर्जरी

    गोरखपुर, जुलाई 2025। एम्स गोरखपुर में एक दिन के नवजात शिशु की दुर्लभ जन्मजात विकृति की सफल सर्जरी की गई, जो संस्थान के लिए एक उल्लेखनीय उपलब्धि है। यह शिशु एक निजी अस्पताल में जन्मा था, परंतु जन्म से ही उसे मल त्याग का प्राकृतिक छिद्र नहीं था , जिसे चिकित्सकीय भाषा में इम्परफोरेट एनस (Imperforate Anus) कहा जाता है। साथ ही, उसका मूत्रमार्ग अंडकोष के मध्य खुल रहा था और शिश्न छोटा व नीचे की ओर मुड़ा हुआ था, जिसे स्क्रोटल हाइपोस्पेडियस (Scrotal Hypospadias) कहा जाता है।

    शिशु की स्थिति गंभीर हो रही थी क्योंकि वह मल विसर्जन नहीं कर पा रहा था और पेट फूल रहा था। बच्चे को रात 11 बजे एम्स की आपातकालीन सेवाओं में लाया गया। आर्थिक रूप से कमजोर परिजनों की सहायता हेतु एम्स ने तत्परता से कार्रवाई की। सर्जरी विभागाध्यक्ष डॉ. गौरव गुप्ता के निर्देशन में शिशु को भर्ती किया गया। नियोनेटल आईसीयू की प्रभारी डॉ. अंचला भारद्वाज ने बाल रोग विभाग की प्रमुख से समन्वय कर नवजात को एनआईसीयू में भर्ती कराया।

    12 घंटे के भीतर ही आवश्यक जाँचें और प्रारंभिक चिकित्सा के पश्चात शिशु को ऑपरेशन थिएटर में ले जाया गया। 1500 ग्राम के इस नाजुक शिशु को सुरक्षित रूप से बेहोश करना अत्यंत चुनौतीपूर्ण था, जिसे एनेस्थीसिया विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. प्रियंका द्विवेदी की अगुवाई में विभागाध्यक्ष डॉ. संतोष कुमार शर्मा, डॉ. भूपेंद्र कुमार, डॉ. विजेता बाजपेयी और डॉ. रविशंकर की टीम ने सफलता से अंजाम दिया।

    सर्जरी डॉ. गौरव गुप्ता ने अपनी टीम  डॉ. धर्मेंद्र पीपल, डॉ. रजनीश कुमार, डॉ. संदीप कुमार, डॉ. ऐश्वर्या और डॉ. रज़ा  के साथ मिलकर की। शिशु के पेट में एक नया मार्ग बनाते हुए कोलोस्टॉमी की गई, ताकि मल निष्कासन संभव हो सके। आगे चलकर, जब शिशु 3–4 महीने का होगा, तब इस स्थिति के लिए दूसरी चरण की सर्जरी की जाएगी।

    यह सर्जरी एम्स गोरखपुर में इस प्रकार की जन्मजात विकृति की पहली सर्जरी है, जो संस्थान की नवजात देखभाल एवं सर्जिकल विशेषज्ञता का प्रमाण है।

    एम्स गोरखपुर की कार्यकारी निदेशक मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) डॉ. विभा दत्ता ने इस सफल सर्जरी के लिए डॉ. गौरव गुप्ता एवं उनकी टीम को हार्दिक बधाई दी है। साथ ही, एनेस्थीसिया एवं पीडियाट्रिक विभाग को भी नवजात की देखभाल व प्रबंधन के लिए सराहना प्रदान की है।

  • AIIMS गोरखपुर के अध्ययन से खुलासा , मोटापा और कुपोषण दोनों ही बुजुर्गों की याददाश्त को कर सकते हैं कमजोर

    AIIMS गोरखपुर के अध्ययन से खुलासा , मोटापा और कुपोषण दोनों ही बुजुर्गों की याददाश्त को कर सकते हैं कमजोर

    गोरखपुर, जुलाई 2025। AIIMS गोरखपुर के डॉक्टरों ने एक बड़े और अहम अध्ययन में पाया है कि बुजुर्गों में कुपोषण (कम मांसपेशियां) और मोटापा (खासतौर पर पेट के आसपास की चर्बी) – दोनों ही उनकी याददाश्त, ध्यान और सोचने की क्षमता को नुकसान पहुंचा सकते हैं।

    यह अध्ययन 60 वर्ष या उससे अधिक उम्र के 1013 बुजुर्गों पर किया गया। सभी की मानसिक क्षमताओं की जांच खास ICMR-MUDRA टूलबॉक्स के जरिए की गई।

    डॉक्टरों ने पाया कि जिन बुजुर्गों की बांहें पतली थीं (MUAC कम था), उनमें याददाश्त और भाषा की क्षमता कमजोर मिली। वहीं, जिनके पेट और कमर के आसपास ज्यादा चर्बी थी (WHR अधिक था), उनमें ध्यान, सोचने की ताकत, भाषा और स्मृति – सभी में गिरावट देखी गई।

    MUAC और WHR क्या होते हैं?
    MUAC (Mid Upper Arm Circumference)
    इसका मतलब है – **बांह के बीच वाले हिस्से का घेरा।
    यह माप शरीर में मांसपेशियों की मात्रा का संकेत देता है। MUAC कम होना शरीर में कमजोरी या कुपोषण को दर्शाता है। यह माप कंधे और कोहनी के बीच की बांह के बीचों-बीच लिया जाता है।

    WHR (Waist-Hip Ratio)
    इसका मतलब है – कमर और कुल्हे के घेरे का अनुपात।
    यह माप शरीर में पेट के आसपास जमा चर्बी (केन्द्रीय मोटापा) का पता लगाने में मदद करता है। कमर का घेरा नापकर उसे कुल्हे के घेरे से भाग दिया जाता है। WHR अधिक होना यह दर्शाता है कि व्यक्ति को भविष्य में शारीरिक और मानसिक बीमारियों का खतरा अधिक हो सकता है।

    ये दोनों माप साधारण टेप (measuring tape) से आसानी से लिए जा सकते हैं और किसी मशीन की ज़रूरत नहीं होती।
    AIIMS गोरखपुर की कार्यकारी निदेशक डॉ. विभा दत्ता ने कहा: “यह शोध बुजुर्गों की जिंदगी को बेहतर बनाने में मददगार हो सकता है। अगर हम ऐसे सरल और सस्ते उपायों को अपनाएं, तो हम समय रहते मानसिक समस्याओं को पहचान सकते हैं। AIIMS गोरखपुर इस तरह के समाज-हितैषी शोधों को हमेशा बढ़ावा देता रहेगा।”

    अध्ययनकर्ता डॉ. यू. वेंकटेश ने बताया:

     “बुजुर्गों में पोषण और व्यायाम का बड़ा महत्व है। अगर हम समय पर कुपोषण या पेट की चर्बी को पहचान लें, तो बुढ़ापे में दिमागी कमजोरी को काफी हद तक रोका जा सकता है। MUAC और WHR जैसे उपाय गांवों में भी आसानी से इस्तेमाल किए जा सकते हैं।”

    बुजुर्गों की मानसिक सेहत के लिए पोषण और शरीर की बनावट दोनों जरूरी हैं।
    डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों को चाहिए कि वे MUAC और WHR जैसे सरल तरीकों से बुजुर्गों की जांच करें।
    इससे समय रहते दिमागी गिरावट को रोका जा सकता है और बुजुर्गों की जिंदगी को बेहतर बनाया जा सकता है।

    AIIMS गोरखपुर का यह प्रयास न केवल एक बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि है, बल्कि बुजुर्गों की बेहतर देखभाल की दिशा में एक ठोस कदम भी है।