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  • चिकित्सक की सबसे बड़ी पहचान उसकी संवेदना: मुख्यमंत्री

    चिकित्सक की सबसे बड़ी पहचान उसकी संवेदना: मुख्यमंत्री

    एम्स गोरखपुर में 500 बेड की क्षमता वाले विश्राम सदन का शिलान्यास किया सीएम योगी ने,

    चिकित्सक की संवेदना से दूर हो जाती है मरीज की आधी बीमारी : मुख्यमंत्री,

    विश्राम सदन के रूप में गोरखपुर एम्स को प्राप्त हुई नई उपलब्धि: मुख्यमंत्री,

    रेफर करने की प्रवृत्ति से बचें चिकित्सक, क्रिटिकल केयर उपलब्ध कराने को रिस्क लेने की डालें आदत : सीएम योगी

    गोरखपुर, 18 अप्रैल। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि एक चिकित्सक की सबसे बड़ी पहचान उसकी संवेदना होती है। यदि किसी डॉक्टर के मन में संवेदना नहीं है तो वह डॉक्टर कहलाने का अधिकारी है या नहीं, इस पर विचार होना चाहिए। उसकी पहचान ही संवेदना से है। चिकित्सक की संवेदना गंभीर से गंभीर मरीज की आधी बीमारी को दूर कर सकती है। मुख्यमंत्री ने चिकित्सा संस्थानों के डॉक्टरों को यह नसीहत भी दी की वे बेवजह मरीजों को हायर सेंटर रेफर करने की प्रवृत्ति से बचें और मरीज को क्रिटिकल केयर उपलब्ध कराने में रिस्क लेने की आदत डालें।

    सीएम योगी शुक्रवार दोपहर बाद अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) गोरखपुर के परिसर में 500 लोगों की क्षमता वाले विश्राम सदन (रैन बसेरे) का भूमि पूजन-शिलान्यास करने के बाद उपस्थित जनसमूह को संबोधित कर रहे थे। 44.34 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाला यह विश्राम सदन पूर्वी उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा विश्राम सदन होगा। इसका निर्माण पावरग्रिड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड के सीएसआर निधि से कराया जा रहा। शिलान्यास समारोह में मुख्यमंत्री ने कहा कि कोई भी चिकित्सा संस्थान डॉक्टर के व्यवहार के माध्यम से संवेदना का केंद्र भी होता है। संवेदना के इस केंद्र में अगर एक मरीज भर्ती होने आता है तो उसके साथ कम से कम 3 या 4 अटेंडेंट होते हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश में तो कई बार अटेंडेंट की संख्या 10 तक हो जाती है। ऐसे में मरीज के साथ आने वाले अटेंडेंट को आश्रय की अच्छी व्यवस्था होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि 500 बेड के विश्राम सदन के शिलान्यास के साथ ही गोरखपुर एम्स को एक नई उपलब्धि प्राप्त हुई है।

    वटवृक्ष वन चुका है 2016 में एम्स के रूप में रोपा गया बीज,

    मुख्यमंत्री ने कहा कि एम्स गोरखपुर का शिलान्यास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जुलाई 2016 में किया था। 2019 में एम्स गोरखपुर का पहला मैच एडमिशन लिया था और 2021 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस एम्स का लोकार्पण किया था। 2016 में जो बीज एम्स के रूप में गोरखपुर में रोपा गया था, आज वह एक वटवृक्ष बनकर हजारों पीड़ितों को आरोग्यता के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए, एक नया जीवनदान देने का केंद्र बन गया है। उन्होंने कहा कि एम्स गोरखपुर में होगा, यह एक कल्पना मात्र लगती थी। हम लोग 2003 से इस आवाज को उठा रहे थे। उस समय अटल बिहारी वाजपेयी देश के प्रधानमंत्री थे। एम्स दिल्ली के बाहर भी स्थापित होंगे, इसके लिए उन्होंने छह एम्स की घोषणा की थी। पर, उसके बाद यह क्रम थम सा गया। मुख्यमंत्री ने कहा कि 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद बिना भेदभाव, सबका साथ, सबका विकास के मंत्र का साकार रूप स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में भी देखने को मिल रहा है। देश के अंदर 22 नए एम्स पीएम मोदी के कार्यकाल में, 10 वर्षों में बने हैं या बन रहे हैं। उनमें से गोरखपुर एम्स भी एक है। गोरखपुर में एम्स बने, इसके लिए 2003 में उठाई गई आवाज को 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आकार दिया।

    कोई गर्मी, सर्दी, बारिश में खुले में रहे, यह अमानवीय,

    सीएम योगी ने कहा कि वर्तमान में एम्स गोरखपुर की ऑक्युपेंसी 75 से 80 प्रतिशत है। आईसीयू, क्रिटिकल केयर और ट्रॉमा सेंटर में भर्ती होने वाले मरीज के परिजन उनके साथ नहीं रह सकते। उन्हें बाहर ही रहना पड़ता है। इस कैम्पस में कम से कम 1200 लोग ऐसे होंगे जिनको बाहर जहां-तहां सिर छुपाने के लिए पटरी पर, सड़कों के किनारे या फिर किसी अन्य जगह पर जाकर रहने के लिए मजबूर होना पड़ता है। उन्होंने कहा कि कोई व्यक्ति खुले में गर्मी, सर्दी या बारिश झेलने को मजबूर हो तो यब अमानवीय लगता है। ऐसे में यह आवश्यक है कि हम अपना मानवीय स्वरूप बनाएं और उन लोगों के बारे में सोचा जो अपने मरीज की पीड़ा के साथ यहां पर जुड़े हुए हैं। विश्राम सदन के रूप में हम ऐसी व्यवस्था बनाएं जहां पर अटेंडेंट को मिनिमम यूजर चार्ज पर रहने और सस्ते कैंटीन की सुविधा हो।

    चिकित्सा संस्थानों में अटेंडेंट के लिए व्यवस्था होनी ही चाहिए,

    मुख्यमंत्री ने करीब डेढ़ वर्ष पहले लखनऊ में एसजीपीजीआई के अपने दौरे के दौरान सड़कों पर बड़ी संख्या में लोगों को देख उनकी व्यवस्था के लिए अटेंडेंट शेल्टर होम बनाने के निर्देश दिए थे। मन में आया कि एसजीपीजीआई, केजीएमयू, बीएचयू में और एम्स गोरखपुर में पेशेंट अटेंडेंट के लिए कोई केंद्र बनने चाहिए। इसकी जिम्मेदारी अवनीश अवस्थी को दी गई। उन्होंने प्रयास शुरू किए तो पेट्रोलियम मिनिस्ट्री ने एसजीपीजीआई, केजीएमयू और आरएमएल के लिए तीन रैन बसेरे दिए। पावर मिनिस्ट्री के सहयोग से एम्स गोरखपुर के लिए रैन बसेरा स्वीकृत हुआ।

    याद दिलाया तीमारदारों के भोजन के लिए रियायती मॉडल,

    अपने संबोधन के दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बीआरडी मेडिकल कॉलेज में 20 साल पहले इंसेफेलाइटिस के पीक समय में शुरू किए गए तीमारदारों के भोजन के लिए रियायती मॉडल का भी उल्लेख किया। कहा कि एक समय बीआरडी मेडिकल कॉलेज इंसेफेलाइटिस हॉटस्पॉट था। वहां पर समूचे पूर्वी उत्तर प्रदेश के पेशेंट आते थे। वहां पर बड़ी अव्यवस्था देखने को मिलती थी। लोगों के पास खाने के लिए भोजन नहीं होता था। उस समय हम लोगों ने एक स्वयंसेवी संस्था से मिलकर व्यवस्था कराई थी। उस समय आठ रुपये में तीमारदारों के लिए दाल, चावल, रोटी, सब्जी की व्यवस्था शुरू की गई। उन्होंने कहा कि आज भी पेशेंट के अटेंडेंट को बीआरडी मेडिकल कॉलेज और गुरु गोरखनाथ चिकित्सालय में भी दस रुपये में भरपेट दाल, चावल, सब्जी, रोटी की सुविधा आज भी प्राप्त हो रही है।

    जिलों के मेडिकल कॉलेजों और जिला अस्पतालों को टेली कंसल्टेशन की सुविधा दे एम्स,

    मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपेक्षा जताई कि एम्स को आसपास के जिलों के मेडिकल कॉलेजों और जिला अस्पतालों में टेली कंसल्टेशन के जरिए विशेषज्ञ चिकित्सकों की सुविधा उपलब्ध करानी चाहिए। उन्होंने इसके लिए कोरोना काल में एसजीपीजीआई, केजीएमयू और आरएमएल के जरिये प्रशिक्षण देकर बनाए गए सिस्टम मॉडल का भी उल्लेख किया और बताया कि बाद में इससे हर जिले में आइसीयू और वेंटिलेटर की सुविधा मिली थी। उन्होंने कहा कि टेली कंसल्टेशन जैसी टेक्नोलॉजी का उपयोग कर अधिक से अधिक लोगों को राहत दी जा सकती है। कहा कि एम्स जैसे संस्थान आज जिनकी ओपीडी 4000 तक पहुंच चुकी है, अगर यहां पर सभी सुपर स्पेशलिटी की फैकल्टी आ जाएं तो यही ओपीडी जा 10000 पर चली जाएगी। ऐसे में एसजीपीजीआई की तर्ज पर एम्स गोरखपुर पूर्वी उत्तर प्रदेश का चिकित्सा हब बने और यहां से अन्य मेडिकल कॉलेजों को जोड़ते हुए यहां से टेली कंसल्टेशन दी जाए। इससे सामान्य मरीज को भागदौड़ नहीं करनी पड़ेगी।

    हर मरीज ज्ञान और अनुभव का आधार, रेफर करने की प्रवृत्ति से बचें,

    मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सरकारी चिकित्सा संस्थानों के डॉक्टरों को नसीहत दी कि वह अनावश्यक रूप से मरीजों को लखनऊ रेफर करने की प्रवृत्ति से बचें। उन्होंने कहा कि जिन जिलों में मेडिकल कॉलेज बन गए हैं, उनमे से कई में अभी भी मरीज को क्रिटिकल केयर या ट्रॉमा की सुविधा देने के लिए कोई रिस्क नहीं लिया जाता। पेशेंट को लखनऊ के लिए रेफर दिया जाता है। यह सब बंद होना चाहिए। क्रिटिकल केयर उपलब्ध कराते हुए रिस्क लेने की आदत डालनी होगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि हर मरीज डॉक्टर के लिए नए अनुभव और ज्ञान का आधार होता है। ऐसे में उन्हें मरीज को समय देना होगा। हम दस या पन्द्रह मरीज तक खुद को सीमित न कर लें। याद रखना चाहिए कि दुनिया के अंदर जितने भी अच्छे रिसर्च हुए हैं वह उन लोगों ने किए हैं जिनमें अधिक से अधिक डाटा कलेक्ट करने का सामर्थ्य रहा है।

    एम्स गोरखपुर की स्थापना के लिए सीएम योगी ने बहाया खून-पसीना : रविकिशन,

    सांसद रविकिशन शुक्ल ने कहा कि एम्स गोरखपुर की स्थापना का श्रेय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को है। उन्होंने इस संस्थान के लिए अपना खून-पसीना बहाया है। जनता को बेहतरीन स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराना हमेशा से उनकी उच्च प्राथमिकता रहा है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के नौनिहालों के लिए त्रासदी रही इंसेफेलाइटिस पर पूर्ण नियंत्रण इसका प्रमाण है।

    सीएम योगी के मार्गदर्शन में कम समय में ही एम्स गोरखपुर की उपलब्धियां मौन क्रांति की तरह : देशदीपक वर्मा
    शिलान्यास समारोह में एम्स गोरखपुर की गवर्निंग काउंसिल के चेयरमैन देशदीपक वर्मा ने कहा कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मार्गदर्शन और सहयोग से कम समय में ही गोरखपुर एम्स की उपलब्धियां मौन क्रांति की तरह है। वर्तमान में यहां पांच सुपर स्पेशलिटी डिपार्टमेंट संचालित हो चुके हैं। उन्होंने कहा कि गोरखपुर का एम्स प्रथम श्रेणी वाले संस्थानों की कतार में तेजी से शामिल हो रहा है।

    इस अवसर पर एम्स गोरखपुर की कार्यकारी निदेशक डॉ. विभा दत्ता ने कहा कि विश्राम सदन सिर्फ एक भवन नहीं है बल्कि रोगियों के परिजनों को आश्रय और बुनियादी सुविधाएं सुविधा दिलाने का संवेदनशील कदम है। उन्होंने कहा कि एम्स गोरखपुर चिकित्सा सुविधाओं के क्षेत्र में धीरे-धीरे नई ऊंचाइयों को छू रहा है। स्वागत संबोधन में पावरग्रिड के निदेशक (कार्मिक) यतींद्र द्विवेदी ने मुख्यमंत्री के स्वागत करते हुए बताया कि विश्राम सदन के निर्माण को 31 मार्च 2027 तक पूर्ण किए जाने का लक्ष्य है ।

    इस अवसर पर महापौर डॉ. मंगलेश श्रीवास्तव समेत कई जनप्रतिनिधि, मुख्यमंत्री के सलाहकार अवनीश अवस्थी, पावरग्रिड के कार्यपालक निदेशक (सीएसआर) जसवीर सिंह, उत्तरी क्षेत्र-3 के कार्यपालक निदेशक वाई.के. दीक्षित, उत्तरी क्षेत्र-3 के मानव संसाधन प्रमुख रमन सहित पावरग्रिड तथा एम्स, गोरखपुर के वरिष्ठ अधिकारी आदि प्रमुख रूप से उपस्थित रहे। एम्स गोरखपुर की गवर्निंग काउंसिल के चेयरमैन देशदीपक वर्मा और पावरग्रिड के निदेशक (कार्मिक) यतीन्द्र द्विवेदी ने मुख्यमंत्री को अंगवस्त्र, स्मृतिचिन्ह आदि भेंटकर उनका अभिनंदन किया। शिलान्यास के बाद और अपने सम्बोधन से पूर्व सीएम योगी ने विश्राम सदन के मैप, ले आउट का अवलोकन कर प्रोजेक्ट की जानकारी ली और जरूरी निर्देश दिए।

  • एम्स गोरखपुर में चिकित्सा की नई उपलब्धि: पहली बार सफल लेफ्ट एड्रेनलेक्टोमी और CUSA तकनीक से लिवर रिसेक्शन सर्जरी

    एम्स गोरखपुर में चिकित्सा की नई उपलब्धि: पहली बार सफल लेफ्ट एड्रेनलेक्टोमी और CUSA तकनीक से लिवर रिसेक्शन सर्जरी

    गोरखपुर, 5 अप्रैल 2025: एम्स गोरखपुर ने चिकित्सा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल करते हुए दो जटिल सर्जरी सफलतापूर्वक सम्पन्न की हैं। इनमें एक लेफ्ट एड्रेनलेक्टोमी (Left Adrenalectomy) और दूसरी CUSA तकनीक (Cavitron Ultrasonic Surgical Aspirator) की मदद से की गई लिवर रिसेक्शन शामिल है। यह दोनों सर्जरी संस्थान में पहली बार की गई हैं, जो न केवल तकनीकी दृष्टि से चुनौतीपूर्ण थीं, बल्कि मरीजों की दशा भी लंबे समय से जटिल बनी हुई थी।

    “पहला मामला: वर्षों से दर्द झेल रही महिला में एड्रेनल ट्यूमर की पहचान”

    सिकंदराबाद निवासी 36 वर्षीय महिला को पेट में लंबे समय से लगातार दर्द की शिकायत थी, जिसका कहीं सटीक निदान नहीं हो पाया था। वे एम्स गोरखपुर की ओपीडी में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. रवि गुप्ता के पास पहुंचीं। विस्तृत जांच (सीटी स्कैन, एमआरआई) और हार्मोनल परीक्षणों के बाद यह स्पष्ट हुआ कि मरीज को बाईं ओर एक बड़ा नॉन-फंक्शनल एड्रेनल ट्यूमर है।

    एड्रेनल ग्लैंड, जो किडनी के ऊपर स्थित होता है, वहां की गई यह सर्जरी अत्यधिक जटिल थी क्योंकि यह हिस्सा आसपास की नाजुक नसों और अंगों के बहुत पास होता है। एम्स गोरखपुर की सर्जरी टीम ने बेहद सावधानी से यह लेफ्ट एड्रेनलेक्टोमी सफलतापूर्वक की।

    “दूसरा मामला: बाहर गैल ब्लैडर स्टोन समझा गया, एम्स में निकला कैंसर”

    76 वर्षीय महिला, जो पेट के ऊपरी दाहिने हिस्से में दर्द की शिकायत के साथ एम्स गोरखपुर आई थीं, उन्हें पहले किसी अन्य अस्पताल में गैल ब्लैडर स्टोन का मरीज बताया गया था। लेकिन एम्स में किए गए सीटी स्कैन और एमआरआई से पता चला कि उन्हें गैल ब्लैडर कैंसर है। इसके बाद रैडिकल कोलेसिस्टेक्टॉमी की योजना बनाई गई, जिसमें गैल ब्लैडर और लिवर का प्रभावित भाग हटा दिया गया।

    इस सर्जरी में पहली बार एम्स गोरखपुर में आधुनिक CUSA तकनीक का प्रयोग किया गया। यह तकनीक अल्ट्रासोनिक तरंगों की मदद से लिवर से कैंसरग्रस्त ऊतक को इस प्रकार हटाती है कि आसपास के स्वस्थ ऊतक प्रभावित न हों। इससे रक्तस्राव बहुत कम होता है और मरीज की रिकवरी तेज हो जाती है।

    “विशेषज्ञ टीम और समर्पित सहयोग”

    दोनों सर्जरी कार्यकारी निदेशक मेजर जनरल (डॉ.) विभा दत्ता और सर्जरी विभागाध्यक्ष डॉ. गौरव गुप्ता के मार्गदर्शन में की गईं। ऑपरेशन टीम का नेतृत्व डॉ. रवि गुप्ता, डॉ. शानवाज अहमद, डॉ. धर्मेंद्र, डॉ. मुकुल ने किया।
    वरिष्ठ रेजिडेंट्स डॉ. रवि और डॉ. शालिनी तथा जूनियर रेजिडेंट्स डॉ. ऐश्वर्या, डॉ. दर्शन, डॉ. शांतोष, और डॉ. एलेन ने सर्जरी में अहम भूमिका निभाई।

    एनेस्थीसिया और क्रिटिकल केयर मॉनिटरिंग का नेतृत्व डॉ. विक्रम वर्धन ने किया, जिसमें डॉ. भूपेंद्र, डॉ. सोनम, डॉ. संतोष, डॉ. गणेश नेमजे और डॉ. प्रियंका के साथ रेजिडेंट्स ने सक्रिय भागीदारी निभाई।

    “एम्स गोरखपुर का विस्तार और भविष्य की दिशा”

    इन दोनों जटिल सर्जरी की सफलता यह दर्शाती है कि एम्स गोरखपुर अब न केवल गंभीर और जटिल मामलों की सटीक पहचान कर रहा है, बल्कि अत्याधुनिक तकनीकों के उपयोग से सुरक्षित और प्रभावशाली इलाज भी उपलब्ध करा रहा है। यह उपलब्धि पूर्वांचल क्षेत्र के लाखों मरीजों के लिए आशा की किरण बनकर उभरी है।

  • एम्स गोरखपुर में विश्व ऑटिज़्म दिवस पर जागरूकता व्याख्यान का आयोजन

    एम्स गोरखपुर में विश्व ऑटिज़्म दिवस पर जागरूकता व्याख्यान का आयोजन

    गोरखपुर। 4 अप्रैल 2025, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), गोरखपुर में विश्व ऑटिज़्म दिवस 2025 के अवसर पर एक जन-जागरूकता व्याख्यान का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम विकार (ASD) के प्रति आम जनता, अभिभावकों और स्वास्थ्य कर्मियों को जागरूक करना था।

    ऑटिज़्म: एक न्यूरो-विकासात्मक विकार

    कार्यक्रम में बाल रोग विभाग की विभागाध्यक्ष प्रोफेसर महिमा मित्तल ने ऑटिज़्म की प्रस्तुति दी, जिसमें इसके प्रारंभिक लक्षणों एवं सामाजिक-व्यवहारिक संकेतों के बारे में विस्तार से बताया गया। उन्होंने कहा कि समय पर पहचान और उचित हस्तक्षेप से ऑटिज़्म से पीड़ित बच्चों को एक बेहतर जीवन देने में मदद मिल सकती है।

    कार्यक्रम में बाल रोग विभाग की सीनियर रेजिडेंट डॉ. गरिमा ने ऑटिज़्म पर एक विस्तृत प्रस्तुति दी, जिसमें निदान, उपचार, और अभिभावकों की भूमिका पर प्रकाश डाला गया। उन्होंने वीडियो क्लिप्स और केस स्टडीज़ के माध्यम से प्रतिभागियों को ऑटिज़्म के व्यवहारिक लक्षणों को समझने में मदद की।

    इस अवसर पर डॉ. मनीष कुमार, डॉ. अंचला भारद्वाज, डॉ. ममता गुप्ता सहित कई फैकल्टी सदस्य, मेडिकल छात्र, नर्सिंग स्टाफ और अभिभावक उपस्थित रहे।

    इंटरेक्टिव सत्र और जागरूकता बढ़ाने की पहल

    कार्यक्रम के अंत में प्रश्नोत्तर सत्र का आयोजन किया गया, जिसमें उपस्थित लोगों ने ऑटिज़्म से जुड़ी अपनी शंकाएँ और समस्याएँ विशेषज्ञों से साझा कीं। विशेषज्ञों ने इन प्रश्नों के उत्तर देकर ऑटिज़्म को लेकर समाज में फैली भ्रांतियों को दूर करने का प्रयास किया।

    ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) क्या है?

    ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) एक जटिल न्यूरो-विकासात्मक विकार है, जो व्यक्ति के सामाजिक संपर्क, संचार कौशल और व्यवहार को प्रभावित करता है। यह समस्या जीवनभर बनी रह सकती है, और इसके लक्षण बचपन में ही प्रकट हो जाते हैं।

    ऑटिज़्म से पीड़ित बच्चों की दुनिया बाकी बच्चों से अलग होती है। वे अक्सर लोगों से नज़रें नहीं मिलाते, नाम पुकारने पर प्रतिक्रिया नहीं देते और अपनी दुनिया में ही खोए रहते हैं। कई मामलों में वे बोलने में देरी करते हैं, दोहराव वाले व्यवहार प्रदर्शित करते हैं, या कुछ विशेष रुचियों में असामान्य रूप से गहराई से डूबे रहते हैं।

    ऑटिज़्म का कोई निश्चित कारण नहीं है, लेकिन शोधकर्ताओं का मानना है कि इसमें आनुवंशिक और पर्यावरणीय कारक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हालांकि, समय पर पहचान और सही हस्तक्षेप से स्थिति को नियंत्रित किया जा सकता है, जिससे बच्चे का विकास बेहतर हो सकता है।

    एम्स गोरखपुर द्वारा आयोजित यह व्याख्यान समाज में ऑटिज़्म के प्रति समझ, सहानुभूति और समावेशी सोच को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ। विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि समाज में ऑटिज़्म से ग्रसित बच्चों और उनके परिवारों को सहयोग और संवेदनशीलता की जरूरत है, जिससे वे बेहतर जीवन जी सकें।

    इस महत्वपूर्ण आयोजन की प्रशंसा एम्स गोरखपुर की कार्यकारी निदेशक मेजर जनरल डॉ. विभा दत्ता द्वारा की गई, जिन्होंने स्वयं सत्र को सुविधाजनक और प्रेरणादायक बनाने में योगदान दिया।

  • एम्स गोरखपुर में केंद्र सरकार की प्रधान मंत्री आयुष्मान योजना के तहत पैंक्रियास के कैंसर का हुआ मुफ्त व्हिप्पल्स ऑपरेशन !

    एम्स गोरखपुर में केंद्र सरकार की प्रधान मंत्री आयुष्मान योजना के तहत पैंक्रियास के कैंसर का हुआ मुफ्त व्हिप्पल्स ऑपरेशन !

    गोरखपुर एम्स के सर्जरी विभाग ने जटिल ऑपरेशन्स की श्रंखला में एक और सफलता अर्जित की !

    एक 55 वर्षिय वृद्ध पीलिया की शिकायत एवं शरीर में खुजली की समस्या से कई दिनों से पीड़ित था। कई जगह इलाज़ लेने के बाद जब समस्या का हल नहीं मिल पाया तो उसने एम्स के सर्जरी विभाग के सह आचार्य डॉ धर्मेंद्र पिपल को दिखाया। डॉ पिपल ने जांचों के पाया की मरीज़ एमपूलरी कैंसर से पीडत है ,जो की एक तरह का पैंक्रिअटिक कैंसर होता है। एम्स के गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग के डॉ सौरभ केड़िया ने मरीज़ की एंडोस्कोपी कर जांच में पता लगाया की मरीज़ को एम्पुला के पास एक गाँठ है जिसकी वज़ह से मरीज़ की कॉमन बाइल डक्ट में रुकावट की वजह से पीलिया बढ़ता जा रहा है |

    इस कैंसर का इलाज़ व्हिप्प्ल्स ऑपरेशन के द्वारा ही सम्भव है और वो भी अगर समय पर नहीं हो तो कैंसर फ़ैल सकता है और तब ऑपरेशन करना संभव नहीं होता | यह व्हिप्प्ल्स आपरेशन बहुत जटिल ऑपेऱशनों में से एक है, जिसमे आमाशय का दूरस्थ भाग, कॉमन बाइल डक्ट , ड्योडेनाम, जेजुनम, पैंक्रिअटिक हैड एवं कई लिम्फ नोड्स को निकाला जाता है| तत्पश्चात अमाशय, पैंक्रियास एवं कॉमन बाइल डक्ट के बचे हुए भागों को जेजुनम से जोड़ना पड़ता है| कई तरह के आंतों में जोड़ होने की वजह से बाइल, पैंक्रिअटिक जूस और कभी कभी मल का लीक होने की भी समस्या खड़ी हो सकती है, जिसकी वजस से मरीज़ की जान भी जा सकती है |

    मरीज़ और उसके परिजनों को बीमारी एवं उसके उपचार केबारे में पूरी तरह बताया गया! ऑपरेशन के दौरान एवं बाद में होने वाले सभी परिणामों एवं दुश्परिणाममों के बारे में विस्तारपूर्वक सम्पूर्ण जानकारी देने के बाद सहमति ली गई एवं ऑपरेशन का निर्णय लिया गया! मरीज़ और परिजनों ने एम्स के सर्जरी विभाग पर भरोसा जताया और आयुष्मान योजना के आर्थिक सहयोग से उसके स्वस्थ्य लाभ मिल सका !

    मरीज़ के ऑपरेशन को आज 15 दिन हो चुके हैं। ऑपरेशन में करीब 7 से 8 घंटे तक का समय लगा, तत्पश्चात मरीज को अनेस्थेसिस विभाग के नवनिर्मित क्रिटिकल केयर यूनिट में रखा गया, जहाँ क्रिटिकल केयर टीम ने मरीज की दिन रात देखभाल कर ऑपरेशन को सफल बनाया। अब मरीज की सेहत में तीव्र गति से सुधार हो रहा है। उसने खाना पीना भी शुरू कर दिया है, और जल्द ही उसे छुट्टी भी दे दी जायेगी।

    चूँकि, इस ऑपरेशन में बहुत खर्चा आता है, गरीब मरीज़ों के लिए यह ऑपरेशन करा पाना बहुत ही असंभव है! गोरखपुर एम्स में केंद्र सरकार की आयुष्मान योजना इस मरीज़ के लिए काफी लाभदायक एवं जीवनदायक सिद्ध हुई! इस योजना की वजह से मरीज के ऑपरेशन में उपयोग में आने वाले महँगे उपकरण एवं दवाएं जैसे की स्टैप्लरस, हायर एंटीबायोटिक्स, एल्ब्युमिन, टीपीएन इत्यादि मुफ्त में एम्स की अमृत फार्मेसी द्वारा उपलब्ध कराये गए!

    ऑपरेशन करने वाली टीम : डॉ धर्मेंद्र कुमार पीपल ( सह आचार्य ), डॉ रजनीश ( सहायक आचार्य ), डॉ गौरव गुप्ता (एडिशनल प्रोफेसर एंड हेड ), डॉ रवि गुप्ता ( सह आचार्य ) डॉ रवि प्रकाश ( सीनियर रेजिडेंट ) , डॉ आदित्य , डॉ स्वाति , डॉ ऐश्वर्या डॉ राजेश , डॉ हर्षा , डॉ दर्शन , डॉ राजा मुर्तज़ा , डॉ शशिकांत, एनेस्थीसिया एवं क्रिटिकल केयर टीम: डॉ सोनम पटेल, डॉ संतोष , डॉ विक्रम वर्धन , डॉ भूपेंद्र सिंह , डॉ सीमा यादव, डॉ प्रियंका , डॉ विजयेता , डॉ गणेश निमजे , डॉ रविशंकर , डॉ अंकिता काबी, डॉ गौरव , डॉ अजय ,डॉ अरुंधति, डॉ रिया , डॉ आशुतोष, डॉ उर्वशी, सिस्टर संगीथा।

    एम्स गोरखपुर की कार्यकारी निदेशक मेजर डॉ विभा दत्ता ने सर्जरी विभाग को उत्कर्ष कार्य की सराहना कर भविष्य में और ऐसे कार्य करने के लिए प्रेरित किया।

  • एम्स गोरखपुर में पहली बार सफलतापूर्वक कॉक्लियर इम्प्लांट सर्जरी संपन्न

    एम्स गोरखपुर में पहली बार सफलतापूर्वक कॉक्लियर इम्प्लांट सर्जरी संपन्न

    गोरखपुर। एम्स गोरखपुर के ईएनटी विभाग ने चिकित्सा के क्षेत्र में एक नया कीर्तिमान स्थापित करते हुए चार वर्षीय जन्मजात बधिर (श्रवण बाधित) बच्चे पर पहली बार कॉक्लियर इम्प्लांट सर्जरी सफलतापूर्वक संपन्न की। यह उपलब्धि पूर्वांचल में उन्नत श्रवण पुनर्वास की दिशा में एक बड़ा कदम है।

    इस जटिल सर्जरी का संचालन डॉ. पंखुरी मित्तल द्वारा किया गया, जो कि एसएमएस जयपुर के प्रो. मोहनिश ग्रोवर के मार्गदर्शन और मेंटरशिप में संपन्न हुआ। इस शल्य चिकित्सा दल में डॉ. नैन्सी (सीनियर रेजिडेंट) और नर्सिंग ऑफिसर आकांक्षा शामिल थीं, जिन्होंने इस प्रक्रिया को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके अलावा, डॉ. विक्रम वर्धन के नेतृत्व में डॉ. सोनम, डॉ. रवि और डॉ. गौरव की एनेस्थीसिया टीम ने बच्चे की सुरक्षा और आराम सुनिश्चित किया।

    इस कॉक्लियर इम्प्लांट का आधा खर्च उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा वहन किया गया, जिससे इस जीवन-परिवर्तनकारी सर्जरी को संभव बनाया जा सका। यह सरकार की ओर से श्रवण बाधित बच्चों के उपचार हेतु किए जा रहे प्रयासों का प्रमाण है।

    कॉक्लियर इम्प्लांट और नवजात श्रवण जांच के लाभ

    कॉक्लियर इम्प्लांट उन लोगों के लिए एक क्रांतिकारी तकनीक है, जो जन्म से ही सुनने में असमर्थ होते हैं। यह उपकरण सुनने और भाषा सीखने की क्षमता को विकसित करने में मदद करता है, जिससे बच्चे का सामाजिक और शैक्षिक विकास बेहतर होता है। इस सर्जरी से बच्चे सामान्य स्कूलों में पढ़ने और समाज के साथ घुलने-मिलने में सक्षम हो सकते हैं।

    इसके साथ ही, नवजात श्रवण जांच (Neonatal Hearing Screening) अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे जन्म के तुरंत बाद ही श्रवण दोष की पहचान की जा सकती है। यदि पहले छह महीनों में इस समस्या का निदान कर लिया जाए और उपचार शुरू किया जाए, तो बच्चे के भाषा और संचार कौशल में जबरदस्त सुधार हो सकता है। एम्स गोरखपुर इस दिशा में जागरूकता बढ़ाने और अधिक से अधिक बच्चों को समय पर उपचार प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध है।

    एम्स गोरखपुर इस उपलब्धि को साकार करने में अमूल्य सहयोग के लिए कार्यकारी निर्देशिका मेजर डॉ. विभा दत्ता का विशेष धन्यवाद अर्पित करता है।

    यह ऐतिहासिक सफलता एम्स गोरखपुर की उन्नत चिकित्सा सेवा की प्रतिबद्धता को दर्शाती है और भविष्य में कई और बच्चों को सुनने और संवाद करने की क्षमता प्राप्त करने का अवसर प्रदान करेगी।

  • 12 वर्षों से बंद मरीज के मुंह को 3 घंटे चले ऑपरेशन से खोला गया

    12 वर्षों से बंद मरीज के मुंह को 3 घंटे चले ऑपरेशन से खोला गया

    अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), गोरखपुर के दंत रोग विभाग ने एक जटिल सर्जरी को सफलतापूर्वक अंजाम दिया, जिससे 12 वर्षों से बंद मरीज का मुंह फिर से खुल सका। इस ऑपरेशन को ओरल एंड मैक्सिलोफेशियल सर्जन डॉ. शैलेश कुमार एवं उनकी टीम ने पूरा किया।

    गोरखपुर ज़िले के बेलघाट निवासी 22 वर्षीय युवती पिछले 12 वर्षों से कान के घाव एवं उसके ऑपरेशन के बाद जटिलता से ग्रसित थी। धीरे-धीरे उसके सिर और निचले जबड़े की हड्डी आपस में जुड़ गई, जिससे वह मुंह खोलने में असमर्थ हो गई। परिणामस्वरूप, वह केवल तरल आहार पर निर्भर थी और कुपोषण का शिकार हो गई थी। कई अस्पतालों और डॉक्टरों से परामर्श के बाद भी राहत न मिलने पर युवती के पिता ने एम्स गोरखपुर में दंत रोग विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. शैलेश कुमार से संपर्क किया।

    “जटिल ऑपरेशन को 3 घंटे में किया गया पूरा”

    जांच और स्कैन के बाद पता चला कि मरीज के खोपड़ी की हड्डी और निचले जबड़े की हड्डी पूरी तरह से जुड़ चुकी थी। सामान्यत: ऐसे ऑपरेशन में 5-6 घंटे का समय लगता है, लेकिन एक नई तकनीक अपनाकर डॉक्टरों ने केवल 3 घंटे में सर्जरी को सफलतापूर्वक पूरा कर लिया।

    ऑपरेशन के दौरान चेहरे की नसों को सुरक्षित रखते हुए जुड़ी हुई हड्डी को निकाला गया। हड्डी दोबारा न जुड़े, इसके लिए मरीज के सिर के अंदर से फैट का एक हिस्सा काटकर जबड़े के जॉइंट में डाला गया। इस प्रक्रिया को “इंटरपोजीशनल आर्थोप्लास्टी” कहा जाता है।

    “बेहोशी की प्रक्रिया भी थी चुनौतीपूर्ण”

    ऐसे मामलों में बेहोशी देना एक बड़ी चुनौती होती है, क्योंकि मरीज का मुंह पूरी तरह से बंद था। इस कारण निश्चेतना विभाग की टीम ने नाक के जरिए फाइबर ऑप्टिक स्वास नली डालकर बेहोशी देने की प्रक्रिया पूरी की।

    “एम्स निदेशक एवं ED ने की सराहना”

    एम्स निदेशक एवं सीईओ मेजर जनरल (डॉ.) विभा दत्ता को दंत रोग विभाग द्वारा इस विशेष ऑपरेशन की जानकारी दी गई। उन्होंने डॉ. शैलेश कुमार एवं उनकी टीम को बधाई देते हुए कहा कि यह एम्स गोरखपुर के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। उन्होंने यह भी कहा कि एम्स गोरखपुर में अब इस तरह की जटिल सर्जरी संभव हो गई है, जिससे मरीजों को दिल्ली या लखनऊ जाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

    दंत रोग विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर डॉ. श्रीनिवास ने पूरी टीम को इस जटिल ऑपरेशन की सफलता पर बधाई दी और इसे विभाग के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया।

    “ऑपरेशन टीम में ये विशेषज्ञ रहे शामिल”

    इस जटिल ऑपरेशन को सफलतापूर्वक पूरा करने वाली टीम में शामिल थे:

    – मैक्सिलोफेशियल सर्जन: डॉ. शैलेश कुमार
    – सहयोगी सर्जन: डॉ. प्रवीण सिंह (सीनियर रेजिडेंट), डॉ. सौरभ सिंह (जूनियर रेजिडेंट)
    – निश्चेतना विभाग: प्रोफेसर डॉ. संतोष कुमार शर्मा, डॉ. शफाक (सीनियर रेजिडेंट), डॉ. अभिषेक (एकेडमिक जूनियर रेजिडेंट)

    “भविष्य के लिए महत्वपूर्ण संदेश”

    डॉ. शैलेश कुमार ने बताया कि सही समय पर उचित इलाज मिलने से इस तरह के जटिल ऑपरेशन से बचा जा सकता है। उन्होंने आम जनता से अपील की कि चेहरे की किसी भी चोट या समस्या को नज़रअंदाज़ न करें और हमेशा ओरल एंड मैक्सिलोफेशियल सर्जन से परामर्श लें, क्योंकि वे ऐसे मामलों के सुपरस्पेशलिस्ट होते हैं।

    ऑपरेशन के बाद मरीज की हालत स्थिर है, और वह एम्स गोरखपुर के ओएमएफएस वार्ड में डॉक्टरों की निगरानी में है।इस सर्जरी से युवती के चेहरे की विकृति, साँस की समस्या (OSA) एवं मानसिक दुष्प्रभावों को रोकने में मदद मिली है।

    यह सफल ऑपरेशन न केवल एम्स गोरखपुर के लिए एक बड़ी उपलब्धि है, बल्कि इस क्षेत्र के मरीजों के लिए भी एक आशा की किरण साबित हुआ है।