गोरखपुर। 4 अप्रैल 2025, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), गोरखपुर में विश्व ऑटिज़्म दिवस 2025 के अवसर पर एक जन-जागरूकता व्याख्यान का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम विकार (ASD) के प्रति आम जनता, अभिभावकों और स्वास्थ्य कर्मियों को जागरूक करना था।
ऑटिज़्म: एक न्यूरो-विकासात्मक विकार
कार्यक्रम में बाल रोग विभाग की विभागाध्यक्ष प्रोफेसर महिमा मित्तल ने ऑटिज़्म की प्रस्तुति दी, जिसमें इसके प्रारंभिक लक्षणों एवं सामाजिक-व्यवहारिक संकेतों के बारे में विस्तार से बताया गया। उन्होंने कहा कि समय पर पहचान और उचित हस्तक्षेप से ऑटिज़्म से पीड़ित बच्चों को एक बेहतर जीवन देने में मदद मिल सकती है।
कार्यक्रम में बाल रोग विभाग की सीनियर रेजिडेंट डॉ. गरिमा ने ऑटिज़्म पर एक विस्तृत प्रस्तुति दी, जिसमें निदान, उपचार, और अभिभावकों की भूमिका पर प्रकाश डाला गया। उन्होंने वीडियो क्लिप्स और केस स्टडीज़ के माध्यम से प्रतिभागियों को ऑटिज़्म के व्यवहारिक लक्षणों को समझने में मदद की।
इस अवसर पर डॉ. मनीष कुमार, डॉ. अंचला भारद्वाज, डॉ. ममता गुप्ता सहित कई फैकल्टी सदस्य, मेडिकल छात्र, नर्सिंग स्टाफ और अभिभावक उपस्थित रहे।
इंटरेक्टिव सत्र और जागरूकता बढ़ाने की पहल
कार्यक्रम के अंत में प्रश्नोत्तर सत्र का आयोजन किया गया, जिसमें उपस्थित लोगों ने ऑटिज़्म से जुड़ी अपनी शंकाएँ और समस्याएँ विशेषज्ञों से साझा कीं। विशेषज्ञों ने इन प्रश्नों के उत्तर देकर ऑटिज़्म को लेकर समाज में फैली भ्रांतियों को दूर करने का प्रयास किया।
ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) क्या है?
ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) एक जटिल न्यूरो-विकासात्मक विकार है, जो व्यक्ति के सामाजिक संपर्क, संचार कौशल और व्यवहार को प्रभावित करता है। यह समस्या जीवनभर बनी रह सकती है, और इसके लक्षण बचपन में ही प्रकट हो जाते हैं।
ऑटिज़्म से पीड़ित बच्चों की दुनिया बाकी बच्चों से अलग होती है। वे अक्सर लोगों से नज़रें नहीं मिलाते, नाम पुकारने पर प्रतिक्रिया नहीं देते और अपनी दुनिया में ही खोए रहते हैं। कई मामलों में वे बोलने में देरी करते हैं, दोहराव वाले व्यवहार प्रदर्शित करते हैं, या कुछ विशेष रुचियों में असामान्य रूप से गहराई से डूबे रहते हैं।
ऑटिज़्म का कोई निश्चित कारण नहीं है, लेकिन शोधकर्ताओं का मानना है कि इसमें आनुवंशिक और पर्यावरणीय कारक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हालांकि, समय पर पहचान और सही हस्तक्षेप से स्थिति को नियंत्रित किया जा सकता है, जिससे बच्चे का विकास बेहतर हो सकता है।
एम्स गोरखपुर द्वारा आयोजित यह व्याख्यान समाज में ऑटिज़्म के प्रति समझ, सहानुभूति और समावेशी सोच को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ। विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि समाज में ऑटिज़्म से ग्रसित बच्चों और उनके परिवारों को सहयोग और संवेदनशीलता की जरूरत है, जिससे वे बेहतर जीवन जी सकें।
इस महत्वपूर्ण आयोजन की प्रशंसा एम्स गोरखपुर की कार्यकारी निदेशक मेजर जनरल डॉ. विभा दत्ता द्वारा की गई, जिन्होंने स्वयं सत्र को सुविधाजनक और प्रेरणादायक बनाने में योगदान दिया।
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