Category: पर्यावरण

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    हजारों करोड़ का बजट, फिर भी आपदाओं के आगे बेबस सुरक्षा

    आपदा से पहले तैयारी या तबाही के बाद भरपाई? हजारों करोड़ के बजट के बावजूद सुरक्षा की चुनौती!
    भारत में आपदा प्रबंधन पर बढ़ता निवेश, जान-माल की क्षति, संसाधनों के उपयोग और जमीनी तैयारियों के बीच अंतर—अब योजनाओं से आगे बढ़कर परिणाम देने का समय।

    भारत आज एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहाँ प्राकृतिक और मानवजनित आपदाएँ केवल मौसमी घटनाएँ नहीं रह गई हैं, बल्कि आर्थिक विकास, सामाजिक सुरक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य और राष्ट्रीय अवसंरचना के लिए गंभीर चुनौती बन चुकी हैं। बाढ़, भूकंप, भूस्खलन, चक्रवात, बादल फटना, बिजली गिरना, लू, शहरी जलभराव और औद्योगिक दुर्घटनाएँ हर वर्ष हजारों परिवारों की आजीविका प्रभावित करती हैं। ऐसे में एक महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आता है—जब देश में आपदा प्रबंधन के लिए हजारों करोड़ रुपये का प्रावधान है, तो क्या हमारी तैयारियाँ, मॉक ड्रिल और आपदा प्रबंधन योजनाएँ वास्तविक जोखिमों के अनुरूप पर्याप्त प्रभावी हैं?

    भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) की वर्ष 2025 की रिपोर्ट इस चुनौती की गंभीरता उजागर करती है। देश में विभिन्न चरम मौसमी घटनाओं से लगभग 2,760 लोगों की मृत्यु दर्ज की गई। इनमें भारी वर्षा, बाढ़, बादल फटने और भूस्खलन से 1,370 से अधिक तथा आंधी-तूफान और बिजली गिरने से 1,310 से अधिक लोगों की जान गई। उत्तर प्रदेश में 410 से अधिक, मध्य प्रदेश में 350 से अधिक, महाराष्ट्र में 270 से अधिक और बिहार में 174 मौतें दर्ज हुईं। ये केवल आँकड़े नहीं, बल्कि आपदा जोखिम न्यूनीकरण, पूर्व चेतावनी और स्थानीय तैयारियों को मजबूत बनाने की आवश्यकता के गंभीर संकेत हैं।

     

    सरकारी स्तर पर वित्तीय प्रतिबद्धता भी उल्लेखनीय है। पंद्रहवें वित्त आयोग ने वर्ष 2021–26 के लिए राज्य आपदा जोखिम प्रबंधन कोष के अंतर्गत ₹1,60,153 करोड़ तथा राष्ट्रीय आपदा जोखिम प्रबंधन कोष के लिए ₹68,463 करोड़ का प्रावधान अनुशंसित किया था। राज्य स्तरीय राशि का 80 प्रतिशत आपदा प्रतिक्रिया और 20 प्रतिशत जोखिम न्यूनीकरण के लिए निर्धारित किया गया। यह व्यवस्था महत्वपूर्ण है, क्योंकि आपदा के बाद राहत पहुँचाने के साथ-साथ आपदा से पहले जोखिम कम करने में निवेश करना भी आवश्यक है।

     

    आपदा प्रबंधन के प्रमुख वित्तीय प्रावधान | 2021–26
    राज्य जोखिम प्रबंधन कोष
    ₹1.60 लाख करोड़
    वित्त आयोग की अनुशंसा

    राष्ट्रीय जोखिम प्रबंधन कोष
    ₹68,463 करोड़
    वित्त आयोग की अनुशंसा

    ये बहुवर्षीय वित्तीय प्रावधान हैं, वास्तविक व्यय या उपयोगिता के आँकड़े नहीं। स्रोत: गृह मंत्रालय एवं 15वाँ वित्त आयोग।
    वित्तीय सहायता के वास्तविक प्रवाह पर भी ध्यान देना आवश्यक है। केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा 13 मार्च 2026 को जारी जानकारी के अनुसार, वित्त वर्ष 2025–26 में उस तिथि तक राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष के अंतर्गत 28 राज्यों को ₹20,735.20 करोड़ और राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष से 21 राज्यों को ₹3,628.18 करोड़ जारी किए गए। इसके अतिरिक्त राज्य आपदा न्यूनीकरण कोष से ₹5,373.20 करोड़ और राष्ट्रीय आपदा न्यूनीकरण कोष से ₹1,189.56 करोड़ जारी किए गए। स्पष्ट है कि सरकार राहत के साथ जोखिम न्यूनीकरण के लिए भी वित्तीय सहायता उपलब्ध करा रही है।

     

     

    लेकिन धनराशि का आवंटन, राज्यों को उसका जारी होना और धरातल पर उसका प्रभावी उपयोग—तीन अलग-अलग अवस्थाएँ हैं। जारी धनराशि को वास्तविक व्यय या सफल परिणाम मान लेना उचित नहीं होगा। इसके लिए परियोजनावार उपयोगिता प्रमाणपत्र, भौतिक प्रगति, स्वतंत्र मूल्यांकन और जोखिम में वास्तविक कमी के प्रमाण आवश्यक हैं।

    इस व्यवस्था में उपयोग और क्षमता निर्माण के बीच अंतर भी दिखाई देता है। वित्त मंत्रालय के अनुसार, अप्रैल से दिसंबर 2025 के दौरान राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष की तैयारी एवं क्षमता निर्माण संबंधी वित्तीय व्यवस्था से ₹1,579.12 करोड़ जारी किए गए, जिनमें ₹994.05 करोड़ अग्निशमन सेवाओं के विस्तार और आधुनिकीकरण के लिए थे। इसी अवधि में शहरी बाढ़ प्रबंधन के लिए तमिलनाडु और असम को ₹270.75 करोड़ तथा आर्द्रभूमि पुनर्जीवन के लिए असम को ₹155.71 करोड़ की सहायता जारी की गई। ये पहल दर्शाती हैं कि जोखिम न्यूनीकरण में निवेश का दायरा बढ़ रहा हैl
    फिर भी जमीनी स्तर पर कई महत्वपूर्ण कमियाँ मौजूद हैं। संसद की गृह संबंधी स्थायी समिति ने अपनी 261वीं रिपोर्ट में राज्यों और जिलों की आपदा प्रबंधन योजनाओं की गुणवत्ता में असमानता, वित्तीय संसाधनों के उपयोग में देरी, संस्थागत क्षमता की कमी तथा विभागीय समन्वय की चुनौतियों को रेखांकित किया है। समिति ने आपदा प्रबंधन योजनाओं की कम-से-कम प्रत्येक दो वर्ष में समीक्षा तथा राज्य और जिला स्तर पर प्रतिवर्ष कम-से-कम दो बहु-एजेंसी मॉक ड्रिल आयोजित करने की सिफारिश की है। ये सिफारिशें हैं, सभी संस्थानों पर लागू एकसमान वैधानिक अनिवार्यता नहीं।

    यहाँ एक और गंभीर प्रश्न उठता है—क्या मॉक ड्रिल वास्तव में हमारी तैयारियों की परीक्षा ले रही हैं या केवल औपचारिक आयोजन बनकर रह गई हैं? किसी अस्पताल में अग्निकांड, विद्यालय में भूकंप, औद्योगिक क्षेत्र में रासायनिक रिसाव या शहर में अचानक आई बाढ़ की स्थिति में सबसे पहले कौन प्रतिक्रिया देगा, कितने समय में बचाव दल पहुँचेगा और संवेदनशील नागरिकों को कैसे सुरक्षित निकाला जाएगा—इन प्रश्नों का उत्तर वास्तविक अभ्यास से ही मिल सकता है।

    प्रत्येक मॉक ड्रिल में पुलिस, अग्निशमन सेवाओं, स्वास्थ्य विभाग, एसडीआरएफ, एनडीआरएफ, स्थानीय निकायों और सामुदायिक स्वयंसेवकों की भागीदारी सुनिश्चित होनी चाहिए। अभ्यास के बाद प्रतिक्रिया समय, संचार व्यवस्था, उपकरणों की कार्यशीलता, सुरक्षित निकासी और प्राथमिक उपचार की क्षमता का स्वतंत्र मूल्यांकन किया जाना चाहिए। कमियों को दूर करने के लिए समयबद्ध कार्ययोजना और जवाबदेही निर्धारित करना भी उतना ही आवश्यक है।

    ग्रामीण भारत में ग्राम पंचायतों की भूमिका विशेष महत्व रखती है। दिसंबर 2025 में केंद्र सरकार ने 20 राज्यों के 81 आपदा-संवेदनशील जिलों में पंचायती राज संस्थाओं के माध्यम से सामुदायिक आपदा जोखिम न्यूनीकरण को मजबूत करने के लिए ₹507.37 करोड़ की परियोजना स्वीकृत की। यह पहल स्थानीय संस्थाओं को केवल राहत वितरण तक सीमित रखने के बजाय जोखिम पहचान, जनजागरूकता, प्रशिक्षण और पूर्व तैयारी में सक्रिय भागीदार बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करती है।

     

    आने वाले वर्षों में वित्तीय प्रावधान और बढ़ने की संभावना है। सोलहवें वित्त आयोग ने वर्ष 2026–31 के लिए राज्य आपदा जोखिम प्रबंधन कोष हेतु ₹2,04,401 करोड़ और राष्ट्रीय स्तर के कोष के लिए ₹79,406 करोड़ की अनुशंसा की है। लेकिन बढ़ता बजट तभी सार्थक होगा, जब उसका उपयोग वैज्ञानिक जोखिम आकलन, प्रारंभिक चेतावनी, सुरक्षित अवसंरचना, स्थानीय प्रशिक्षण और नियमित मॉक ड्रिल जैसे परिणामोन्मुख कार्यों में दिखाई दे।

     

    भारत को अब ‘आवंटन से परिणाम’ और ‘राहत से जोखिम न्यूनीकरण’ की दिशा में निर्णायक परिवर्तन करना होगा। प्रत्येक जिले में अद्यतन बहु-आपदा प्रबंधन योजना, स्थानीय जोखिम मानचित्र, आपातकालीन संसाधनों की डिजिटल सूची, प्रशिक्षित सामुदायिक स्वयंसेवक और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध तैयारी संकेतक विकसित किए जाने चाहिए। विद्यालयों, अस्पतालों, औद्योगिक प्रतिष्ठानों और शहरी निकायों की तैयारियों का नियमित परीक्षण भी आवश्यक है।

    आपदा प्रबंधन पर होने वाले खर्च की सफलता केवल उपयोगिता प्रमाणपत्रों से नहीं, बल्कि बचाई गई जिंदगियों, कम हुई आर्थिक क्षति, घटे प्रतिक्रिया समय और मजबूत हुई सामुदायिक क्षमता से मापी जानी चाहिए।

    भारत को अब यह तय करना होगा कि आपदा प्रबंधन की सफलता का पैमाना तबाही के बाद बाँटी गई राहत राशि होगी या आपदा आने से पहले बचाई गई जिंदगियाँ। क्योंकि सच्चा आपदा प्रबंधन वही है, जिसमें राहत की आवश्यकता कम पड़े और नागरिकों की सुरक्षा अधिक सुनिश्चित हो।

    — डॉ. राकेश कुमार भट्ट
    आपदा जोखिम प्रबंधन, पर्यावरण एवं सामाजिक विकास विशेषज्ञ

  • नाले से नदी तक: प्रकृति के साथ मिलकर बनाएं स्वस्थ और सुंदर शहर

    नाले से नदी तक: प्रकृति के साथ मिलकर बनाएं स्वस्थ और सुंदर शहर

    गोरखपुर ब्यूरो निष्पक्ष टुडे :-

    सीवेज उपचार अब सिर्फ इंजीनियरिंग नहीं, बल्कि पर्यावरण, सार्वजनिक स्वास्थ्य और शहरी विकास की नई सोच

    डॉ. राकेश कुमार भट्ट

    🏙️ क्या सिर्फ ऊंची इमारतों से शहर स्मार्ट बनता है?

    किसी शहर की पहचान सिर्फ चौड़ी सड़कों, ऊंची इमारतों और चमकते बाजारों से नहीं होती। स्वच्छ हवा, निर्मल जलस्रोत, हरित क्षेत्र और स्वस्थ नागरिक किसी शहर की असली पहचान हैं।

    तेजी से बढ़ते शहरीकरण के बीच बड़ा सवाल यह है कि अगर शहर के नाले प्रदूषित हों, तालाब सीवेज से भर रहे हों और नदियां गंदे पानी का भार उठा रही हों, तो क्या ऐसे विकास को वास्तव में टिकाऊ कहा जा सकता है?


    🚨 बढ़ता सीवेज, बढ़ता पर्यावरणीय संकट

    शहरों के विस्तार के साथ सीवेज की मात्रा लगातार बढ़ रही है, लेकिन कई जगहों पर सीवर नेटवर्क और उपचार व्यवस्था आबादी की जरूरत के अनुरूप विकसित नहीं हो सकी है।

    प्रमुख चुनौती:

    • अधूरा या पुराना सीवर नेटवर्क
    • नालों का सीधे जलस्रोतों में पहुंचना
    • तालाब और झीलों का प्रदूषण
    • नदियों पर बढ़ता सीवेज का दबाव
    • भूजल और जैव-विविधता पर असर

    इसका असर केवल पानी की गुणवत्ता पर नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और पूरे शहरी पर्यावरण पर पड़ता है।


    💧 सीवेज नहीं, उपचार के बाद बन सकता है संसाधन

    सबसे बड़ी जरूरत सोच बदलने की है।

    सीवेज को केवल ‘अपशिष्ट’ मानने के बजाय उपचार के बाद एक उपयोगी जल संसाधन के रूप में देखा जा सकता है।

    उपचारित पानी का इस्तेमाल उपयुक्त मानकों और परिस्थितियों में—

    बागवानी • शहरी वानिकी • फ्लशिंग • औद्योगिक गैर-पेय उपयोग

    जैसे कार्यों में किया जा सकता है।


    🌿 Nature-Based Solutions: प्रकृति बनेगी समाधान का हिस्सा

    सीवेज उपचार में Nature-Based Solutions एक महत्वपूर्ण विकल्प के रूप में सामने आ रहे हैं।

    Constructed Wetlands और Integrated Wetland Technology जैसी प्रणालियां पौधों, सूक्ष्मजीवों, प्राकृतिक फिल्ट्रेशन और जैविक प्रक्रियाओं का उपयोग करके अपशिष्ट जल की गुणवत्ता सुधार सकती हैं।

    खास बात यह है कि सही डिजाइन के साथ ये प्रणालियां केवल पानी का उपचार नहीं करतीं, बल्कि—

    हरित क्षेत्र + जैव-विविधता + पर्यावरणीय परिसंपत्ति

    भी विकसित कर सकती हैं।


    ⚙️ सिर्फ बड़े STP से नहीं बदलेगी तस्वीर

    क्या करोड़ों रुपये खर्च करके STP बना देना ही समाधान है?

    जरूरी नहीं।

    अगर शहर के कई नाले STP तक पहुंच ही नहीं रहे हैं, तो संयंत्र की क्षमता का पूरा उपयोग नहीं हो पाएगा।

    इसीलिए Decentralized Wastewater Treatment और Nala Treatment जैसी रणनीतियों पर भी ध्यान देना जरूरी है।

    👉 प्रदूषण को नदी तक पहुंचने के बाद नियंत्रित करने से बेहतर है कि उसे स्रोत के पास ही रोक दिया जाए।


    🌊 तालाब-झीलों का सिर्फ सौंदर्यीकरण नहीं, संरक्षण जरूरी

    तालाब और झीलों पर पाथवे, लाइटिंग और अन्य सौंदर्यीकरण कार्य करने से पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि उनमें अनुपचारित सीवेज न पहुंचे।

    अब जरूरत ‘Beautification’ से आगे बढ़कर ‘Ecological Restoration’ की है।

    यानी—

    पहले प्रदूषण रोकें → फिर जल निकाय की पारिस्थितिकी बहाल करें।


    🏥 सीवेज प्रबंधन सीधे जुड़ा है स्वास्थ्य से

    खुले नाले, दूषित पानी और जलभराव केवल पर्यावरण की समस्या नहीं हैं। ये जलजनित और वेक्टर-जनित स्वास्थ्य जोखिम बढ़ा सकते हैं।

    इसलिए सीवेज प्रबंधन को केवल नगर निकाय के इंजीनियरिंग विभाग तक सीमित रखने के बजाय—

    Public Health + Environment + Urban Planning + Water Security

    के साझा एजेंडे के रूप में देखना होगा।


    🌧️ जलवायु परिवर्तन ने चुनौती और बढ़ाई

    एक तरफ शहर जल संकट से जूझ रहे हैं, तो दूसरी तरफ अत्यधिक बारिश और शहरी जलभराव की घटनाएं चुनौती बढ़ा रही हैं।

    ऐसे में—

    • उपचारित पानी का पुन: उपयोग
    • तालाबों और झीलों का संरक्षण
    • प्राकृतिक जल-निकासी तंत्र की बहाली
    • हरित अधोसंरचना का विकास

    शहरों को अधिक Water-Secure और Climate-Resilient बना सकता है।


    🏗️ हर शहर को चाहिए Integrated Urban Wastewater Management Plan

    भविष्य की शहरी योजना में एक ऐसा एकीकृत ढांचा जरूरी है, जिसमें शामिल हों—

    केंद्रीकृत STP + विकेंद्रीकृत उपचार + नाला प्रबंधन + जल निकाय संरक्षण + उपचारित पानी का पुन: उपयोग + नियमित जल गुणवत्ता निगरानी।

    इसके साथ नगर निकायों की तकनीकी क्षमता और उपचार संयंत्रों के Operation & Maintenance को भी मजबूत करना होगा।


    🌱 एक तकनीक नहीं, सही जगह सही समाधान

    Nature-Based Solutions हर परिस्थिति में पारंपरिक STP का विकल्प नहीं हैं।

    लेकिन सही परिस्थितियों में ये पारंपरिक प्रणालियों की प्रभावी पूरक बन सकती हैं।

    मुद्दा किसी एक तकनीक को श्रेष्ठ साबित करना नहीं, बल्कि स्थान, प्रदूषण और स्थानीय जरूरत के अनुसार सही समाधान चुनना है।


    🇮🇳 अब Smart Cities से आगे बढ़ने का समय

    भारत को अब केवल Smart Cities नहीं, बल्कि—

    Healthy • Green • Water-Secure • Nature-Positive Cities

    की जरूरत है।

    नदी, तालाब, झील, नाला और आर्द्रभूमि शहर की खाली जमीन नहीं, बल्कि उसकी प्राकृतिक पूंजी हैं।

    🔴 निष्कर्ष

    किसी शहर की असली सुंदरता उसकी इमारतों की ऊंचाई में नहीं, बल्कि उसके जलस्रोतों की स्वच्छता, पर्यावरण की सेहत और नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता में दिखाई देती है।

    अब समय है कि—

    नाले को समस्या नहीं, समाधान की शुरुआत माना जाए।
    सीवेज को अपशिष्ट नहीं, उपचार के बाद संसाधन बनाया जाए।
    और जल निकायों को केवल सौंदर्यीकरण की वस्तु नहीं, जीवित पारिस्थितिकी तंत्र समझा जाए।

    यही सोच भविष्य के स्वस्थ, सुंदर और टिकाऊ शहरों की नींव बन सकती है।

  • आचार्य बालकृष्ण के 55वें जन्मदिवस पर जड़ी-बूटी दिवस मनाया गया, 1600 औषधीय पौधों का हुआ निःशुल्क वितरण

    आचार्य बालकृष्ण के 55वें जन्मदिवस पर जड़ी-बूटी दिवस मनाया गया, 1600 औषधीय पौधों का हुआ निःशुल्क वितरण

    आचार्य बालकृष्ण के 55वें जन्मदिवस पर जड़ी-बूटी दिवस मनाया गया, 1600 औषधीय पौधों का हुआ निःशुल्क वितरण

    गोरखपुर।

    पतंजलि योगपीठ के सह-संस्थापक एवं प्रबंधक, आयुर्वेद शिरोमणि श्रद्धेय आचार्य बालकृष्ण जी के 55वें जन्मदिवस के अवसर पर मंगलवार को पतंजलि योग परिवार द्वारा जड़ी-बूटी दिवस का आयोजन किया गया। इस अवसर पर गोरखपुर के गोलघर स्थित बलदेव प्लाजा परिसर में औषधीय वनस्पतियों के निःशुल्क वितरण एवं जनजागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में लोगों ने सहभागिता की।

    कार्यक्रम के दौरान पतंजलि योग परिवार के योग साधकों, योग बंधुओं एवं बहनों ने लोगों को औषधीय पौधों की पहचान, उनके उपयोग तथा स्वास्थ्य लाभों की जानकारी देते हुए लगभग 1600 औषधीय पौधों का निःशुल्क वितरण किया। वितरित किए गए पौधों में आम, जामुन, सहजन, अमलतास, अर्जुन, कांचनार, हरसिंगार, नीम, तुलसी, लेमनग्रास, मीठी नीम, अशोक, गुड़मार, मेहंदी, गुर्च, अमरूद, अश्वगंधा, घृतकुमारी, हल्दी, ब्राह्मी, शंखपुष्पी, बेल, पुनर्नवा, भूमिआंवला, पत्थरचट्टा, अजवाइन सहित अनेक महत्वपूर्ण औषधीय वनस्पतियां शामिल रहीं।

    कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि पूर्व महापौर डॉ. सत्य पांडेय द्वारा पौधों का वितरण कर किया गया। इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि के रूप में उद्यान अधीक्षक पारस जी तथा अजीत कुमार सिंह सहित अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। अतिथियों ने पौधारोपण एवं औषधीय वनस्पतियों के संरक्षण की आवश्यकता पर बल देते हुए लोगों से पर्यावरण संरक्षण में सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया।

    वक्ताओं ने कहा कि कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य लोगों को औषधीय वनस्पतियों के प्रति जागरूक करना है, ताकि वे इन पौधों को पहचान सकें और उनके महत्व को समझते हुए उनका संरक्षण कर सकें। उन्होंने कहा कि जब समाज वनस्पतियों के लाभों को समझेगा, तब उनका संरक्षण भी सुनिश्चित होगा, जिससे पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में मदद मिलेगी।

    कार्यक्रम में वक्ताओं ने यह भी कहा कि भारत की संस्कृति, परंपराओं और त्योहारों का वनस्पतियों से गहरा संबंध रहा है। आयुर्वेद की समृद्ध परंपरा भी इन औषधीय पौधों पर आधारित है। आचार्य बालकृष्ण जी द्वारा आयुर्वेद को नए आयाम प्रदान करने के प्रयासों की सराहना करते हुए उपस्थित लोगों ने उनके स्वस्थ एवं दीर्घायु जीवन की कामना की। कार्यक्रम का समापन पर्यावरण संरक्षण एवं आयुर्वेद के प्रचार-प्रसार के संकल्प के साथ हुआ।

  • गोरखपुर एयरपोर्ट पर 15 जून को मनाया जाएगा “यात्री सुविधा दिवस”

    गोरखपुर एयरपोर्ट पर 15 जून को मनाया जाएगा “यात्री सुविधा दिवस”

    गोरखपुर ब्यूरो निष्पक्ष टुडे :-

    यात्रियों से संवाद, पौधारोपण और उत्कृष्ट कर्मियों का सम्मान; पर्यटन किट भी होगी वितरित

    गोरखपुर। भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (AAI) की ओर से 15 जून 2026 को गोरखपुर हवाई अड्डे पर “यात्री सुविधा दिवस” का आयोजन किया जाएगा। कार्यक्रम को लेकर सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। इसका उद्देश्य यात्रियों को बेहतर सेवाएं उपलब्ध कराना तथा हवाई यात्रा को अधिक सुगम, सुरक्षित और सुविधाजनक बनाना है।

    इस अवसर पर भारतीय नागर विमानन क्षेत्र और गोरखपुर हवाई अड्डे की विकास यात्रा एवं उपलब्धियों को प्रदर्शित किया जाएगा। यात्रियों के आकर्षण के लिए एयरपोर्ट परिसर में विशेष सेल्फी प्वाइंट बनाया गया है। साथ ही यात्रियों से संवाद स्थापित कर उनके सुझाव और अपेक्षाएं भी जानी जाएंगी, ताकि भविष्य में सुविधाओं को और बेहतर बनाया जा सके।

    भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण के अनुसार, पिछले 12 वर्षों में देश के नागर विमानन क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। केंद्र सरकार की उड़ान योजना के माध्यम से देश के विभिन्न हिस्सों को हवाई संपर्क से जोड़ा गया है, जिससे आम नागरिकों के लिए हवाई यात्रा अधिक सुलभ हुई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का “हवाई चप्पल पहनने वाला भी हवाई जहाज में यात्रा करे” का संकल्प अब व्यापक जनभागीदारी का रूप ले चुका है।

    गोरखपुर हवाई अड्डे ने भी इस दौरान महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं। वर्ष 2014 तक यहां सप्ताह में केवल तीन दिन एक विमान का संचालन होता था, जबकि वर्तमान में प्रतिदिन लगभग 24 उड़ानों का संचालन किया जा रहा है। पूर्वांचल के यात्री अब दिल्ली, मुंबई, नवी मुंबई, हैदराबाद, बेंगलुरु और कोलकाता सहित कई प्रमुख शहरों के लिए सीधी उड़ानों की सुविधा प्राप्त कर रहे हैं।

    “यात्री सुविधा दिवस” के दौरान पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से पौधारोपण कार्यक्रम भी आयोजित किया जाएगा। इसके अलावा यात्री सेवा में उत्कृष्ट योगदान देने वाले हवाई अड्डा कर्मियों को सम्मानित किया जाएगा। यात्रियों को पर्यटन संबंधी जानकारी उपलब्ध कराने के लिए विशेष पर्यटन किट भी वितरित की जाएगी।

    गोरखपुर हवाई अड्डे के विस्तार और विकास में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के योगदान का भी उल्लेख किया गया है। राज्य सरकार द्वारा नए हवाई अड्डे के निर्माण के लिए भूमि उपलब्ध कराई जा चुकी है, जिससे भविष्य में गोरखपुर को अत्याधुनिक सुविधाओं से युक्त नया टर्मिनल और विस्तारित हवाई अड्डा अवसंरचना प्राप्त होगी।

    गोरखपुर हवाई अड्डे के निदेशक संजय कुमार ने बताया कि “यात्री सुविधा दिवस” का आयोजन भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण द्वारा देशभर के हवाई अड्डों पर किया जा रहा है। गोरखपुर में इसे जनसहभागिता, यात्री सुविधा और पर्यावरण संरक्षण के संदेश के साथ विशेष रूप से आयोजित किया जाएगा। उन्होंने कहा कि उत्कृष्ट यात्री सेवाएं प्रदान करने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के प्रति जागरूकता बढ़ाना भी हवाई अड्डा प्रशासन की प्राथमिकताओं में शामिल है।

  • घायल मिला दुर्लभ सारस पक्षी, ग्रामीणों ने बचाई जान; वन विभाग की उदासीनता पर उठे सवाल

    घायल मिला दुर्लभ सारस पक्षी, ग्रामीणों ने बचाई जान; वन विभाग की उदासीनता पर उठे सवाल

     गोरखपुर/सहजनवां निष्पक्ष टुडे :-

    सहजनवां क्षेत्र के सेहुडी ताल के पास घायल अवस्था में मिला सारस, सूचना के बावजूद देर तक नहीं पहुंचा वन विभाग का कोई अधिकारी

    सहजनवां रेंज क्षेत्र के नगर पंचायत घघसरा अंतर्गत ग्राम सेहुडा के पास स्थित सेहुडी ताल में रविवार को एक दुर्लभ सारस पक्षी घायल अवस्था में मिला। ग्रामीणों ने आशंका जताई है कि किसी कुत्ते या अन्य जंगली जानवर के हमले में यह पक्षी घायल हुआ होगा।

    घायल पक्षी को असुरक्षित स्थान पर छोड़ने के बजाय स्थानीय ग्रामीणों ने मानवता का परिचय देते हुए उसे सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया। ग्रामीणों ने सारस को उठाकर भुलेश्वर नाथ मंदिर, शाहपुर ताल के पास सुरक्षित जगह पर रखा और तत्काल इसकी सूचना वन विभाग को दी।

    हालांकि, ग्रामीणों का आरोप है कि सूचना दिए जाने के काफी समय बाद तक वन विभाग का कोई जिम्मेदार अधिकारी या कर्मचारी मौके पर नहीं पहुंचा, जिससे लोगों में नाराजगी देखी गई। ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते उपचार और संरक्षण की व्यवस्था नहीं की गई, तो इस दुर्लभ पक्षी की जान को खतरा हो सकता है।

    बताते चलें कि सारस पक्षी विलुप्त होने की कगार पर पहुंच रही प्रजातियों में शामिल माना जाता है और इसके संरक्षण के लिए समय-समय पर गणना अभियान भी चलाए जाते हैं। ऐसे में वन विभाग की त्वरित कार्रवाई अपेक्षित थी।

    ग्रामीणों ने मांग की है कि घायल सारस का तत्काल उपचार कराया जाए तथा उसके संरक्षण के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएं, ताकि इस दुर्लभ पक्षी को सुरक्षित बचाया जा सके।

    महत्वपूर्ण बिंदु:

    सेहुडी ताल के पास घायल मिला सारस पक्षी।
    कुत्ते या अन्य जानवर के हमले की आशंका।
    ग्रामीणों ने सुरक्षित स्थान पर पहुंचाकर बचाई जान।
    वन विभाग को दी गई सूचना, लेकिन कार्रवाई में देरी का आरोप।
    सारस के संरक्षण को लेकर ग्रामीणों ने जताई चिंता।
    घायल पक्षी के शीघ्र उपचार और सुरक्षा की उठी मांग।

  • विश्व पर्यावरण दिवस पर नवल्स नेशनल एकेडमी में जागरूकता कार्यक्रम आयोजित

    विश्व पर्यावरण दिवस पर नवल्स नेशनल एकेडमी में जागरूकता कार्यक्रम आयोजित

    गोरखपुर ब्यूरो निष्पक्ष टुडे :-

    इको क्लब के तत्वावधान में विद्यार्थियों ने लिया पर्यावरण संरक्षण का संकल्प, पौधरोपण और जागरूकता गतिविधियों से दिया हरित भविष्य का संदेश

    सूरजकुंड, गोरखपुर। विश्व पर्यावरण दिवस 2026 के अवसर पर नवल्स नेशनल एकेडमी, सूरजकुंड के इको क्लब द्वारा पर्यावरण संरक्षण एवं जनजागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य विद्यार्थियों एवं समाज को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करना तथा प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी का भाव विकसित करना रहा।

    विद्यालय के माननीय निदेशक शैक्षिक श्री घनश्याम पाण्डेय के प्रेरणादायी मार्गदर्शन में आयोजित कार्यक्रम में विद्यार्थियों ने पर्यावरण संरक्षण से संबंधित विभिन्न गतिविधियों में उत्साहपूर्वक भाग लिया। इस अवसर पर श्री पाण्डेय ने कहा कि पर्यावरण की रक्षा केवल एक दिवस का अभियान नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का सतत दायित्व है। उन्होंने विद्यार्थियों को अधिक से अधिक पौधे लगाने तथा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण का संकल्प लेने के लिए प्रेरित किया।

    कार्यक्रम में पार्षद श्री जुबैर अहमद, श्री शिवम पाण्डेय, प्रशासनिक अधिकारी श्री पंकज त्रिपाठी, वरिष्ठ शिक्षिका श्रीमती फातिमा खातून, शिक्षक श्री दीपक पाण्डेय, श्री उज्ज्वल जायसवाल, लेखाकार श्री मुजाहिद हसन एवं कार्यालय सहायक श्री पुनीत श्रीवास्तव की गरिमामयी उपस्थिति रही।

    विद्यार्थियों ने पर्यावरण संरक्षण की शपथ लेते हुए स्वच्छ, हरित एवं स्वस्थ भारत के निर्माण में सक्रिय भागीदारी निभाने का संकल्प लिया। कार्यक्रम के दौरान पर्यावरण संतुलन बनाए रखने, प्लास्टिक के उपयोग को कम करने तथा वृक्षारोपण को बढ़ावा देने का संदेश दिया गया।

    प्रमुख बिंदु

    ✔ विश्व पर्यावरण दिवस पर इको क्लब द्वारा जागरूकता कार्यक्रम आयोजित।
    ✔ निदेशक शैक्षिक श्री घनश्याम पाण्डेय ने विद्यार्थियों को किया प्रेरित।
    ✔ पर्यावरण संरक्षण एवं वृक्षारोपण का लिया गया संकल्प।
    ✔ विद्यार्थियों ने विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से दिया जागरूकता संदेश।
    ✔ स्वच्छ, हरित और स्वस्थ भविष्य के निर्माण पर दिया गया विशेष बल।

    “पेड़ लगाएं, पर्यावरण बचाएं और आने वाली पीढ़ियों के लिए धरती को सुरक्षित बनाएं।”

  • मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ आज करेंगे पर्यटन विकास कार्यों का लोकार्पण, 20.39 करोड़ रुपये से संवरा चिलुआताल घाट

    मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ आज करेंगे पर्यटन विकास कार्यों का लोकार्पण, 20.39 करोड़ रुपये से संवरा चिलुआताल घाट

    गोरखपुर ब्यूरो निष्पक्ष टुडे :-

    बदहाल था चिलुआताल, योगी सरकार ने बना दिया पर्यटन स्थल

    गोरखपुर, 2 जून। शहर के उत्तरी छोर पर स्थित चिलुआताल, जो वर्षों तक उपेक्षा और बदहाली का शिकार रहा, अब एक आकर्षक पर्यटन स्थल के रूप में नई पहचान बना चुका है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मंगलवार को 20 करोड़ 39 लाख रुपये की लागत से पूर्ण हुए चिलुआताल पर्यटन विकास एवं सौंदर्यीकरण परियोजना का लोकार्पण करेंगे।

    रामगढ़ताल की तर्ज पर विकसित किए गए चिलुआताल घाट का स्वरूप पूरी तरह बदल गया है। यहां आधुनिक सुविधाओं के साथ पर्यटन को बढ़ावा देने और स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर सृजित करने पर विशेष ध्यान दिया गया है। परियोजना के तहत सात कियोस्क का निर्माण कराया गया है, जहां पर्यटक खानपान और अन्य सुविधाओं का लाभ उठा सकेंगे।

    पर्यटन विभाग के उप निदेशक राजेंद्र प्रसाद यादव के अनुसार चिलुआताल के सौंदर्यीकरण और पर्यटन विकास कार्यों पर 20.39 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं। कार्य पूर्ण होने के बाद से ही बड़ी संख्या में लोग यहां पहुंचकर प्राकृतिक सौंदर्य और विकसित सुविधाओं का आनंद ले रहे हैं। मुख्यमंत्री के लोकार्पण के बाद यह परियोजना औपचारिक रूप से जनता को समर्पित हो जाएगी।

    उल्लेखनीय है कि रामगढ़ताल की तरह चिलुआताल भी लंबे समय तक उपेक्षित रहा था। योगी सरकार ने पहले रामगढ़ताल को विकसित कर पूर्वांचल के प्रमुख पर्यटन केंद्र के रूप में स्थापित किया और अब उसी मॉडल पर चिलुआताल को भी संवारा गया है। आने वाले समय में यह क्षेत्र पर्यटन के साथ-साथ स्थानीय रोजगार का भी महत्वपूर्ण केंद्र बनेगा। यहां पर्यटकों को बोटिंग की सुविधा के साथ प्राकृतिक वातावरण में मनोरंजन का अवसर भी मिलेगा।

    परियोजना के प्रमुख कार्य

    • 570 मीटर लंबे पाथवे का निर्माण

    • घाट की सीढ़ियों का निर्माण एवं पत्थर लगाने का कार्य

    • इंटरलॉकिंग एवं रेलिंग का निर्माण

    • स्टोन पिचिंग एवं कैरेट बोल्डर कार्य

    • सात कियोस्क का निर्माण

    • आधुनिक टॉयलेट ब्लॉक की स्थापना

    • मुख्य प्रवेश द्वार का सुपर स्ट्रक्चर निर्माण

    • 400 मीटर एप्रोच रोड का निर्माण

    • विद्युतीकरण, पोल एवं सोलर लाइट की व्यवस्था

    • 500 मीटर साइड वॉल एवं नाली निर्माण

    • चिलुआताल के विकास से गोरखपुर के उत्तरी क्षेत्र को नया पर्यटन केंद्र मिलने के साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलने की उम्मीद है।

  • कूड़े के पहाड़ से पिकनिक स्पॉट बना एकला बांध गोरखपुर को मिला नया इको-टूरिज्म हब

    कूड़े के पहाड़ से पिकनिक स्पॉट बना एकला बांध गोरखपुर को मिला नया इको-टूरिज्म हब

    गोरखपुर ब्यूरो निष्पक्ष टुडे ;-

    3 लाख टन कचरे का निस्तारण, सिटी फॉरेस्ट और ईको पार्क के रूप में हुआ विकास

    कभी कूड़े का ढेर रहा एकला बांध, अब हरियाली और रिवर व्यू के साथ पिकनिक स्पॉट में तब्दील

    कभी कूड़े के पहाड़ के रूप में बदनाम रहा गोरखपुर का एकला बांध अब शहर के प्रमुख पिकनिक स्पॉट के रूप में उभर कर सामने आया है। स्वच्छता अभियान के तहत इस क्षेत्र का कायाकल्प कर इसे एक सुंदर ईको पार्क में बदल दिया गया है।

    मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर नगर निगम ने वर्षों से जमा कचरे का वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण किया।

    नगर निगम के अनुसार, यहां लगभग 3 लाख टन लिगेसी वेस्ट को हटाया गया। इसके बाद खाली भूमि पर मियावाकी पद्धति से सिटी फॉरेस्ट विकसित किया गया।

    इस परियोजना पर अब तक करीब 18 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं।
    अब यह क्षेत्र हरियाली, स्वच्छ हवा और प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाएगा।

    एकला बांध को आधुनिक सुविधाओं से लैस किया गया है।
    यहां वॉकिंग ट्रैक, योग स्थल, किड्स जोन और रिवर व्यू पॉइंट बनाए गए हैं।

    भविष्य में यहां पैडल बोटिंग की सुविधा भी शुरू की जाएगी, जिससे यह पर्यटन का प्रमुख केंद्र बन सके।

    एक नजर में बदलाव:

    ❌ पहले: कूड़े का पहाड़
    ✅ अब: सिटी फॉरेस्ट + ईको पार्क
    🌳 3 लाख टन कचरा साफ
    🚶 वॉकिंग ट्रैक व ग्रीन जोन
    🌊 राप्ती नदी का शानदार व्यू

    🗨️ “एकला बांध का कायाकल्प ‘स्वच्छ गोरखपुर’ अभियान की बड़ी सफलता है।”
    — महापौर डॉ. मंगलेश श्रीवास्तव

    “वेस्ट टू वेल्थ का बेहतरीन उदाहरण बना एकला बांध, गोरखपुर की नई पहचान”

  • स्वच्छ भारत मिशन-अर्बन (एसबीएम यू) के तहत नाला प्रबंधनः आवश्कता और अनिवार्यता

    स्वच्छ भारत मिशन-अर्बन (एसबीएम यू) के तहत नाला प्रबंधनः आवश्कता और अनिवार्यता

    गोरखपुर ब्यूरो निष्पक्ष टुडे ;-

    राकेश कुमार भट्ट डेवलपमेंट शहरी स्वच्छता बंधन विशेषज्ञ)

    भारत के शहरीकरण की रफ्तार ने शहरों को चमकदार ऊंची इमारतों से सजा दिया है, लेकिन इसी के साथ जल निकासी की व्यवस्था पर भारी दबाव पड़ गया है। नाले, जो शहरों की जीवनरेखा हैं, आज प्रदूषण, जलभराव और बाढ़ के कारण अभिशाप बन चुके हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, देश में शहरी क्षेत्रों से प्रतिदिन लगभग 61948 मिलियन लीटर सीवेज उत्पन्न होता है, जिसमें से केवल लगभग 40 प्रतिशत ही उपचारित होता है। शेष लगभग 60 प्रतिशत सीधे नालों में बह जाता है, जो नदियों को विषैला बना देता है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने हाल ही में लुधियाना के बुद्धा नाला मामले में सख्ती दिखाई है, जहां डाइंग इकाइयों के सीईटीपी से अनुपचारित जल नाले में छोड़ा जा रहा है। यह समस्या केवल एक शहर तक सीमित नहीं, बल्कि मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु जैसे महानगरों में आम है।

    स्वच्छ भारत मिशन-अर्बन (एसबीएम यू) के तहत 2024 तक 12 करोड़ से अधिक शौचालय बनाए गए, जिससे खुले में शौच लगभग 11 प्रतिशत रह गया। लेकिन कचरा प्रबंधन अभी भी चुनौती है। मिशन के आंकड़ों के मुताबिक, 86284 वार्डों में से लगभग 17 प्रतिशत में द्वार-द्वार कचरा संग्रहण हो रहा है, लेकिन स्रोत पृथक्करण केवल लगभग 78 प्रतिशत है। नाले इसी असंगठित कचरे से अवरुद्ध हो जाते हैं। अमृत 2.0 मिशन, जो अक्टूबर 2021 से चल रहा है, ने 500 अमृत शहरों में सार्वजनिक सीवरेज को प्राथमिकता दी है। इसके तहत 3571 जल आपूर्ति, परियोजनाओं को 118421 करोड़ रुपये की मंजूरी मिली, जिसमें 178 लाख नई टैप कनेक्शन शामिल हैं। फिर भी, नालों का पुनरुद्धार पिछड़ रहा है, जिससे मानसून में बाढ़ आम हो गई है।

    जल जीवन मिशन (जेजेएम) के ‘नल से जल’ अभियान ने ग्रामीण क्षेत्रों में 19.22 करोड़ घरों में से लगभग 45.10 प्रतिशत को नल जल दिया है, लेकिन शहरी नालों का प्रबंधन इससे जुड़ा है। मिशन की रिपोर्ट बताती है कि ग्रामीणों की आय में वृद्धि के साथ जल संरक्षण की मांग बढ़ी है, जो शहरी नालों के प्रदूषण को रोकने की दिशा में महत्वपूर्ण है। केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय के अनुसार, अमृत 2.0 ने जल पुनर्चक्रण, हरित पार्क और जलाशय पुनरुद्धार पर जोर दिया है। फिर भी, 2025-26 के आंकड़े चिंताजनक हैं, देश की 4000 से अधिक शहरों में नालों से निकलने वाला लगभग 30 प्रतिशत जल अनुपचारित नदियों में मिलता है। मुंबई में, ब्रिम्सटन नाला और दिल्ली के नजफगढ़ ड्रेन जैसे उदाहरण एनजीटी में हैं, जहां प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने पर्यावरण क्षतिपूर्ति लगाई है।

    नाला प्रबंधन की आवश्कता इसलिए अनिवार्य हो गई है क्योंकि यह स्वास्थ्य, पर्यावरण और अर्थव्यवस्था से जुड़ा है। प्रदूषित नाले जलजनित रोगों का कारण बनते हैं इझ कोविड के बाद 2025 में डेंगू मलेरिया के 10 लाख मामले नालों से जुड़े पाए गए। आर्थिक नुकसान अरबों में है; 2023 की मुंबई बाढ़ से 5000 करोड़ का नुकसान हुआ। सरकार ने 2026 तक सभी शहरी स्थानीय निकायों (यूएलबी) को जल सुरक्षित बनाने का लक्ष्य रखा है। अमृत मित्र और जल ही अमृत जैसे कार्यक्रम मौजूदा नालों को पुनः उपयोगी बनाने पर केंद्रित हैं। स्वच्छ भारत 2.0 में नाला सफाई को प्राथमिकता दी गई, जिसमें 83435 वार्डों में कचरा संग्रहण 17 प्रतिशत पहुंचा। हैं।

    समाधान के उपाय सरकारी योजनाओं से, आगे बढ़कर तकनीकी नवाचारों पर निर्भर हैं। इन-सीटू उपचार प्रणालियां, जैसे पारिस्थितिक इकाइयों से नाला पुनर्स्थापन (आरईएनईयू), प्रदूषण को स्रोत पर ही रोकती हैं। सीएसआईआर-एनईईआरआई जैसी संस्थाओं ने सिद्ध किया कि ये शून्य ऊर्जा वाली प्रणालियां लगभग 70-85 प्रतिशत प्रदूषण कम करती हैं। नगर निगमों को जीआईएस मैपिंग से नालों की निगरानी करनी चाहिए। पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल अमृत 2.0 में सफल रहा, जहां 118000 करोड़ की परियोजनाएं स्वीकृत हुई। जन जागरूकता अभियान, जैसे जल शक्ति अभियान, स्रोत पृथक्करण को 90 प्रतिशत तक ले गए।

    हालांकि, चुनौतियां बरकरार हैं। अवैध कनेक्शन, औद्योगिक अपशिष्ट और मानसून की अनियमितता नालों को जाम कर देते हैं। एनजीटी ने 2024-25 में 546 ओए में सीपीसीबी को नाला प्रदूषण पर रिपोर्ट मांगी। पंजाब में बुद्धा नाला के लिए उच्च स्तरीय समिति बनी, जिसमें आईआईटी रोपड़ शामिल है। है। केंद्र सरकार ने 2026 तक आय वितरण सर्वेक्षण के साथ जल प्रबंधन को जोड़ा, ताकि गरीब इलाकों में नाले सुधरें।

    नाला प्रबंधन केवल सफाई नहीं, बल्कि समग्र शहरी योजना है। स्वच्छ भारत, अमृत और जेजेएम जैसे मिशनों ने आधार दिया है अब अमल की जरूरत। नगर निगम, पीएसयू और नागरिक मिलकर इसे अनिवार्य बनाएं। स्वच्छ नाले स्वच्छ शहर बनाएंगे, जो वर्तमान सरकार के ‘स्वच्छ भारत, विकसित भारत’ विजन को साकार करेंगे। यदि नाले सुधरे, तो बाढ़-प्रदूषण की मार कम होगी और जल सुरक्षा सुनिश्चित। समय आ गया है कार्रवाई का, क्योंकि नाला प्रबंधन अब विकल्प नहीं, अनिवार्यता है।