स्वच्छ भारत मिशन-अर्बन (एसबीएम यू) के तहत नाला प्रबंधनः आवश्कता और अनिवार्यता

गोरखपुर ब्यूरो निष्पक्ष टुडे ;-

राकेश कुमार भट्ट डेवलपमेंट शहरी स्वच्छता बंधन विशेषज्ञ)

भारत के शहरीकरण की रफ्तार ने शहरों को चमकदार ऊंची इमारतों से सजा दिया है, लेकिन इसी के साथ जल निकासी की व्यवस्था पर भारी दबाव पड़ गया है। नाले, जो शहरों की जीवनरेखा हैं, आज प्रदूषण, जलभराव और बाढ़ के कारण अभिशाप बन चुके हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, देश में शहरी क्षेत्रों से प्रतिदिन लगभग 61948 मिलियन लीटर सीवेज उत्पन्न होता है, जिसमें से केवल लगभग 40 प्रतिशत ही उपचारित होता है। शेष लगभग 60 प्रतिशत सीधे नालों में बह जाता है, जो नदियों को विषैला बना देता है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने हाल ही में लुधियाना के बुद्धा नाला मामले में सख्ती दिखाई है, जहां डाइंग इकाइयों के सीईटीपी से अनुपचारित जल नाले में छोड़ा जा रहा है। यह समस्या केवल एक शहर तक सीमित नहीं, बल्कि मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु जैसे महानगरों में आम है।

स्वच्छ भारत मिशन-अर्बन (एसबीएम यू) के तहत 2024 तक 12 करोड़ से अधिक शौचालय बनाए गए, जिससे खुले में शौच लगभग 11 प्रतिशत रह गया। लेकिन कचरा प्रबंधन अभी भी चुनौती है। मिशन के आंकड़ों के मुताबिक, 86284 वार्डों में से लगभग 17 प्रतिशत में द्वार-द्वार कचरा संग्रहण हो रहा है, लेकिन स्रोत पृथक्करण केवल लगभग 78 प्रतिशत है। नाले इसी असंगठित कचरे से अवरुद्ध हो जाते हैं। अमृत 2.0 मिशन, जो अक्टूबर 2021 से चल रहा है, ने 500 अमृत शहरों में सार्वजनिक सीवरेज को प्राथमिकता दी है। इसके तहत 3571 जल आपूर्ति, परियोजनाओं को 118421 करोड़ रुपये की मंजूरी मिली, जिसमें 178 लाख नई टैप कनेक्शन शामिल हैं। फिर भी, नालों का पुनरुद्धार पिछड़ रहा है, जिससे मानसून में बाढ़ आम हो गई है।

जल जीवन मिशन (जेजेएम) के ‘नल से जल’ अभियान ने ग्रामीण क्षेत्रों में 19.22 करोड़ घरों में से लगभग 45.10 प्रतिशत को नल जल दिया है, लेकिन शहरी नालों का प्रबंधन इससे जुड़ा है। मिशन की रिपोर्ट बताती है कि ग्रामीणों की आय में वृद्धि के साथ जल संरक्षण की मांग बढ़ी है, जो शहरी नालों के प्रदूषण को रोकने की दिशा में महत्वपूर्ण है। केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय के अनुसार, अमृत 2.0 ने जल पुनर्चक्रण, हरित पार्क और जलाशय पुनरुद्धार पर जोर दिया है। फिर भी, 2025-26 के आंकड़े चिंताजनक हैं, देश की 4000 से अधिक शहरों में नालों से निकलने वाला लगभग 30 प्रतिशत जल अनुपचारित नदियों में मिलता है। मुंबई में, ब्रिम्सटन नाला और दिल्ली के नजफगढ़ ड्रेन जैसे उदाहरण एनजीटी में हैं, जहां प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने पर्यावरण क्षतिपूर्ति लगाई है।

नाला प्रबंधन की आवश्कता इसलिए अनिवार्य हो गई है क्योंकि यह स्वास्थ्य, पर्यावरण और अर्थव्यवस्था से जुड़ा है। प्रदूषित नाले जलजनित रोगों का कारण बनते हैं इझ कोविड के बाद 2025 में डेंगू मलेरिया के 10 लाख मामले नालों से जुड़े पाए गए। आर्थिक नुकसान अरबों में है; 2023 की मुंबई बाढ़ से 5000 करोड़ का नुकसान हुआ। सरकार ने 2026 तक सभी शहरी स्थानीय निकायों (यूएलबी) को जल सुरक्षित बनाने का लक्ष्य रखा है। अमृत मित्र और जल ही अमृत जैसे कार्यक्रम मौजूदा नालों को पुनः उपयोगी बनाने पर केंद्रित हैं। स्वच्छ भारत 2.0 में नाला सफाई को प्राथमिकता दी गई, जिसमें 83435 वार्डों में कचरा संग्रहण 17 प्रतिशत पहुंचा। हैं।

समाधान के उपाय सरकारी योजनाओं से, आगे बढ़कर तकनीकी नवाचारों पर निर्भर हैं। इन-सीटू उपचार प्रणालियां, जैसे पारिस्थितिक इकाइयों से नाला पुनर्स्थापन (आरईएनईयू), प्रदूषण को स्रोत पर ही रोकती हैं। सीएसआईआर-एनईईआरआई जैसी संस्थाओं ने सिद्ध किया कि ये शून्य ऊर्जा वाली प्रणालियां लगभग 70-85 प्रतिशत प्रदूषण कम करती हैं। नगर निगमों को जीआईएस मैपिंग से नालों की निगरानी करनी चाहिए। पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल अमृत 2.0 में सफल रहा, जहां 118000 करोड़ की परियोजनाएं स्वीकृत हुई। जन जागरूकता अभियान, जैसे जल शक्ति अभियान, स्रोत पृथक्करण को 90 प्रतिशत तक ले गए।

हालांकि, चुनौतियां बरकरार हैं। अवैध कनेक्शन, औद्योगिक अपशिष्ट और मानसून की अनियमितता नालों को जाम कर देते हैं। एनजीटी ने 2024-25 में 546 ओए में सीपीसीबी को नाला प्रदूषण पर रिपोर्ट मांगी। पंजाब में बुद्धा नाला के लिए उच्च स्तरीय समिति बनी, जिसमें आईआईटी रोपड़ शामिल है। है। केंद्र सरकार ने 2026 तक आय वितरण सर्वेक्षण के साथ जल प्रबंधन को जोड़ा, ताकि गरीब इलाकों में नाले सुधरें।

नाला प्रबंधन केवल सफाई नहीं, बल्कि समग्र शहरी योजना है। स्वच्छ भारत, अमृत और जेजेएम जैसे मिशनों ने आधार दिया है अब अमल की जरूरत। नगर निगम, पीएसयू और नागरिक मिलकर इसे अनिवार्य बनाएं। स्वच्छ नाले स्वच्छ शहर बनाएंगे, जो वर्तमान सरकार के ‘स्वच्छ भारत, विकसित भारत’ विजन को साकार करेंगे। यदि नाले सुधरे, तो बाढ़-प्रदूषण की मार कम होगी और जल सुरक्षा सुनिश्चित। समय आ गया है कार्रवाई का, क्योंकि नाला प्रबंधन अब विकल्प नहीं, अनिवार्यता है।

Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *