Disaster

हजारों करोड़ का बजट, फिर भी आपदाओं के आगे बेबस सुरक्षा

आपदा से पहले तैयारी या तबाही के बाद भरपाई? हजारों करोड़ के बजट के बावजूद सुरक्षा की चुनौती!
भारत में आपदा प्रबंधन पर बढ़ता निवेश, जान-माल की क्षति, संसाधनों के उपयोग और जमीनी तैयारियों के बीच अंतर—अब योजनाओं से आगे बढ़कर परिणाम देने का समय।

भारत आज एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहाँ प्राकृतिक और मानवजनित आपदाएँ केवल मौसमी घटनाएँ नहीं रह गई हैं, बल्कि आर्थिक विकास, सामाजिक सुरक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य और राष्ट्रीय अवसंरचना के लिए गंभीर चुनौती बन चुकी हैं। बाढ़, भूकंप, भूस्खलन, चक्रवात, बादल फटना, बिजली गिरना, लू, शहरी जलभराव और औद्योगिक दुर्घटनाएँ हर वर्ष हजारों परिवारों की आजीविका प्रभावित करती हैं। ऐसे में एक महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आता है—जब देश में आपदा प्रबंधन के लिए हजारों करोड़ रुपये का प्रावधान है, तो क्या हमारी तैयारियाँ, मॉक ड्रिल और आपदा प्रबंधन योजनाएँ वास्तविक जोखिमों के अनुरूप पर्याप्त प्रभावी हैं?

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) की वर्ष 2025 की रिपोर्ट इस चुनौती की गंभीरता उजागर करती है। देश में विभिन्न चरम मौसमी घटनाओं से लगभग 2,760 लोगों की मृत्यु दर्ज की गई। इनमें भारी वर्षा, बाढ़, बादल फटने और भूस्खलन से 1,370 से अधिक तथा आंधी-तूफान और बिजली गिरने से 1,310 से अधिक लोगों की जान गई। उत्तर प्रदेश में 410 से अधिक, मध्य प्रदेश में 350 से अधिक, महाराष्ट्र में 270 से अधिक और बिहार में 174 मौतें दर्ज हुईं। ये केवल आँकड़े नहीं, बल्कि आपदा जोखिम न्यूनीकरण, पूर्व चेतावनी और स्थानीय तैयारियों को मजबूत बनाने की आवश्यकता के गंभीर संकेत हैं।

 

सरकारी स्तर पर वित्तीय प्रतिबद्धता भी उल्लेखनीय है। पंद्रहवें वित्त आयोग ने वर्ष 2021–26 के लिए राज्य आपदा जोखिम प्रबंधन कोष के अंतर्गत ₹1,60,153 करोड़ तथा राष्ट्रीय आपदा जोखिम प्रबंधन कोष के लिए ₹68,463 करोड़ का प्रावधान अनुशंसित किया था। राज्य स्तरीय राशि का 80 प्रतिशत आपदा प्रतिक्रिया और 20 प्रतिशत जोखिम न्यूनीकरण के लिए निर्धारित किया गया। यह व्यवस्था महत्वपूर्ण है, क्योंकि आपदा के बाद राहत पहुँचाने के साथ-साथ आपदा से पहले जोखिम कम करने में निवेश करना भी आवश्यक है।

 

आपदा प्रबंधन के प्रमुख वित्तीय प्रावधान | 2021–26
राज्य जोखिम प्रबंधन कोष
₹1.60 लाख करोड़
वित्त आयोग की अनुशंसा

राष्ट्रीय जोखिम प्रबंधन कोष
₹68,463 करोड़
वित्त आयोग की अनुशंसा

ये बहुवर्षीय वित्तीय प्रावधान हैं, वास्तविक व्यय या उपयोगिता के आँकड़े नहीं। स्रोत: गृह मंत्रालय एवं 15वाँ वित्त आयोग।
वित्तीय सहायता के वास्तविक प्रवाह पर भी ध्यान देना आवश्यक है। केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा 13 मार्च 2026 को जारी जानकारी के अनुसार, वित्त वर्ष 2025–26 में उस तिथि तक राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष के अंतर्गत 28 राज्यों को ₹20,735.20 करोड़ और राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष से 21 राज्यों को ₹3,628.18 करोड़ जारी किए गए। इसके अतिरिक्त राज्य आपदा न्यूनीकरण कोष से ₹5,373.20 करोड़ और राष्ट्रीय आपदा न्यूनीकरण कोष से ₹1,189.56 करोड़ जारी किए गए। स्पष्ट है कि सरकार राहत के साथ जोखिम न्यूनीकरण के लिए भी वित्तीय सहायता उपलब्ध करा रही है।

 

 

लेकिन धनराशि का आवंटन, राज्यों को उसका जारी होना और धरातल पर उसका प्रभावी उपयोग—तीन अलग-अलग अवस्थाएँ हैं। जारी धनराशि को वास्तविक व्यय या सफल परिणाम मान लेना उचित नहीं होगा। इसके लिए परियोजनावार उपयोगिता प्रमाणपत्र, भौतिक प्रगति, स्वतंत्र मूल्यांकन और जोखिम में वास्तविक कमी के प्रमाण आवश्यक हैं।

इस व्यवस्था में उपयोग और क्षमता निर्माण के बीच अंतर भी दिखाई देता है। वित्त मंत्रालय के अनुसार, अप्रैल से दिसंबर 2025 के दौरान राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष की तैयारी एवं क्षमता निर्माण संबंधी वित्तीय व्यवस्था से ₹1,579.12 करोड़ जारी किए गए, जिनमें ₹994.05 करोड़ अग्निशमन सेवाओं के विस्तार और आधुनिकीकरण के लिए थे। इसी अवधि में शहरी बाढ़ प्रबंधन के लिए तमिलनाडु और असम को ₹270.75 करोड़ तथा आर्द्रभूमि पुनर्जीवन के लिए असम को ₹155.71 करोड़ की सहायता जारी की गई। ये पहल दर्शाती हैं कि जोखिम न्यूनीकरण में निवेश का दायरा बढ़ रहा हैl
फिर भी जमीनी स्तर पर कई महत्वपूर्ण कमियाँ मौजूद हैं। संसद की गृह संबंधी स्थायी समिति ने अपनी 261वीं रिपोर्ट में राज्यों और जिलों की आपदा प्रबंधन योजनाओं की गुणवत्ता में असमानता, वित्तीय संसाधनों के उपयोग में देरी, संस्थागत क्षमता की कमी तथा विभागीय समन्वय की चुनौतियों को रेखांकित किया है। समिति ने आपदा प्रबंधन योजनाओं की कम-से-कम प्रत्येक दो वर्ष में समीक्षा तथा राज्य और जिला स्तर पर प्रतिवर्ष कम-से-कम दो बहु-एजेंसी मॉक ड्रिल आयोजित करने की सिफारिश की है। ये सिफारिशें हैं, सभी संस्थानों पर लागू एकसमान वैधानिक अनिवार्यता नहीं।

यहाँ एक और गंभीर प्रश्न उठता है—क्या मॉक ड्रिल वास्तव में हमारी तैयारियों की परीक्षा ले रही हैं या केवल औपचारिक आयोजन बनकर रह गई हैं? किसी अस्पताल में अग्निकांड, विद्यालय में भूकंप, औद्योगिक क्षेत्र में रासायनिक रिसाव या शहर में अचानक आई बाढ़ की स्थिति में सबसे पहले कौन प्रतिक्रिया देगा, कितने समय में बचाव दल पहुँचेगा और संवेदनशील नागरिकों को कैसे सुरक्षित निकाला जाएगा—इन प्रश्नों का उत्तर वास्तविक अभ्यास से ही मिल सकता है।

प्रत्येक मॉक ड्रिल में पुलिस, अग्निशमन सेवाओं, स्वास्थ्य विभाग, एसडीआरएफ, एनडीआरएफ, स्थानीय निकायों और सामुदायिक स्वयंसेवकों की भागीदारी सुनिश्चित होनी चाहिए। अभ्यास के बाद प्रतिक्रिया समय, संचार व्यवस्था, उपकरणों की कार्यशीलता, सुरक्षित निकासी और प्राथमिक उपचार की क्षमता का स्वतंत्र मूल्यांकन किया जाना चाहिए। कमियों को दूर करने के लिए समयबद्ध कार्ययोजना और जवाबदेही निर्धारित करना भी उतना ही आवश्यक है।

ग्रामीण भारत में ग्राम पंचायतों की भूमिका विशेष महत्व रखती है। दिसंबर 2025 में केंद्र सरकार ने 20 राज्यों के 81 आपदा-संवेदनशील जिलों में पंचायती राज संस्थाओं के माध्यम से सामुदायिक आपदा जोखिम न्यूनीकरण को मजबूत करने के लिए ₹507.37 करोड़ की परियोजना स्वीकृत की। यह पहल स्थानीय संस्थाओं को केवल राहत वितरण तक सीमित रखने के बजाय जोखिम पहचान, जनजागरूकता, प्रशिक्षण और पूर्व तैयारी में सक्रिय भागीदार बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करती है।

 

आने वाले वर्षों में वित्तीय प्रावधान और बढ़ने की संभावना है। सोलहवें वित्त आयोग ने वर्ष 2026–31 के लिए राज्य आपदा जोखिम प्रबंधन कोष हेतु ₹2,04,401 करोड़ और राष्ट्रीय स्तर के कोष के लिए ₹79,406 करोड़ की अनुशंसा की है। लेकिन बढ़ता बजट तभी सार्थक होगा, जब उसका उपयोग वैज्ञानिक जोखिम आकलन, प्रारंभिक चेतावनी, सुरक्षित अवसंरचना, स्थानीय प्रशिक्षण और नियमित मॉक ड्रिल जैसे परिणामोन्मुख कार्यों में दिखाई दे।

 

भारत को अब ‘आवंटन से परिणाम’ और ‘राहत से जोखिम न्यूनीकरण’ की दिशा में निर्णायक परिवर्तन करना होगा। प्रत्येक जिले में अद्यतन बहु-आपदा प्रबंधन योजना, स्थानीय जोखिम मानचित्र, आपातकालीन संसाधनों की डिजिटल सूची, प्रशिक्षित सामुदायिक स्वयंसेवक और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध तैयारी संकेतक विकसित किए जाने चाहिए। विद्यालयों, अस्पतालों, औद्योगिक प्रतिष्ठानों और शहरी निकायों की तैयारियों का नियमित परीक्षण भी आवश्यक है।

आपदा प्रबंधन पर होने वाले खर्च की सफलता केवल उपयोगिता प्रमाणपत्रों से नहीं, बल्कि बचाई गई जिंदगियों, कम हुई आर्थिक क्षति, घटे प्रतिक्रिया समय और मजबूत हुई सामुदायिक क्षमता से मापी जानी चाहिए।

भारत को अब यह तय करना होगा कि आपदा प्रबंधन की सफलता का पैमाना तबाही के बाद बाँटी गई राहत राशि होगी या आपदा आने से पहले बचाई गई जिंदगियाँ। क्योंकि सच्चा आपदा प्रबंधन वही है, जिसमें राहत की आवश्यकता कम पड़े और नागरिकों की सुरक्षा अधिक सुनिश्चित हो।

— डॉ. राकेश कुमार भट्ट
आपदा जोखिम प्रबंधन, पर्यावरण एवं सामाजिक विकास विशेषज्ञ

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