Category: हेल्थ

  • आतिशबाजी से दूर रहें टीबी के मरीज, मास्क लगा कर ही बाहर निकलें’’

    आतिशबाजी से दूर रहें टीबी के मरीज, मास्क लगा कर ही बाहर निकलें’’

    *‘‘आतिशबाजी से दूर रहें टीबी के मरीज, मास्क लगा कर ही बाहर निकलें’’*

    दीपावली से लेकर छठ पर्व तक टीबी मरीजों से स्वास्थ्य विभाग ने की विशेष सतर्कता की अपील

    *प्रवासी लोगों में बीमारी के लक्षण दिखने पर त्वरित जांच करवाने के लिए प्रेरित करने को कहा*

    *गोरखपुर, 30 अक्टूबर 2024*

    क्षय रोग अथवा टीबी के मरीजों (पल्मनरी टीबी मरीजों) के फेफड़े बीमारी के कारण पहले से संक्रमित और कमजोर होते हैं। ऐसे में आतिशबाजी का प्रदूषण उनकी जटिलताएं और भी बढ़ा सकता है । इसलिए बेहतर यह है कि टीबी के उपचाराधीन मरीज आतिशबाजी से दूर रहें। सुबह शाम अगर घर से बाहर निकलना भी पड़े तो मास्क का इस्तेमाल अवश्य करें। यह अपील जिला क्षय उन्मूलन अधिकारी डॉ गणेश यादव ने की। उन्होंने पर्व की बधाई देते हुए दीपावली से लेकर छठ पर्व तक टीबी मरीजों को विशेष सतर्कता बरतने के लिए कहा है । साथ ही समुदाय से अपील की है कि इन पर्वों पर घर लौटने वाले प्रवासी लोगों में अगर टीबी के लक्षण दिखाई दें तो उन्हें नजदीकी चिकित्सा इकाई पहुंच कर जांच व इलाज करवाने के लिए प्रेरित करें।

    डॉ यादव ने बताया कि टीबी का सम्पूर्ण इलाज संभव है । जिले में प्रति वर्ष करीब दस हजार से अधिक टीबी मरीज इलाज के बाद स्वस्थ हो रहे हैं। सिर्फ फेफड़े की टीबी (पल्मनरी टीबी) ही संक्रामक होती है और अगर समय से इसकी पहचान कर उपचार शुरू कर दिया जाए तो तीन सप्ताह बाद ऐसे मरीज से भी संक्रमण नहीं फैलता है । इसके प्रमुख लक्षणों में दो सप्ताह से अधिक की खांसी, शाम को पसीने के साथ बुखार, सांस फूलना, भूख न लगना, तेजी से वजन घटना, बलगम में खून आना और सीने में दर्द शामिल हैं। अगर प्रवासी लोगों में यह लक्षण दिखे तो तुरंत जांच और इलाज से उनके जरिये संक्रमण नहीं फैलेगा।

    डीटीओ ने बताया कि स्वास्थ्य विभाग टीबी मरीजों की पहचान कर निक्षय पोर्टल पर जब उन्हें पंजीकृत कर देता है तो प्रत्येक मरीज की यूनीक आईडी बन जाती है। इस आईडी के जरिये प्रवासी टीबी मरीज वापस अपने कार्यस्थल पर लौटने के बाद भी इलाज जारी रख सकते हैं। इसके विपरीत अगर प्रवासी मरीज जांच और इलाज नहीं करवाते हैं तो टीबी होने पर उनके जरिये संक्रमण तो फैलेगा ही, साथ ही बीमार होने पर उनकी भी कार्यक्षमता और आय प्रभावित होगी।

    टीबी मरीजों के इलाज से जुड़े उप जिला क्षय उन्मूलन अधिकारी डॉ विराट स्वरूप श्रीवास्तव ने बताया कि आतिशबाजी के प्रदूषण से न बचने पर टीबी मरीज को अधिक खांसी आ सकती है। ऐसे में उनके जरिये संक्रमण के तेज से फैलने की भी आशंका बढ़ जाएगी। पर्वों के दौरान भी टीबी मरीजों को पौष्टिक खानपान जैसे दूध, पनीर, अंडा, मछली, सोयाबिन आदि का सेवन जारी रखना चाहिए।

    *मधुमेह पीड़ित टीबी रोगी रखें खास ख्याल*

    डीटीओ डॉ यादव ने बताया कि जिन टीबी मरीजों में मधुमेह की भी समस्या है, उन्हें ज्यादा सतर्क रहना है। ऐसे मरीजों को मिठाइयों से दूरी बना कर रखनी होगी। साथ में आलू, ओल, शकरकंद और चावल आदि के सेवन से बचना है। मधुमेह को नियंत्रित रख कर टीबी मरीज आसानी से स्वस्थ हो सकते हैं ।

  • परिवार नियोजन के साथ रक्त अल्पता से बचा रही है साप्ताहिक गोली छाया.

    परिवार नियोजन के साथ रक्त अल्पता से बचा रही है साप्ताहिक गोली छाया.
    मन में बैठी भ्रांति दूर होने पर लाभार्थियों की पहली पसंद बनी छाया जिला स्तरीय इकाइयों से लेकर स्वास्थ्य उप केंद्र तक उपलब्ध है सुविधा

    गोरखपुर,

    परिवार नियोजन के साथ रक्त अल्पता से बचा रही है साप्ताहिक गोली छाया.
    परिवार नियोजन के साथ रक्त अल्पता से बचा रही है साप्ताहिक गोली छाया.
    पादरी बाजार निवासी पूजा (28) की बड़ी बेटी छह साल की है और और छोटा बेटा तीन साल का। दंपति अब बच्चा नहीं चाहते लेकिन नसबंदी तब कराना चाहते हैं जब उनका बेटा पांच साल से अधिक उम्र का हो जाएगा। पिपराईच सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) पर परिवार नियोजन परामर्शदाता की सलाह पर उन्होंने परिवार नियोजन के उपलब्ध सभी साधनों में से साप्ताहिक गोली छाया का चुनाव किया। चिकित्सक की देखरेख में उन्होंने यह दवा शुरू की । अगले माह उनका मासिक अनियमित होने लगा। मासिक धर्म में खून की मात्रा भी कम हो गई। घबरा कर उन्होंने परिवार नियोजन परामर्शदाता रीना से बात की तो उन्हें समझाया गया कि यह एक नान हार्मोनल गोली है जिसके कारण यह बदलाव होता है और इस बदलाव के कारण महिलाओं में खून की कमी नहीं होने पाती है।
    पूजा बताती हैं कि जब उनके मन का वहम दूर हो गया तो वह प्रति सप्ताह इस दवा का सेवन करने लगीं । एक वर्ष से दवा का सेवन कर रही हैं लेकिन कभी भी कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ा । जब उन्होंने यह दवा शुरू की थी तो तीन महीने तक सप्ताह में दो गोली खानी होती थी और उसके बाद से प्रति सप्ताह सिर्फ एक गोली खाती हैं। दवा से किसी प्रकार की कोई दिक्कत नहीं होती है।
    पिपराईच सीएचसी की परिवार नियोजन परामर्शदाता रीना का कहना है कि जब कोई दंपति साप्ताहिक गोली छाया का चुनाव करते हैं तो पहले महिला को चिकित्सकीय परामर्श दिलवाया जाता है। अगर सेवा आयुष्मान आरोग्य मंदिर से दी जाती है तो टेलीकंसल्टेशन के जरिये चिकित्सकीय परामर्श लेते हैं। साप्ताहिक छाया गोली प्रसव के तुरंत बाद, माहवारी शुरू होने के तुरंत बाद, गर्भपात होने के तुरंत या सात दिन के अंदर अपना सकते हैं । जिन महिलाओं के अंडाशय में सिस्ट, बच्चेदानी के मुंह में बदलाव, पीलिया या लीवर के बीमारी का इतिहास, किसी भी प्रकार की एलर्जी और टीबी या गुर्दे जैसी कोई गंभीर बीमारी हो तो वह इस साधन को न अपनाएं ।

    1.25 लाख छाया वितरित हुई

    अपर मुख्य चिकित्सा अधिकारी परिवार कल्याण डॉ एके चौधरी ने बताया कि वित्तीय वर्ष 2023-24 में 1.25 लाख साप्ताहिक छाया गोली सरकारी प्रावधानों के तहत लाभार्थियों को वितरित की गईं। वर्ष 2017-18 में इस गोली की सुविधा सिर्फ जिला महिला अस्तपाल पर उपलब्ध थी । उस समय सिर्फ 746 छाया गोली वितरित हुई थी। वर्ष 2018-19 में 1184, वर्ष 2019-2020 में 19417, वर्ष 2020-21 में 35547, वर्ष 2021-22 में 69364 और 2022-23 में करीब एक लाख साप्ताहिक गोली छाया वितरित की गई। वर्ष 2019-20 के बाद से ही यह सुविधा सभी सीएचसी, पीएचसी, आयुष्मान आरोग्य मंदिर और स्वास्थ्य उप केंद्र पर साप्ताहिक गोली छाया उपलब्ध है।

    वीडियो के जरिये दे रहे हैं अहम संदेश

    साप्ताहिक गोली छाया के बारे में एक वीडियो संदेश के जरिये लाभार्थियों को बताया जा रहा है कि अगर गोली खाना भूल गए एक सप्ताह हो गया है, और असुरक्षित संबंध बन जाए तो सबसे पहले इस दवा का सेवन बंद कर दें। इमर्जेंसी पिल्स खाएं और माहवारी आने का इंतजार करें। जब एक बार माहवारी आ जाए तो पुनः पहले तीन महीने सप्ताह में दो गोली का सेवन करें और उसके बाद प्रत्येक सप्ताह एक गोली खाएं। जब तक बच्चा नहीं चाहिए, तब तक दवा का सेवन करते रहें।

  • ‘टीबी मुक्त अभियान में ग्राम प्रधानों की भूमिका अहम’’

    ‘टीबी मुक्त अभियान में ग्राम प्रधानों की भूमिका अहम’’

    ‘टीबी मुक्त अभियान में ग्राम प्रधानों की भूमिका अहम’’
    जिले की नौ ग्राम पंचायतों को मिला टीबी मुक्त ग्राम पंचायत का सम्मान
    एडीएम समेत वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों ने जिलाधिकारी की तरफ से दिया पुरस्कार
    जिले की नौ ग्राम पंचायतों को गांधी जयंती पर टीबी मुक्त ग्राम पंचायत के तौर पर कलेक्ट्रेट सभागार में बुधवार को सम्मानित किया गया । एडीएम (ई) पुरुषोत्तम दास गुप्ता, एडीएम सिटी अंजनी कुमार सिंह, सीआरओ सुशील कुमार, सिटी मजिस्ट्रेट हिमांशु, अपर नगर मजिस्ट्रेट अमित जायसवाल और एसडीएम दीपक सिंह एवं आरती साहू ने जिलाधिकारी कृष्णा करूणेश की तरफ से कार्यक्रम में पहुंचे छह ग्राम प्रधानों को यह सम्मान दिया । सम्मान समारोह को संबोधित करते हुए एडीएम ई ने कहा कि टीबी मुक्त अभियान में ग्राम प्रधानों की भूमिका अहम है।
    उन्होंने कहा कि ग्राम प्रधान के सम्मान से अन्य जनप्रतिनिधि टीबी मुक्ति के अभियान में भागीदार बनेंगे। सम्मानित प्रधान दूसरे गांव के प्रधान से जब अपने अनुभव साझा करेंगे तो इसका लाभ पूरे राष्ट्रीय क्षय उन्मूलन कार्यक्रम को मिलेगा ।
    इस मौके पर जिला क्षय उन्मूलन अधिकारी डॉ गणेश यादव ने बताया कि बड़हलगंज ब्लॉक के विमुटी, सहजनवां ब्लॉक के भलुआ, रामपुर गरथौली, सरदारनगर ब्लॉक के कुसुली और गोला ब्लॉक के ऊंचगांव, ददरा, दीपगढ़ और अहिरौली ग्राम पंचायत को टीबी मुक्त घोषित किया गया है। पहली बार टीबी मुक्त होने पर इन गांव के ग्राम प्रधान को कास्य पुरस्कार के तौर पर महात्मा गांधी का कास्य रंग प्रतिमा दी गई है। अगले वर्ष टीबी मुक्त होने पर इन गांवों को रजत पुरस्कार और लगातार तीसरे वर्ष टीबी मुक्त होने पर स्वर्ण पुरस्कार दिया जाएगा। लगातार तीन वर्षों तक जो गांव टीबी मुक्त रहेंगे उनके बाहर टीबी मुक्त गांव का बोर्ड भी लगाया जाएगा।
    इस मौके नोडल अधिकारी आरटीपीएमयू डॉ बीएम राव, उप जिला क्षय उन्मूलन अधिकारी डॉ विराट स्वरूप श्रीवास्तव, डीपीसी धर्मवीर प्रताप सिंह, पीपीएम समन्वयक अभय नारायण मिश्रा, मिर्जा आफताब बेग, कमलेश कुमार गुप्ता, केके शुक्ला, इंद्रनील, राघवेंद्र तिवारी, मयंक श्रीवास्तव, शक्ति पांडेय, ओम प्रकाश, अजीत कुमार पांडेय, भानु आदित्य और सत्य प्रकाश भारती प्रमुख तौर पर मौजूद रहे
    लगातार टीबी मुक्त रखेंगे गांव
    सहजहनवां ब्लॉक के टीबी मुक्त भलुआ के ग्राम प्रधान अभिमन्यु सिंह (28) और ओम प्रकाश गुप्ता (40) ने बताया कि गांव में एक टीबी के केस निकला था । स्वास्थ्य विभाग के साथ मिल कर 60 से अधिक संभावित रोगियों की जांच कराई गई। गांव टीबी मुक्त रह सके, इसके लिए अधिकाधिक लोगों की टीबी जांच हर वर्ष कराई जाएगी और अगर कोई नया मरीज मिलता है तो उसका तुरंत इलाज शुरू कराया जाएगा। यह सम्मान पूरे गांव का सम्मान है।
    इन्हें मिला सम्मान
    गोला ब्लॉक के ऊंचगांव से ग्राम प्रधान जय सिंह मौर्या, अहिरौली द्वितीय से राघवेंद्र दूबे, अहिरौली से राजेश यादव, बलहलगंज के विमुटी गांव की देवन्ती यादव, सहजनवां के भलुआ गांव से अभिमन्यु सिंह और रामपुर गरथौली गांव के ओम प्रकाश गुप्ता को प्रशासनिक अधिकारियों ने कलक्ट्रेट सभागार में सम्मानित किया। सरदारनगर ब्लॉक के कुसुली गांव की ग्राम प्रधान सरस्वती देवी को जिला क्षय उन्मूलन अधिकारी डॉ गणेश यादव द्वारा एडीओ पंचायत सरदारनगर राधेश्याम जायसवाल की उपस्थिति में जिला क्षय रोग केंद्र में सम्मानित किया गया।
    पुष्पांजलि अर्पित किय
    गांधी जयंती पर जिला कुष्ठ उन्मूलन कार्यालय और जिला क्षय रोग केंद्र पर अधिकारी डॉ गणेश यादव ने महात्मा गांधी की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित किया। इस मौके पर दोनों कार्यालयों के कर्मियों ने भी उन्हें श्रद्धांजलि दी।

  • स्वैच्छिक रक्तदान महादान: डॉ संजीव गुलाटी

    स्वैच्छिक रक्तदान महादान: डॉ संजीव गुलाटी

    स्वैच्छिक रक्तदान महादान _ डॉ संजीव गुलाटी

    गोरखपुर। नागरिक सुरक्षा कोर गोरखनाथ प्रखंड स्वैच्छिक रक्तदान शिविर आयोजित कर गुरु गोरखनाथ चिकित्सालय ब्लड बैंक जिला चिकित्सालय ब्लड बैंक बीआरडी मेडिकल कॉलेज ब्लड बैंक के संयुक्त तत्वाधान में 251 यूनिट रक्तदान महादान कराकर रिकॉर्ड बनाने का प्रयास करेगी। आज सिविल डिफेंस कार्यालय (नागरिक सुरक्षा कोर) पुराना कलेक्ट्रेट पर उप नियंत्रक नागरिक सुरक्षा सत्य प्रकाश सिंह चीफ वार्डन नागरिक सुरक्षा डॉ संजीव गुलाटी ने संयुक्त रूप से प्रेस वार्ता कर बताया कि सिविल डिफेंस के गोरखनाथ प्रखंड द्वारा 29 सितंबर 2024 दिन रविवार को प्रातः 9:00 बजे से 4:00 बजे तक श्री गुरु गोरखनाथ चिकित्सालय ब्लड बैंक द्वारा गोरखनाथ मंदिर प्रांगण में जिला चिकित्सालय ब्लड बैंक द्वारा मधुसूदन दास डिग्री कॉलेज असुरन पर बीआरडी मेडिकल कॉलेज ब्लड बैंक की टीमों द्वारा दिव्यमन हॉस्पिटल स्पोर्ट्स कॉलेज के सामने राप्ती नगर में स्वैच्छिक रक्तदान में पहुंच कर रक्तदान करें आप द्वारा दिए गए रक्तदान महादान से बल्ड से मरने वालों की जान बचाई जा सके रक्तदान से बड़ा कोई दान नहीं होता तीनों स्थानों पर 251 यूनिट रक्तदान इकट्ठा करने के उद्देश्य से ब्लड बैंक टीमें स्वैच्छिक रक्तदान शिविर में आए हुए बल्ड डोनरो से बल्ड प्राप्त करेगी। रक्तदान शिविर में सिविल लाइंस प्रखंड व कोतवाली प्रखंड अपने अपने दायित्वों का बखूबी निर्वहन करते हुए सहयोग करेंगे।

  • टीबी का लक्षण दिखे तो जांच कराएं, जनपद को टीबी मुक्त बनाएं-सीडीओ 8684

    टीबी का लक्षण दिखे तो जांच कराएं, जनपद को टीबी मुक्त बनाएं-सीडीओ

    मुख्य विकास अधिकारी ने एसीएफ अभियान को सफल बनाने की अपील की
    आईटीएमएस के माध्यम से प्रसारित की जा रही है डीटीओ की भी अपील
    गोरखपुर, 15 सितम्बर 2024.
    अगर दो सप्ताह से अधिक की खांसी हो, बुखार आए या बलगम में खून आने समेत टीबी का कोई भी लक्षण दिखे तो तुरंत नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र पर जांच कराएं। टीबी का सम्पूर्ण इलाज सरकारी तंत्र में मौजूद है। सभी लोग सहयोग करके ही जनपद को टीबी मुक्त बना सकते हैं। मुख्य विकास अधिकारी संजय कुमार मीना ने जनपदवासियों से यह अपील की है । उन्होंने नौ सितम्बर से शुरू होकर बीस सितम्बर तक चलने वाले सक्रिय क्षय रोग खोजी (एसीएफ) अभियान को सफल बनाने की अपील की। उधर, इंटीग्रेटेड ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम (आईटीएमएस) के माध्यम से जिला क्षय उन्मूलन अधिकारी डॉ गणेश यादव भी अभियान की सफलता में जनसहयोग की अपील कर रहे हैं।
    डॉ यादव ने बताया कि जिले में तीन सदस्यों की स्वास्थ्य टीम जनपद की बीस फीसदी आबादी के बीच जाकर टीबी के संभावित रोगियों को ढूंढ रही है। इस टीम में आशा कार्यकर्ता के साथ दो अन्य सदस्य हैं । यह टीम संभावित मरीजों का मौके पर बलगम इकट्ठा कर रही है और बलगम के खाली पेट वाले दूसरे सैम्पल के लिए संभावित मरीजों को डिब्बा भी देती है। बलगम के दो सैम्पल की जांच करके टीबी मरीजों की खोज की जा रही है। जिन मरीजों में बलगम से टीबी की पुष्टि नहीं होती है उनकी एक्स रे और सीबीनॉट जांच करवा कर बीमारी का पता लगाया जाता है। प्रत्येक पुष्ट टीबी मरीज की भी सीबीनॉट जांच कराई जाती है ताकि पता लगाया जा सके कि वह ड्रग सेंसिटिव (डीएस) टीबी मरीज है या फिर ड्रग रेसिस्टेंट(डीआर) टीबी मरीज। डीएस टीबी मरीजों का इलाज छह माह में पूर्ण हो जाता है, जबकि डीआर टीबी मरीजों के इलाज में डेढ़ से दो साल तक का समय लग जाता है। जांच और इलाज की समस्त सुविधा सरकारी अस्पतालों में मौजूद है।
    मुख्य विकास अधिकारी ने लोगों से अपील की है कि वह अभियान में जुटी टीम का सहयोग करें। अगर किसी को लक्षण है तो वह खुद आगे आए और जांच कराए। उन्होंने कहा कि हम सभी लोगों की भी जिम्मेदारी है कि लक्षण वाले मरीजों के बारे में आशा कार्यकर्ता और टीम को जरूर बताएं। ऐसा करने से उनका समय से जांच और इलाज होगा। इससे वह मरीज तो ठीक होंगे ही, साथ में इस बीमारी का संक्रमण भी रुक सकेगा।
    8684 मरीज हैं उपचाराधीन
    जिला क्षय उन्मूलन अधिकारी डॉ यादव ने बताया कि इस समय 8684 टीबी मरीजों का जिले में उपचार चल रहा है। इनमें से 372 डीआर टीबी मरीज हैं। अगर डीएस टीबी का मरीज भी बीच में दवा बंद कर देते हैं या अनियमित इलाज लेते हैं तो वह डीआर टीबी का मरीज बन सकते हैं। ऐसे मरीजों का इलाज जटिल होता है। डीआर टीबी मरीज से संक्रमित होने वाले नये मरीज भी डीआर टीबी के मरीज बन जाते हैं। अगर समय से नये मरीजों को खोज कर उपचार शुरू कर दिया जाए तो दो से तीन हफ्ते में उपचाराधीन मरीजों से संक्रमण की आशंका नहीं रह जाती है।

  • खून में आयरन की कमी से हार्ट फेल का खतरा

    खून में आयरन की कमी से हार्ट फेल का खतरा

    खून में आयरन की कमी से हार्ट फेल का खतरा
    लखनऊ में पीजीआई हॉस्पिटल के कार्डियोलॉजी विभाग के अध्ययन में खून की कमी से हार्ट फेल की बात सामने आयी हैं। हार्ट फेल के 70 फीसदी रोगियों में आयरन की कमी मिली है। खून की कमी से दिल की धड़कन अनियमित और मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं। इससे दिल शरीर की ऑक्सीजन और पोषक तत्वों की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त रक्त पंप नहीं कर पाता है। इसके साथ ही खून में आयरन की कमी से दिल की विफलता का खतरा बढ़ जाता है।

  • नये टीबी और कुष्ठ रोगियों को खोज कर शीघ्र करें इलाज

    नये टीबी और कुष्ठ रोगियों को खोज कर शीघ्र करें इलाज

    ‘नये टीबी और कुष्ठ रोगियों को खोज कर शीघ्र करें इलाज’’ जिले के सभी ब्लॉक के चिकित्सा अधिकारियों को दिया गया दो दिवसीय प्रशिक्षण
    राज्य कुष्ठ अधिकारी ने वर्चुअल माध्यम से ट्रेनिंग का फीडबैक लिया    टीबी और कुष्ठ दोनों बीमारियों की समय से पहचान हो जाए तो बिना किसी जटिलता के सम्पूर्ण इलाज संभव है। दोनों बीमारियों के उन्मूलन के लिए इनके नये मरीजों को खोज कर शीघ्र इलाज करने की आवश्यकता है। यह बातें जिला टीबी और कुष्ठ उन्मूलन अधिकारी डॉ गणेश यादव ने कहीं। उन्होंने सभी ब्लॉक और शहरी क्षेत्र के चिकित्सा अधिकारियों के दो दिवसीय प्रशिक्षण को सम्बोधित किया । राज्य कुष्ठ अधिकारी डॉ जया देहलवी भी प्रशिक्षण कार्यक्रम से वर्चुअल माध्यम से जुड़ीं और शहरी क्षेत्र की प्रभारी चिकित्सा अधिकारी डॉ अनुला गुप्ता से प्रशिक्षण का फीडबैक प्राप्त किया।    

    जिला टीबी और कुष्ठ उन्मूलन अधिकारी ने बताया कि मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ आशुतोष कुमार दूबे के दिशा निर्देशन में बुधवार को विकास भवन में यह प्रशिक्षण शुरू हुआ। गुरुवार को प्रशिक्षण सत्र का सीएमओ कार्यालय के प्रेरणा श्री सभागार में समापन हुआ। प्रशिक्षण में बताया गया कि दो सितम्बर से पंद्रह सितम्बर तक कुष्ठ रोग खोजी अभियान चलाया जाएगा जिसके तहत स्वास्थ्य विभाग की टीम घर घर जाकर संभावित मरीज खोजेंगी। वहीं, नौ सितम्बर से बीस सितम्बर तक जनपद में सक्रिय क्षय रोग खोजी अभियान चलाया जाएगा । इस अभियान के तहत टीम क्षय रोग की संभावित मरीज खोजेंगी। दोनों अभियानों में जो संभावित मरीज खोजे जाएंगे उन्हें नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र पर भेज कर जांच कराई जाएगी और बीमारी के पुष्ट होने पर त्वरित इलाज शुरू होगा।डॉ यादव ने बताया कि समय से कुष्ठ की पहचान न होने पर वह दिव्यांगता का रूप ले सकता है। अगर शरीर पर कहीं भी चमड़ी के रंग से हल्के रंग का सुन्न दाग धब्बा है तो वह कुष्ठ भी हो सकता है। इसका सम्पूर्ण इलाज सरकारी तंत्र में मौजूद है। शरीर पर दाग धब्बों की संख्या पांच या पांच से कम हो तो मरीज को पीबी कुष्ठ रोगी कहते हैं और इसका इलाज मात्र छह माह में हो जाता है। वहीं अगर दाग धब्बों के साथ शरीर की कोई नस प्रभावित हो या दाग व धब्बों की संख्या छह या छह से अधिक हो तो मरीज एमबी कुष्ठ रोगी कहा जाता है और बारह माह से अठारह माह तक के इलाज से वह ठीक हो जाता है। प्रशिक्षण के दौरान कुष्ठ की पहचान, इलाज, लेप्रा रिएक्शन प्रबंधन और माइक्रोप्लानिंग आदि की विस्तार से जानकारी दी गयी।
    उन्होंने बताया कि अगर दो सप्ताह से अधिक समय से खांसी आ रही हो तो व्यक्ति को टीबी भी हो सकती है। ऐसे लोगों को चिन्हित कर टीबी की जांच अवश्य कराई जानी चाहिए। अभियान के दौरान मलिन बस्तियों और उच्च जोखिम वर्ग में खास तौर से ऐसे संभावित मरीज खोजे जाएंगे। शाम को बुखार आना, पसीने के साथ बुखार, बलगम में खून आना, सांस फूलना और सीने में दर्द आदि टीबी के अन्य प्रमुख लक्षण हैं। इसके लिए इस बार करीब 10.88 लाख की आबादी के बीच 431 टीम टीबी के संभावित मरीज खोजेंगी। स्क्रीनिंग की गयी कुल आबादी में से पांच फीसदी संभावित टीबी मरीज जांच के लिए रेफर किये जाएंगे।
    इस अवसर पर डॉ एके वर्मा, डीपीसी धर्मवीर प्रताप सिंह, डीएलसी डॉ भोला, पीपीएम समन्वयक अभय नारायण मिश्रा, मिर्जा आफताब बेग, डॉ आसिफ, पवन श्रीवास्तव और महेंद्र चौहान प्रमुख तौर पर मौजूद रहे।
    घरों पर लगाएंगे स्टीकर.
    सक्रिय टीबी रोगी खोजी अभियान के दौरान टीम जिन घरों का विजिट करेगी वहां स्टीकर लगाएगी। वहीं, कुष्ठ रोग खोजी अभियान के तहत प्रत्येक घर पर मार्किंग अनिवार्य होगी। टीम मरीजों को ढूंढने के अलावा लोगों को दोनों बीमारियों के बारे में जागरूक भी करेंगी। यह संदेश प्रमुख तौर पर दिया जाएगा कि टीबी, बाल और नाखून छोड़ कर शरीर के किसी भी हिस्से में हो सकती है। इसी प्रकार कुष्ठ रोग सिर्फ चमड़ी को नहीं, बल्कि शरीर के किसी भी हिस्से को प्रभावित कर सकता है।

  • मौत का मंजर देखना हो तो साहब आईए मेजा, रामनगर क्षेत्र के प्राइवेट अस्पतालों में

    मौत का मंजर देखना हो तो साहब आईए मेजा, रामनगर क्षेत्र के प्राइवेट अस्पतालों में

    मौत का मंजर देखना हो तो साहब आईए मेजा, रामनगर क्षेत्र के प्राइवेट अस्पतालों में
    स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदार मानकों को दरकिनार करने वाले हास्पिटल क्लिनिक पर आखिर क्यों है मेहरबान
    धरती के दूसरे भगवान’,आए दिन करते हैं मरीजों के साथ खिलवाड़
    स्वास्थ्य विभाग की मिली भगत से नवीनीकरण कार्यों में अनदेखी”
    प्रयागराज का स्वास्थ्य विभाग हुआ अंधा झोलाछाप डॉक्टर कर रहे हैं मौत का धंध
    प्रयागराज। प्रयागराज में इन दिनों भीषड़ गर्मी होने के साथ मरीजों की संख्या में भी इजाफा हो रहा है दूसरी ओर मानकों की अनदेखी कर रहे हास्पिटल क्लीनिक तेजी के साथ फल फूल रहा है मनमानी करने से बाज नहीं आ रहे हैं और धड़ल्ले से मानकों की अनदेखी कर हास्पिटल क्लिनिक चला रहे हैं
    उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा निरन्तर नकेल कसा जा रहा है लेकिन भ्रष्टाचार के अकड़ में डूबे कुछ जिम्मेदार अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ लें रहें हैं।सूत्रों की मानें तो ग्रामीण से लेकर शहर तक में गरीबों की जिंदगी से खिलवाड़ करना आदत सी बन चुकी है मानकों को दरकिनार करके लगातार अस्पताल खोले जा रहे हैं। ऐसे दर्जनों हास्पिटल हैं जहां पर न तो चिकित्सक होते हैं और न ही किसी नियमों का पालन किया जाता है। इस पर रोक थाम करने वाले जिम्मेदार अपने उच्चाधिकारियों को महज़ कागजों पर कारगुजारी दिखा रिपोर्ट का खाका तैयार कर पेश कर रहे हैं । बड़े अफसरों का दबाव पड़ा तो स्वास्थ्य विभाग की टीम ऐसे हास्पिटल क्लिनिक पर समीक्षा कर महज़ नोटिस भेजने का काम किया जाता है
    हास्पिटल हो या क्लीनिक मरीज की हालत कैसी भी हो, उन्हें भर्ती करके इलाज शुरू कर देते हैं मरीज की हालत कैसी भी हो, उन्हें भर्ती करके इलाज शुरू कर देते हैं बाद में स्थिति और बिगड़ने पर रेफर कर अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ लेते हैं इसी वजह से अधिकतर लोग गलत इलाज के कारण तीमारदार अपने मरीजों को खो देते हैं।
    प्रयागराज ज़िले के विभिन्न क्षेत्रों के साथ मेजा, मेजा रोड, रामनगर समेत दर्जनों क्षेत्रों में अवैध तरीके से अस्पतालों का संचालन किया जा रहा है इन अस्पतालों का सीएमओ के यहां से कोई रजिस्ट्रेशन भी नहीं है। कुछ क्लीनिक सिर्फ मेडिकल स्टोर के लाइसेंस पर संचालित हो रही हैं। इसके अलावा अवैध अस्पतालों में दस से बीस बेड भी लगाए गए हैं सड़कों के किनारे लगे इनके बोर्डों में शहर के नामी चिकित्सकों के नाम लिखे हैं। सरकार की ओर से जारी गाइड लाइन को ध्यान में नहीं रखा जाता है।
    सूत्रों की मानें तो अस्पताल बिना लैब टेक्निशियन के खून आदि की जांच नहीं कर सकता है। वहीं अल्ट्रासाउंड के लिए सोनोलाजिस्ट की तैनाती होनी चाहिए। वहीं इन नियमों का भी हास्पिटल में पालन नहीं हो रहा है
    और धड़ल्ले के साथ मानकों की अनदेखी की तस्वीरें मौजूद हैं इसकी जानकारी जिले के सभी अधिकारियों को है। इसके बावजूद कभी कोई कार्यवाही नहीं की जाती है आखिर किसकी सरपरस्ती में संचालित हो रहा है यह जानना भी जरूरी है ऐसे हास्पिटल क्लिनिक को किसका संरक्षण मिल रहा है जल्द ही अगली सुर्खियों में यह भी बताना बेहद जरूरी है।

  • मेंटल ट्रॉमा से गुजर रहे हैं कोरोना से ठीक हुए 40 फीसदी लोग, रिसर्च में हुआ खुलासा

    मेंटल ट्रॉमा से गुजर रहे हैं कोरोना से ठीक हुए 40 फीसदी लोग, रिसर्च में हुआ खुलासा

    40 फीसदी लोग, रिसर्च में हुआ खुलासा
    मेंटल ट्रॉमा से गुजर रहे हैं कोरोना से ठीक हुए 40 फीसदी लोग, रिसर्च में हुआ खुलासा
    कोरोना महामारी के कारण आज भी 40 प्रतिशत लोगों की मेंटल हेल्थ की समस्या से जूझ रहे हैं. इन 40 प्रतिशत लोगों में वो लोग हैं जो कोरोना से बिल्कुल ठीक हो चुके हैं

  • टीबी की दवा खा रहे मरीज भी खा सकते हैं फाइलेरिया से बचाव की दवा

    टीबी की दवा खा रहे मरीज भी खा सकते हैं फाइलेरिया से बचाव की दवा

    टीबी की दवा खा रहे मरीज भी खा सकते हैं फाइलेरिया से बचाव की दवा
    अति गंभीर बिस्तर पकड़ चुके डीआर टीबी मरीजों को नहीं खिलाई जाती है दवा
    बीपी, शुगर, एचआईवी व थॉयराइड के मरीजों के लिए भी फाइलेरिया से बचाव की दवा सुरक्षित
    जिले में इस समय स्वास्थ्य विभाग की टीम घर घर जाकर फाइलेरिया से बचाव की दवा खिला रही हैं। यह दवा दो वर्ष से कम उम्र के बच्चों, गर्भवती और अति गंभीर बीमार लोगों को नहीं खिलाई जाती है। मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ आशुतोष कुमार दूबे ने अति गंभीर बीमार लोगों की श्रेणी को स्पष्ट करते हुए कहा है कि टीबी की दवा खा रहे सामान्य मरीज फाइलेरिया से बचाव की भी दवा खा सकते हैं। उन्होंने कहा कि यह दवा सिर्फ अति गंभीर और बिस्तर पकड़ चुके टीबी के डीआर रोगियों को ही नहीं खिलाई जानी है। अगर वह चलने फिरने की स्थिति में आ जाते हैं तो दवा खा सकते हैं। ब्लड प्रेशर, शुगर, एचआईवी व थॉयराइड जैसी कई जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों के मरीजों के लिए यह दवा पूरी तरह से सुरक्षित है।
    मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने बताया कि जिले में टीबी के करीब नौ हजार से अधिक रोगी इलाज पर हैं । इन सभी मरीजों के लिए नियमित दवा का सेवन करना अनिवार्य है। अगर बीच में वह दवा छोड़ देते हैं तो टीबी ठीक नहीं होती है। दवा छोड़ने वाले मरीजों के डीआर टीबी का मरीज होने की आशंका बढ़ जाती है। अगर कोई डीआर टीबी का मरीज घर पर रह कर इलाज करवा रहा है तो वह भी चिकित्सक की सलाह से फाइलेरिया से बचाव की दवा खा सकता है। डीआर टीबी के ऐसे मरीज जो अस्पताल में भर्ती हैं, अस्पताल से शीघ्र डिस्चार्ज होकर आए हैं या फिर अत्यधिक कमजोर होकर बिस्तर पकड़ चुके हैं, उन्हें फाइलेरिया से बचाव की दवा का सेवन नहीं करना है।
    डॉ दूबे बताया कि पांच साल तक लगातार साल में एक बार फाइलेरिया से बचाव की दवा का सेवन करने से इस लाइलाज बीमारी से सुरक्षा मिलती है। कुछ मिथकों के कारण ऐसे लोग दवा खाने से बचते हैं जिन्हें पहले से किसी बीमारी की दवा चल रही है, जबकि यह दवा सिर्फ ऐसे बीमार लोगों को नहीं खानी है जो अति गंभीर हैं और बिस्तर पकड़ चुके हैं। ह्रदय रोगी, कैंसर रोगी और अन्य अति गंभीर बीमारियों के मरीजों को अपने चिकित्सक से सलाह लेकर यह दवा अवश्य खानी चाहिए। फाइलेरिया से बचाव की दवा स्तनपान कराने वाली महिलाओं के लिए पूरी तरह से सुरक्षित हैं। इसे सिर्फ गर्भवती को नहीं खिलाया जाता है। अभियान के दौरान एक से दो वर्ष के बच्चों को पेट से कीड़े निकालने की दवा खिलाई जा रही है।
    टीम के सामने खाएं दवा
    डॉ दूबे ने बताया कि जिले में 4133 टीम घर घर जाकर दवा खिला रही हैं। यह दवा प्रत्येक कार्यदिवसों में सोमवार, मंगलवार, गुरुवार और शुक्रवार को खिलाई जा रही है। अवकाश के दिन दवा नहीं खिलाई जाती है। लोगों को यह दवा टीम के सामने खानी है। टीम को ही उम्र के अनुसार दवा की निर्धारित डोज की सही जानकारी है, इसलिए उनके सामने दवा खाना सुरक्षित है। इसे खाली पेट नहीं खानी है। सभी दवाएं बारी बारी एक ही साथ खानी है । जिन लोगों के शरीर में माइक्रोफाइलेरी होंगे उन्हें दवा खाने के बाद हल्की मितली, चक्कर आना, सिरदर्द के लक्षण आ सकते हैं जो सामान्यतया स्वतः ठीक हो जाते हैं। ऐसा तब होता है जबकि शरीर में माइक्रोफाइलेरी दवा से मरने लगते हैं और शरीर इनसे मुक्त हो रहा होता है।लाइलाज है फाइलेरिया
    क्यूलेक्स मच्छर के काटने से होने वाली फाइलेरिया (हाथीपांव) बीमारी का लक्षण दिखने में पांच से पंद्रह साल तक का समय लग जाता है। एक बार लक्षण आ जाने पर यह पूरी तरह से ठीक नहीं होता हैं। प्रमुख लक्षणों में हाथ, पैर, स्तन और अंडकोष में सूजन (हाइड्रोसील) हैं। अगर बचाव की दवा का सेवन लगातार पांच वर्षों तक कर लिया जाए तो संक्रमण के बावजूद यह लक्षण नहीं आएंगे। जिले में यह अभियान सभी 19 ब्लॉक के गांवों में और सात शहरी क्षेत्रों में चलाया जा रहा है।