Category: हेल्थ

  • ज्वाइंट मजिस्ट्रेट ने भटहट पीएचसी का किया औचक निरीक्षण

    ज्वाइंट मजिस्ट्रेट ने भटहट पीएचसी का किया औचक निरीक्षण

     

    गोरखपुर। जनपद के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर हर आम जनमानस को सुचारू रूप से स्वास्थ्य सेवाएं मिल रहा है कि नहीं जिलाधिकारी कृष्ण करुणेश के निर्देश पर ज्वाइंट मजिस्ट्रेट /एसडीएम सदर मृणालीअविनाश जोशी भटहट पीएचसी का औचक निरीक्षण करने पहुंची। ज्वाइंट मजिस्ट्रेट/ एसडीएम सदर औषधि भण्डार कक्ष में पहुंच कर रिकार्डों को देखा और दवाओं की उपलब्धता की जानकारी ली। इसके बाद एसडीएम ने पैदल भ्रमण करके ओपीडी कक्ष, पर्ची काउण्टर पर मरीजों का हाल चाल जाना। बृहस्पतिवार को ज्वाइंट मजिस्ट्रेट/ एसडीएम सदर ने निकट भटहट सामुदायिक स्वास्थ केंद्र का निरीक्षण करने के लिए पहुंची वहां उन्होंने अस्पताल में तैनात अधिकारियों कर्मचारियों की उपस्थिति के लिए रजिस्टर चेक किया। पर्चा पंजीकरण कक्ष से चौकीदार उपस्थिति मिले। इसके बाद उन्होंने आपातकालीन वार्ड में तैनात स्टाफ नर्सों से बात की। मरीजों के हाल चाल को जाना। अधिकारियों को सुविधाएं बढ़ाने के निर्देश दिए। इसके बाद अस्पताल में सफाई व्यवस्था, शौचालय, पेयजल सप्लाई का जायजा लिया। औषधि स्टोर में एसडीएम ने रजिस्टर से दवाईयों को मिलान किया तो वह ठीक पाया गया। अस्पताल स्टाफ को एसडीएम ने ड्रेस में आने के निर्देश दिए। उपजिलाधिकारी ने बताया कि सामुदायिक स्वास्थ केंद्र में कोई खामी नहीं पाई गई। व्यवस्था में और सुधार लाने के लिए आदेश दिए।

  • रतौंधी, अंधेपन व कुपोषण से बचाव के लिए शुरू हुआ विटामिन ‘ए’ सम्पूरण कार्यक्रम

    रतौंधी, अंधेपन व कुपोषण से बचाव के लिए शुरू हुआ विटामिन ‘ए’ सम्पूरण कार्यक्रम

    रतौंधी, अंधेपन व कुपोषण से बचाव के लिए शुरू हुआ विटामिन ‘ए’ सम्पूरण कार्यक्रम,

    एक माह तक टीकाकरण सत्र स्थलों पर पिलाई जाएगी विटामिन ‘ए’ की खुराक,

    चरगांवा पीएचसी से ब्लॉक प्रमुख और एडी हेल्थ ने किया जिला स्तरीय अभियान का शुभारंभ,

    रोगों से बचाव के साथ प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती है विटामिन ‘ए’ की खुराक,

    गोरखपुर, 04 दिसम्बर 2024,

    रतौंधी, अंधेपन व कुपोषण से बचाव और शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने व उनकी वृद्धि के लिए जिले में बुधवार से विटामिन ‘ए’ सम्पूरण कार्यक्रम शुरू किया गया। इसके तहत एक माह तक नियमित टीकाकरण के सभी सत्र स्थलों पर नौ माह से पांच साल तक के बच्चों को विटामिन ‘ए’ की खुराक पिलाई जाएगी । इस अभियान का जिला स्तरीय शुभारंभ चरगांवा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) से ब्लॉक प्रमुख वंदना सिंह और एडी हेल्थ डॉ एनपी गुप्ता ने किया। संयुक्त निदेशक स्वास्थ्य डॉ बीएम राव, जिला प्रतिरक्षण अधिकारी डॉ नंदलाल कुशवाहा, प्रभारी चिकित्सा अधिकारी डॉ धनंजय कुशवाहा और स्वास्थ्य शिक्षा एवं सूचना अधिकारी मनोज कुमार ने भी उद्घाटन कार्यक्रम में बच्चों को दवा पिलाया।

    मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ आशुतोष कुमार दूबे ने बताया कि जिले के सभी ब्लॉक स्तरीय अस्पतालों से इस अभियान का शुभारंभ स्थानीय जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी में किया गया। विटामिन ‘ए’ की पहली खुराक आधा चम्मच (एक एमएल) नौ माह पर दी जाती है, जबकि दूसरी खुराक एक चम्मच (दो एमएल) एक वर्ष की आयु के बाद दी जाती है। नौ माह से पांच वर्ष की उम्र तक कुल नौ बार बच्चे को विटामिन ‘ए’ की खुराक पिलाई जानी अनिवार्य है। सभी पात्र बच्चों को यह दवा पिलाई जा सके, इसके लिए तीन जनवरी तक यह अभियान चलेगा। क्षेत्र की आशा कार्यकर्ता की मदद से नजदीकी टीकाकरण सत्र स्थल पर अपने पाल्य को ले जाकर यह दवा एएनएम की मदद से पिलाई जा सकती है। इस दवा से निमोनिया और डायरिया से भी बचाव होता है। साथ में यह मीजिल्स होने की स्थिति में मृत्यु दर और जटिलता को कम करती है।

    सीएमओ डॉ दूबे ने बताया कि जिले के 594 उपकेंद्रों, तेईस शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, एम्स, बीआरडी मेडिकल कॉलेज, रेलवे एवं जिला महिला अस्पताल में नियमित टीकाकरण स्थल पर अभियान के दौरान दवा पिलाई जाएगी। जिले में नौ माह से पांच वर्ष तक के करीब 5.76 लाख बच्चों को दवा पिलाई जानी है। इनमें नौ से बारह माह के करीब 65000 बच्चे, एक से दो वर्ष तक के करीब 1.23 लाख बच्चे और और दो से पांच वर्ष तक के 3.88 लाख बच्चे शामिल हैं। यह दवा सभी पात्र बच्चों को निर्धारित मात्रा में सरकारी खर्चे पर पिलाई जाती है।

    उद्घाटन के मौके पर चिकित्सा अधिकारी डॉ प्रफुल्ल कुमार राय, डब्ल्यूएचओ के एसएमओ डॉ विनय, डॉ अमरनाथ, डॉ वीके सिंह, डॉ पवन कुमार, डॉ श्वाति, बीपीएम गगन, लोकेंद्र, रुदल, यूनिसेफ संस्था के प्रतिनिधि चिरंजीव आदि प्रमुख तौर पर मौजूद रहे।

    *5.53 लाख बच्चों ने पी थी दवा*

    जिला प्रतिरक्षण अधिकारी डॉ नंदलाल कुशवाहा ने बताया कि यह अभियान वर्ष में दो बार चलता है। पिछले वर्ष जून में चले अभियान के दौरान 5.53 लाख बच्चों को विटामिन ए की खुराक पिलाई गई थी। दवा पूरी तरह से सुरक्षित और असरदार है।

    टीकाकरण और दवा सेवन सुरक्षित,

    चरगांवा पीएचसी पर सबसे पहले विटामिन ‘ए’ की दवा का सेवन करने वाली 16 माह की बच्ची ऋषिका की मां अल्का (30) ने बताया कि नियमित टीकाकरण व इस दवा का सेवन बच्चों के लिए पूरी तरह से सुरक्षित है। उनकी बच्ची इससे पहले भी यह दवा पी चुकी है। उनका मायका गोरखपुर के गंगानगर मोहल्ले में है। वह पीएचसी पर बच्ची के टीकाकरण के लिए ही आई थीं। इसी दौरान उनकी बच्ची को अधिकारियों द्वारा इस दवा का सेवन कराया गया।

  • ओबीसी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव डॉक्टर संजय कुमार जायसवाल जी को लखनऊ में किया गया सम्मानित

    ओबीसी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव डॉक्टर संजय कुमार जायसवाल जी को लखनऊ में किया गया सम्मानित

    ओबीसी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव डॉक्टर संजय कुमार जायसवाल जी को लखनऊ में किया गया सम्मानित,

    चौधरी चरण सिंह ऑडिटोरियम सहकारिता भवन के सभागार में दिनांक 30 11 2024 को इंस्टीट्यूट ऑफ इलेक्ट्रोहोम्योपैथ ऑफ इंडिया के तत्वाधान में दीक्षांत समारोह का आयोजन किया गया l इंस्टीट्यूट ऑफ इलेक्ट्रोहोम्योपैथ ऑफ इंडिया ने गोरखपुर के इलेक्ट्रोहोम्योपैथ के वरिष्ठ चिकित्सक समाजसेवी/पिछड़े समाज के लीडर ओबीसी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव डॉ संजय कुमार जायसवाल जी को मुख्य अतिथि केंद्रीय सरकार के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री माननीय अश्वनी कुमार चौबे जी के द्वारा डॉ राम मनोहर लोहिया सम्मान पत्र देकर सम्मानित किया गया l
    इस दीक्षांत समारोह में आए हुए भारत के कई राज्यों के इलेक्ट्रोहोम्योपैथ के चिकित्सकों तथा छात्र छात्राओं को भी सम्मानित किया गया l

  • एम्स पूर्वांचल: मेडिकल टूरिज्म का नया हब बनने की ओर

    एम्स पूर्वांचल: मेडिकल टूरिज्म का नया हब बनने की ओर

     

    गोरखपुर। एम्स पूर्वांचल अब मेडिकल टूरिज्म का केंद्र बनने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है। अन्य बड़े शहरों के मुकाबले, यहां इलाज की लागत कम होगी, जिससे विदेशों से आने वाले मरीजों को बड़ी राहत मिलेगी। विशेष रूप से, शार्क देशों और गल्फ कंट्रीज से आने वाले मरीजों को प्राथमिकता दी जाएगी, हालांकि इन मरीजों के इलाज का खर्च सामान्य मरीजों से कुछ ज्यादा होगा। एम्स इस उद्देश्य के लिए जल्द ही मेडिकल टूरिज्म पॉलिसी तैयार करेगा।

    भारत में इलाज की लागत विदेशों की तुलना में काफी कम होती है। बड़े ऑपरेशनों से लेकर सामान्य जांच तक, विदेशों में मरीजों को भारी खर्च करना पड़ता है। कनाडा में दांत और आंखों के इलाज की ऊंची कीमतें, वहीं अफगानिस्तान और अन्य गल्फ देशों में कैंसर और महिला संबंधित बीमारियों का इलाज महंगा है। इसके अलावा, कॉस्मेटिक प्रोसीजर में भारत अफ्रीका की तुलना में कम से कम 50 प्रतिशत सस्ता है।

    एम्स के कार्यकारी निदेशक डॉ. अजय सिंह ने बताया कि गोरखपुर में एम्स को विश्व स्तर पर पहचान दिलाने के लिए मेडिकल टूरिज्म एक बेहतरीन विकल्प है। इसके तहत, विदेश से आने वाले मरीजों के लिए बेड रिजर्व किए जाएंगे और इलाज वरीयता के आधार पर किया जाएगा।

    दिल्ली और मुंबई से गोरखपुर की सीधी फ्लाइट कनेक्टिविटी भी इस योजना के लिए लाभकारी साबित होगी। विदेश से आने वाले मरीज सीधे इन शहरों से गोरखपुर पहुंच सकते हैं, जिससे उन्हें यात्रा में परेशानी नहीं होगी।

    एम्स ने सभी विभागों को निर्देश दिया है कि वे देशभर के प्रमुख संस्थानों में इलाज पर होने वाले खर्च का अध्ययन करें, ताकि यहां इलाज के रेट तय किए जा सकें। इसके अलावा, मेडिकल टूरिज्म पॉलिसी के तहत, एम्स को और अधिक मरीज आकर्षित करने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएंगे।

  • बच्चों में टीबी खोजने और त्वरित इलाज के लिए प्रशिक्षित हुए चिकित्सक

    बच्चों में टीबी खोजने और त्वरित इलाज के लिए प्रशिक्षित हुए चिकित्सक

    बच्चों में टीबी खोजने और त्वरित इलाज के लिए प्रशिक्षित हुए चिकित्सक,

    सरकारी अस्पतालों के प्रशिक्षित चिकित्सा अधिकारी अब ब्लॉक के स्वास्थ्य कर्मियों का करेंगे संवेदीकरण

    गोरखपुर, 01 दिसम्बर 2024,

    बच्चों में टीबी के कारण होने वाले जोखिम और मृत्यु दर को कम करने के लिए जिले के 26 चिकित्सकों को तैयार किया गया है। इनमें से बीस सरकारी क्षेत्र के चिकित्सा अधिकारी हैं जो ब्लॉक स्तरीय स्वास्थ्य कर्मियों का संवेदीकरण करेंगे ताकि अधिक से अधिक बाल टीबी रोगी खोजे जाएं और उन्हें त्वरित उपचार मिल सके। वहीं, छह निजी क्षेत्र के बाल रोग विशेषज्ञों को भी प्रशिक्षित किया गया है जिनकी मदद से अधिकाधिक बाल टीबी रोगी खोजे जाएंगे। यह जानकारी जिला क्षय उन्मूलन अधिकारी (डीटीओ) डॉ गणेश यादव ने दी।

    डीटीओ डॉ यादव ने बताया कि बीआरडी मेडिकल कॉलेज में सहयोगी संस्था वर्ल्ड हेल्थ पार्टनर (डब्ल्यूएचपी) की मदद से बच्चों में टीबी निदान, उपचार और प्रबन्धन संबंधी प्रशिक्षण दिया गया। इसका शुभारंभ कॉलेज के सहायक प्राध्यापक डॉ अजीत कुमार यादव, डीटीओ गोरखपुर और इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिशियन के अध्यक्ष डॉ एनके जायसवाल ने किया। सरकारी अस्पताल के चिकित्सा अधिकारियों को मास्टर ट्रेन के तौर पर प्रशिक्षित किया गया है। राज्य स्तर से मास्टर ट्रेनर के तौर पर प्रशिक्षित डीटीओ गोरखपुर और डॉ अजीत कुमार यादव ने प्रशिक्षण दिया है।

    प्रशिक्षण के दौरान चिकित्सकों को बताया गया कि बच्चों में टीबी की पहचान कठिन होती है। ऐसे में सीबीनॉट और माइक्रोबायलोजिकल जांच को बढ़ा कर बच्चों में टीबी का पता लगाना है। इसके लिए समुदाय स्तर पर आशा, आंगनबाड़ी, सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी, सभी सरकारी अस्पतालों के चिकित्सा अधिकारी और निजी अस्पतालों के चिकित्सक प्रमुख सहयोगी हो सकते हैं। टीबी का लक्षण दिखने पर बच्चों की त्वरित जांच कराई जानी चाहिए। शीघ्र पहचान और सम्पूर्ण इलाज से बच्चों को टीबी से मुक्त कराया जा सकता है। अति कुपोषित बच्चों और टीबी के गैर उपचाराधीन मरीजों के निकट सम्पर्की बच्चों में टीबी होने की आशंका कहीं अधिक होती है।

    इस अवसर पर डब्ल्यूएचपी के जिला प्रबंधक संदीप कुमार कौशल, डीपीसी धर्मवीर प्रताप, पीपीएम समन्यवक एएन मिश्रा, मिर्जा आफताब बेग, रामेंद्र श्रीवास्तव, आकाश गोबिंद राव और अनिता सिंह प्रमुख तौर पर मौजूद रहे।

    खिलाते हैं बचाव की दवा,

    पीपीएम समन्यवक अभय नारायण मिश्र ने बताया कि जिन टीबी मरीजों के निकट सम्पर्क में छह वर्ष तक के बच्चे होते हैं, अगर इन बच्चों में टीबी के लक्षण नहीं है तब भी छह माह तक इन बच्चों को टीबी से बचाव की दवा खिलाई जाती है। अगर लक्षण होते हैं तो टीबी की जांच कराते हैं, नहीं तो बिना जांच के ही बचाव की दवा खिलाई जाती है। इस वर्ष 2640 बच्चों को टीबी से बचाव की दवा खिलाई गई है।

    लक्षणों के प्रति रहें सतर्क,

    डीटीओ डॉ गणेश यादव ने बताया कि अगर बच्चे का तेजी से वजन गिर रहा है, दो सप्ताह से अधिक की खांसी है, भूख नहीं लग रही है, रात में पसीने के साथ बुखार हो, सीने में दर्द, बलगम में खून आ रहा हो या सांस फूल रही हो तो टीबी की जांच अवश्य कराई जानी चाहिए।

  • प्रत्येक एचआईवी मरीज को छह माह तक टीबी से बचाव की दवा खाना अनिवार्य’’

    प्रत्येक एचआईवी मरीज को छह माह तक टीबी से बचाव की दवा खाना अनिवार्य’’

    विश्व एड्स दिवस (01 दिसम्बर 2024) पर विशेष,

    ‘’प्रत्येक एचआईवी मरीज को छह माह तक टीबी से बचाव की दवा खाना अनिवार्य’’,

    एचआईवी मरीजों में टीबी रोगी होने की संभावना अधिक,

    वर्ष 2019 से अब तक 0.74 फीसदी मरीजों में एचआईवी-एड्स और टीबी दोनों बीमारियां मिलीं

    गोरखपुर, 30 नवम्बर 2024,

    ह्यूमन इम्यूनोडेफिशिएंसी वायरस (एचआईवी) वह वायरस है जो एक्वायर्ड इम्यून डेफिसिएंसी सिंड्रोम (एड्स) बीमारी का कारण बनता है। रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने के कारण एचआईवी मरीजों में टीबी होने की आशंका कहीं अधिक होती है । इसकी वजह से प्रत्येक एचआईवी मरीज की टीबी जांच जरूरी है और अगर वह टीबी मरीज नहीं होते हैं तब भी उन्हें छह माह तक टीबी से बचाव की दवा खाना अनिवार्य है। गोरखपुर जिले में वर्ष 2019 से अब तक 0.74 फीसदी मरीजों में एचआईवी-एड्स और टीबी दोनों बीमारियां मिली हैं।

    जिला एड्स नियंत्रण और क्षय उन्मूलन अधिकारी डॉ गणेश यादव ने बताया कि वर्ष 2019 से अब तक टीबी के 71103 नये रोगी ढूंढे गये। इनमें से 528 मरीज ऐसे पाए गये जिन्हें दोनों बीमारियां थीं। एचआईवी से ग्रसित टीबी मरीजों के ठीक होने में समय लगता है और उन्हें जटिलताएं भी कहीं ज्यादा होती हैं, लेकिन समय से इस सहरूग्णता की पहचान हो जाए तो ऐसे टीबी मरीज भी जल्दी ठीक हो सकते हैं । इसी वजह से टीबी की पहचान होने पर प्रत्येक मरीज की एचआईवी जांच और प्रत्येक एचआईवी मरीज की टीबी जांच अनिवार्य है ।

    उन्होंने बताया कि स्वास्थ्य विभाग प्रत्येक टीबी मरीज की एचआईवी जांच करवाता है। एचआईवी की पुष्टि होने पर टीबी और एचआईवी की दवा साथ साथ चलती है । ऐसा करने से एचआईवी ग्रसित टीबी मरीज ठीक हो जाता है और उसका जटिलताओं से भी बचाव होता है । निजी अस्पतालों में इलाज करवाने वाले टीबी मरीजों को भी चिकित्सक की सहमति से इस जांच की सुविधा सरकारी अस्पतालों में दी जा रही है । एचआईवी ग्रसित टीबी मरीजों के जीवनसाथी की भी जांच कराई जाती है ।

    *316 मरीजों को खिलाई बचाव की दवा*

    डॉ यादव ने बताया कि इस वर्ष 316 एचआईवी मरीजों को टीबी से बचाव की दवा खिलाई गई। जिन टीबी मरीजों को एचआईवी भी है, उनके टीबी का इलाज पूरा होने के बाद उन्हें भी छह माह तक टीबी से बचाव की दवा खिलाते हैं। लेकिन अगर ऐसे मरीज ड्रग रेसिस्टेंट टीबी मरीज हैं तो उन्हें बचाव की दवा नहीं खिलाई जाती है।

    जिले में एचआईवी के 5672 सक्रिय मरीज,

    जिला एड्स नियंत्रण अधिकारी डॉ गणेश यादव ने बताया कि इस समय जनपद में एचआईवी के 5672 सक्रिय मरीज हैं। इस वित्तीय वर्ष में 436 नये एचआईवी मरीज पंजीकृत किये गये। इलाज के दौरान दस एचआईवी मरीजों की मौत भी हुई है। सत्तावन ऐसे एचआईवी मरीज पंजीकृत किये गये हैं जिनमें टीबी की भी बीमारी निकली है। इन मरीजों को दोनों प्रकार की दवाएं साथ साथ खिलाई जा रही हैं।

    टीबी के लक्षण,

    • दो सप्ताह से अधिक की खांसी
    • पसीने के साथ बुखार
    • अत्यधिक कमजोरी
    • भूख न लगना
    • बलगम में खून आना
    • सीने में दर्द

    एचआईवी के लक्षण,

    • वजन का कम होना
    • एक महीने से अधिक बुखार आना
    • एक महीने से अधिक का दस्त

    एड्स के लक्षण,

    • लगातार खांसी
    • चर्म रोग
    • मुंह एवं गले में छाले होना
    • लसिका ग्रंथियों में सूजन एवं गिल्टी
    • याददाश्त खोना
    • मानसिक क्षमता कम होना
    • शारीरिक शक्ति का कम होना

    *एचआईवी और एड्स में अंतर*

    डॉ यादव ने बताया कि जब कोई व्यक्ति कई वर्षों तक एचआईवी वायरस से पीड़ित रहता है और उसका उपचार नहीं होता है तो वह एड्स मरीज बन जाता है । यदि एचआईवी मरीज एड्स का रोगी बन जाता है, तो उसकी प्रतिरक्षा प्रणाली रोगाणुओं से अच्छी तरह से नहीं लड़ पाती। यही वजह है कि एड्स से पीड़ित लोगों को अक्सर गंभीर संक्रमण और स्वास्थ्य समस्याएं होती हैं।

  • सात विभाग मिल कर चलाएंगे पल्स पोलियो अभियान, उदासीन परिवारों को भी करेंगे प्रेरित*  मुख्य विकास अधिकारी संजय कुमार मीणा ने पत्र जारी कर दिये विस्तृत दिशा निर्देश  घर घर भ्रमण के दौरान खसरा के संभावित मरीजों को भी रिपोर्ट करेंगी पल्स पोलियो टीम  *गोरखपुर, 29 नवम्बर 2024*  जिले में आठ दिसम्बर से शुरू हो रहे पल्स पोलियो अभियान को सफल बनाने के लिए मुख्य विकास अधिकारी संजय कुमार मीणा ने सात विभागों की जिम्मेदारी तय की है। उन्होंने पत्र जारी कर इन विभागों को विस्तृत दिशा निर्देश दिये हैं। पांच वर्ष तक के सभी बच्चों को पोलियो की दवा पिलाने में सहयोग करने के साथ साथ यह विभाग उदासीन (इंकारी) परिवारों को भी प्रेरित करेंगे ताकि उनके घर के बच्चे दवा पी सकें। साथ ही घर घर भ्रमण के दौरान पल्स पोलियो की टीम को खसरा के संभावित मरीजों की रिपोर्ट भी स्थानीय सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) पर करनी होगी।  मुख्य विकास अधिकारी ने स्वास्थ्य विभाग, राजस्व विभाग, आपूर्ति विभाग, नगर निकाय विभाग, पंचायती राज विभाग, आईसीडीएस और बेसिक शिक्षा विभाग को पत्र जारी कर अभियान में सहयोग करने का निर्देश दिया है। मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ आशुतोष कुमार दूबे ने बताया कि पत्र के मुताबिक स्वास्थ्य विभाग की आशा कार्यकर्ता और स्थानीय पल्स पोलियो की टीम को पहले से ही अध्यापक, शिक्षामित्र, ग्राम प्रधान या वार्ड मेंबर अथवा उत्तरदायी व्यक्ति, धर्मगुरू और आंगनबाड़ी कार्यकर्ता से सम्पर्क कर गतिविधियों का क्रियान्वयन सुनिश्चित कराना है। सुपरवाइजर इस कार्य का फॉलो अप करेंगे। सभी अधीक्षक अभियान के दौरान नियमित सांध्यकालीन बैठकें कर समीक्षा करेंगे और डब्ल्यूएचओ व यूनिसेफ के फीडबैक के आधार पर गैप्स को दूर करेंगे। पोलियो की प्रत्येक टीम को फीवर बिद रैश (संभावित खसरा) मरीजों की रिपोर्ट भी करनी होगी।  सीएमओ डॉ दूबे ने बताया कि दिसम्बर 2023 में चले पल्स पोलियो अभियान के दौरान करीब 8.93 लाख घरों के 6.47 लाख बच्चों को दवा पिलाई गई थी। इस वर्ष आठ दिसम्बर को जिले भर में बूथ पर दवा पिलाई जाएगी । नौ से तेरह दिसम्बर तक पल्स पोलियो की टीम घर घर जाकर दवा पिलाएंगी। छूटे हुए बच्चों को बी टीम द्वारा 16 दिसम्बर को दवा पिलाई जाएगी। इसके बाद सत्रह दिसम्बर को इन राउंड सर्वे कर पता लगाया जाएगा कि कहीं कोई अन्य बच्चा छूट तो नहीं रह गया है। ऐसे बच्चों को भी दवा पिलाई जाती है। बेसिक शिक्षा विभाग को निर्देश है कि अभियान के बूथ दिवस पर आठ दिसम्बर को सभी प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालय सुबह आठ बजे से शाम चार बजे तक खुले रखे जाएं। एक दिन पहले रैली निकाली जाए और बुलावा टोली की मदद से पांच वर्ष तक के बच्चों को बुला कर पल्स पोलियो की दवा पिलाई जाए। सभी शिक्षा विभाग के सुपरवाइजर भी सांध्यकालीन बैठक में प्रतिभाग अवश्य करें।   *माताओं को प्रेरित करें आंगनबाड़ी सहायिका*  सीडीओ द्वारा जारी पत्र के मुताबिक आईसीडीएस से जुड़ी आंगनबाड़ी सहायिका को अपने केंद्र पर पंजीकृत तीन से पांच वर्ष तक के बच्चों को बूथ तक लाकर दवा पिलवानी है । तीन वर्ष के कम उम्र के बच्चों की माताओं को प्रेरित करना है कि वह बूथ पर पहुंच कर अपने पाल्यों को दवा पिलाएं। गांवों में ग्राम प्रधान या ग्राम सचिव और नगरों में वहां के जनप्रतिनिधि या वार्ड मेंबर के जरिये बूथ का उद्घाटन करने के साथ साथ उदासीन (इंकारी) परिवारों को स्थानीय प्रभावशाली लोगों के सहयोग से दवा पिलवाने के लिए तैयार करने को कहा गया है। आपूर्ति विभाग से जुड़े कोटेदार और राजस्व विभाग से जुड़े लेखपालों को भी प्रभावशाली लोगों की मदद से बच्चों के दवा पिलवाने का निर्देश जारी किया गया है

    सात विभाग मिल कर चलाएंगे पल्स पोलियो अभियान, उदासीन परिवारों को भी करेंगे प्रेरित* मुख्य विकास अधिकारी संजय कुमार मीणा ने पत्र जारी कर दिये विस्तृत दिशा निर्देश घर घर भ्रमण के दौरान खसरा के संभावित मरीजों को भी रिपोर्ट करेंगी पल्स पोलियो टीम *गोरखपुर, 29 नवम्बर 2024* जिले में आठ दिसम्बर से शुरू हो रहे पल्स पोलियो अभियान को सफल बनाने के लिए मुख्य विकास अधिकारी संजय कुमार मीणा ने सात विभागों की जिम्मेदारी तय की है। उन्होंने पत्र जारी कर इन विभागों को विस्तृत दिशा निर्देश दिये हैं। पांच वर्ष तक के सभी बच्चों को पोलियो की दवा पिलाने में सहयोग करने के साथ साथ यह विभाग उदासीन (इंकारी) परिवारों को भी प्रेरित करेंगे ताकि उनके घर के बच्चे दवा पी सकें। साथ ही घर घर भ्रमण के दौरान पल्स पोलियो की टीम को खसरा के संभावित मरीजों की रिपोर्ट भी स्थानीय सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) पर करनी होगी। मुख्य विकास अधिकारी ने स्वास्थ्य विभाग, राजस्व विभाग, आपूर्ति विभाग, नगर निकाय विभाग, पंचायती राज विभाग, आईसीडीएस और बेसिक शिक्षा विभाग को पत्र जारी कर अभियान में सहयोग करने का निर्देश दिया है। मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ आशुतोष कुमार दूबे ने बताया कि पत्र के मुताबिक स्वास्थ्य विभाग की आशा कार्यकर्ता और स्थानीय पल्स पोलियो की टीम को पहले से ही अध्यापक, शिक्षामित्र, ग्राम प्रधान या वार्ड मेंबर अथवा उत्तरदायी व्यक्ति, धर्मगुरू और आंगनबाड़ी कार्यकर्ता से सम्पर्क कर गतिविधियों का क्रियान्वयन सुनिश्चित कराना है। सुपरवाइजर इस कार्य का फॉलो अप करेंगे। सभी अधीक्षक अभियान के दौरान नियमित सांध्यकालीन बैठकें कर समीक्षा करेंगे और डब्ल्यूएचओ व यूनिसेफ के फीडबैक के आधार पर गैप्स को दूर करेंगे। पोलियो की प्रत्येक टीम को फीवर बिद रैश (संभावित खसरा) मरीजों की रिपोर्ट भी करनी होगी। सीएमओ डॉ दूबे ने बताया कि दिसम्बर 2023 में चले पल्स पोलियो अभियान के दौरान करीब 8.93 लाख घरों के 6.47 लाख बच्चों को दवा पिलाई गई थी। इस वर्ष आठ दिसम्बर को जिले भर में बूथ पर दवा पिलाई जाएगी । नौ से तेरह दिसम्बर तक पल्स पोलियो की टीम घर घर जाकर दवा पिलाएंगी। छूटे हुए बच्चों को बी टीम द्वारा 16 दिसम्बर को दवा पिलाई जाएगी। इसके बाद सत्रह दिसम्बर को इन राउंड सर्वे कर पता लगाया जाएगा कि कहीं कोई अन्य बच्चा छूट तो नहीं रह गया है। ऐसे बच्चों को भी दवा पिलाई जाती है। बेसिक शिक्षा विभाग को निर्देश है कि अभियान के बूथ दिवस पर आठ दिसम्बर को सभी प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालय सुबह आठ बजे से शाम चार बजे तक खुले रखे जाएं। एक दिन पहले रैली निकाली जाए और बुलावा टोली की मदद से पांच वर्ष तक के बच्चों को बुला कर पल्स पोलियो की दवा पिलाई जाए। सभी शिक्षा विभाग के सुपरवाइजर भी सांध्यकालीन बैठक में प्रतिभाग अवश्य करें। *माताओं को प्रेरित करें आंगनबाड़ी सहायिका* सीडीओ द्वारा जारी पत्र के मुताबिक आईसीडीएस से जुड़ी आंगनबाड़ी सहायिका को अपने केंद्र पर पंजीकृत तीन से पांच वर्ष तक के बच्चों को बूथ तक लाकर दवा पिलवानी है । तीन वर्ष के कम उम्र के बच्चों की माताओं को प्रेरित करना है कि वह बूथ पर पहुंच कर अपने पाल्यों को दवा पिलाएं। गांवों में ग्राम प्रधान या ग्राम सचिव और नगरों में वहां के जनप्रतिनिधि या वार्ड मेंबर के जरिये बूथ का उद्घाटन करने के साथ साथ उदासीन (इंकारी) परिवारों को स्थानीय प्रभावशाली लोगों के सहयोग से दवा पिलवाने के लिए तैयार करने को कहा गया है। आपूर्ति विभाग से जुड़े कोटेदार और राजस्व विभाग से जुड़े लेखपालों को भी प्रभावशाली लोगों की मदद से बच्चों के दवा पिलवाने का निर्देश जारी किया गया है

    सात विभाग मिल कर चलाएंगे पल्स पोलियो अभियान, उदासीन परिवारों को भी करेंगे प्रेरित,

    मुख्य विकास अधिकारी संजय कुमार मीणा ने पत्र जारी कर दिये विस्तृत दिशा निर्देश,

    घर घर भ्रमण के दौरान खसरा के संभावित मरीजों को भी रिपोर्ट करेंगी पल्स पोलियो टीम,

    गोरखपुर, 29 नवम्बर 2024,

    जिले में आठ दिसम्बर से शुरू हो रहे पल्स पोलियो अभियान को सफल बनाने के लिए मुख्य विकास अधिकारी संजय कुमार मीणा ने सात विभागों की जिम्मेदारी तय की है। उन्होंने पत्र जारी कर इन विभागों को विस्तृत दिशा निर्देश दिये हैं। पांच वर्ष तक के सभी बच्चों को पोलियो की दवा पिलाने में सहयोग करने के साथ साथ यह विभाग उदासीन (इंकारी) परिवारों को भी प्रेरित करेंगे ताकि उनके घर के बच्चे दवा पी सकें। साथ ही घर घर भ्रमण के दौरान पल्स पोलियो की टीम को खसरा के संभावित मरीजों की रिपोर्ट भी स्थानीय सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) पर करनी होगी।

    मुख्य विकास अधिकारी ने स्वास्थ्य विभाग, राजस्व विभाग, आपूर्ति विभाग, नगर निकाय विभाग, पंचायती राज विभाग, आईसीडीएस और बेसिक शिक्षा विभाग को पत्र जारी कर अभियान में सहयोग करने का निर्देश दिया है। मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ आशुतोष कुमार दूबे ने बताया कि पत्र के मुताबिक स्वास्थ्य विभाग की आशा कार्यकर्ता और स्थानीय पल्स पोलियो की टीम को पहले से ही अध्यापक, शिक्षामित्र, ग्राम प्रधान या वार्ड मेंबर अथवा उत्तरदायी व्यक्ति, धर्मगुरू और आंगनबाड़ी कार्यकर्ता से सम्पर्क कर गतिविधियों का क्रियान्वयन सुनिश्चित कराना है। सुपरवाइजर इस कार्य का फॉलो अप करेंगे। सभी अधीक्षक अभियान के दौरान नियमित सांध्यकालीन बैठकें कर समीक्षा करेंगे और डब्ल्यूएचओ व यूनिसेफ के फीडबैक के आधार पर गैप्स को दूर करेंगे। पोलियो की प्रत्येक टीम को फीवर बिद रैश (संभावित खसरा) मरीजों की रिपोर्ट भी करनी होगी।

    सीएमओ डॉ दूबे ने बताया कि दिसम्बर 2023 में चले पल्स पोलियो अभियान के दौरान करीब 8.93 लाख घरों के 6.47 लाख बच्चों को दवा पिलाई गई थी। इस वर्ष आठ दिसम्बर को जिले भर में बूथ पर दवा पिलाई जाएगी । नौ से तेरह दिसम्बर तक पल्स पोलियो की टीम घर घर जाकर दवा पिलाएंगी। छूटे हुए बच्चों को बी टीम द्वारा 16 दिसम्बर को दवा पिलाई जाएगी। इसके बाद सत्रह दिसम्बर को इन राउंड सर्वे कर पता लगाया जाएगा कि कहीं कोई अन्य बच्चा छूट तो नहीं रह गया है। ऐसे बच्चों को भी दवा पिलाई जाती है। बेसिक शिक्षा विभाग को निर्देश है कि अभियान के बूथ दिवस पर आठ दिसम्बर को सभी प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालय सुबह आठ बजे से शाम चार बजे तक खुले रखे जाएं। एक दिन पहले रैली निकाली जाए और बुलावा टोली की मदद से पांच वर्ष तक के बच्चों को बुला कर पल्स पोलियो की दवा पिलाई जाए। सभी शिक्षा विभाग के सुपरवाइजर भी सांध्यकालीन बैठक में प्रतिभाग अवश्य करें।

    माताओं को प्रेरित करें आंगनबाड़ी सहायिका,

    सीडीओ द्वारा जारी पत्र के मुताबिक आईसीडीएस से जुड़ी आंगनबाड़ी सहायिका को अपने केंद्र पर पंजीकृत तीन से पांच वर्ष तक के बच्चों को बूथ तक लाकर दवा पिलवानी है । तीन वर्ष के कम उम्र के बच्चों की माताओं को प्रेरित करना है कि वह बूथ पर पहुंच कर अपने पाल्यों को दवा पिलाएं। गांवों में ग्राम प्रधान या ग्राम सचिव और नगरों में वहां के जनप्रतिनिधि या वार्ड मेंबर के जरिये बूथ का उद्घाटन करने के साथ साथ उदासीन (इंकारी) परिवारों को स्थानीय प्रभावशाली लोगों के सहयोग से दवा पिलवाने के लिए तैयार करने को कहा गया है। आपूर्ति विभाग से जुड़े कोटेदार और राजस्व विभाग से जुड़े लेखपालों को भी प्रभावशाली लोगों की मदद से बच्चों के दवा पिलवाने का निर्देश जारी किया गया है।

  • ऐतिहासिक उपलब्धि: एम्स गोरखपुर में पहली बार सफल लैप्रोस्कोपिक रेडिकल कोलेसिस्टेक्टॉमी

    ऐतिहासिक उपलब्धि: एम्स गोरखपुर में पहली बार सफल लैप्रोस्कोपिक रेडिकल कोलेसिस्टेक्टॉमी

    ऐतिहासिक उपलब्धि: एम्स गोरखपुर में पहली बार सफल लैप्रोस्कोपिक रेडिकल कोलेसिस्टेक्टॉमी,

    गोरखपुर, 26 नवंबर 2024: अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) गोरखपुर ने एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। संस्थान में पहली बार लैप्रोस्कोपिक रेडिकल कोलेसिस्टेक्टॉमी सर्जरी सफलतापूर्वक संपन्न की गई। यह सर्जरी एक बुजुर्ग महिला मरीज पर की गई, जिन्हें उच्च रक्तचाप और रक्तचाप में उतार-चढ़ाव की समस्या थी।

    इस जटिल सर्जरी को सर्जरी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. गौरव गुप्ता के निर्देशन में डॉ. हरिकेश यादव, एसोसिएट प्रोफेसर, सर्जरी विभाग ने सफलतापूर्वक अंजाम दिया। मरीज को एनेस्थीसिया देने की जिम्मेदारी डॉ. गणेश, एसोसिएट प्रोफेसर ने निभाई, जो एनेस्थीसिया विभाग के प्रॉफेसर और कार्यवाहक विभागाध्यक्ष डॉ. संतोष कुमार शर्मा के मार्गदर्शन में कार्यरत थे। मरीज के जटिल चिकित्सीय इतिहास को देखते हुए सर्जरी से पहले गहन योजना और अत्याधुनिक मॉनिटरिंग तकनीक का उपयोग किया गया।

    फिलहाल मरीज को हाल ही में उद्घाटन किए गए एनेस्थीसिया इंटेंसिव केयर यूनिट (आईसीयू) में भर्ती किया गया है, जहां उनकी स्थिति पर कड़ी निगरानी रखी जा रही है। आईसीयू की टीम मरीज की सुरक्षा और शीघ्र स्वस्थ होने के लिए हरसंभव प्रयास कर रही है।

    एम्स गोरखपुर के कार्यकारी निदेशक प्रोफेसर डॉ. अजय सिंह ने सर्जिकल और एनेस्थीसिया टीम के इस अद्वितीय प्रयास की सराहना की। उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि एम्स गोरखपुर की आधुनिक और उन्नत स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने की प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

  • संक्रमण मुक्त होता है मां का दूध, टीबी उपचाराधीन माताएं करा सकती हैं स्तनपान

    संक्रमण मुक्त होता है मां का दूध, टीबी उपचाराधीन माताएं करा सकती हैं स्तनपान

    संक्रमण मुक्त होता है मां का दूध, टीबी उपचाराधीन माताएं करा सकती हैं स्तनपान,

    मास्क का इस्तेमाल कर बच्चे को स्तनपान कराना सुरक्षित

    टीबी के लक्षणों के प्रति गर्भवती और धात्री महिलाओं को रहना चाहिए अधिक सतर्क

    गोरखपुर, 26 नवम्बर 2024,

    मां का दूध हर प्रकार से संक्रमण मुक्त होता है । ऐसे में अगर किसी माता को टीबी है और उनका उपचार चल रहा है तो वह भी मास्क लगा कर सावधानी के साथ बच्चे को स्तनपान करवाना जारी रखें। ऐसी माताओं द्वारा बच्चे को स्तनपान न कराना बच्चे की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम कर सकता है। साथ ही अगर किसी भी गर्भवती और धात्री महिला में टीबी का लक्षण दिखे तो अधिक सतर्कता बरतते हुए त्वरित जांच और इलाज करवाना चाहिए। यह कहना है जिला क्षय उन्मूलन अधिकारी डॉ गणेश यादव का । उन्होंने अपील की है कि अगर किसी गर्भवती या धात्री को लगातार दो सप्ताह से अधिक की खांसी आ रही है तो वह टीबी जांच जरूर करावें।

    डीटीओ डॉ यादव ने बताया कि गर्भवती में समय से टीबी की पहचान न होने से बच्चे के समय से पहले जन्म, कम वजन वाले बच्चे के जन्म, अंतर्गर्भाशयी विकास प्रतिबंध और प्रसवकालीन मृत्यु में छह गुना वृद्धि का जोखिम बना रहता है। इसके ठीक विपरीत समय से जांच और इलाज शुरू हो जाने से मां और बच्चे दोनों सुरक्षित हो जाते हैं। टीबी ग्रसित गर्भवती और धात्री महिलाओं के उपचार के लिए राष्ट्रीय क्षय उन्मूलन कार्यक्रम के तहत निश्चित प्रोटोकॉल तय हैं और इनके जरिये मां बच्चे दोनों का ध्यान रखा जाता है। इन मरीजों को यथाशीघ्र नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र में भेजा जाना चाहिए।

    डॉ यादव ने बताया कि ऐसी महिलाओं को मातृ सूक्ष्म पोषक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए आयरन, फोलिक एसिड तथा अन्य विटामिन और खनिज देना जारी रखना चाहिए। ऐसी स्थिति में गर्भावस्था के दौरान जब कैल्शियम का सेवन कम हो, तो प्रसवपूर्व देखभाल के भाग के रूप में कैल्शियम अनुपूरण की सिफारिश भी की जाती है। उपचाराधीन मां को दवा के साथ साथ चिकित्सक के परामर्श के अनुसार संतुलित आहार लेते हुए आराम भी करना चाहिए।

    शीघ्र स्तनपान जरूरी,

    शाहपुर नगरीय स्वास्थ्य केंद्र की प्रभारी चिकित्सा अधिकारी डॉ नीतू मौर्या का कहना है कि टीबी उपचाराधीन गर्भवती को भी प्रसव के तुरंत बाद यथाशीघ्र बच्चे के स्तनपान के लिए प्रेरित किया जाता है। ऐसी मां का दूध बच्चे के लिए पहला टीका होता है। मां को बच्चे के ओरल कांटैक्ट से बचने की सलाह दी जाती है। मास्क लगा कर स्वच्छता व्यवहार अपनाते हुए इन माताओं को भी छह माह तक सिर्फ अपना दूध ही बच्चे को पिलाने के लिए कहा जाता है। उपचाराधीन माता को हाथों की स्वच्छता का भी विशेष ध्यान रखना चाहिए। मां के दूध से बच्चे को टीबी का संक्रमण नहीं होता है, बल्कि यह बच्चे की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ा कर उसे टीबी जैसी बीमारियों से लड़ने की शक्ति प्रदान करता है।

    देते हैं बचाव की दवा,

    डीटीओ डॉ गणेश यादव ने बताया कि नियमित टीकाकरण कार्यक्रम के तहत बच्चे के जन्म के बाद लगने वाला बीसीजी का टीका उन्हें टीबी समेत कई बीमारियों से लड़ने की शक्ति देता है। स्तनपान भी बच्चे को इस बीमारी से बचाव का सामर्थ्य व पोषण प्रदान करता है। टीबी पीड़ित धात्री महिला के बच्चों को बचाव की दवा भी दी जाती है।

    यह लक्षण दिखे तो गर्भवती-धात्री कराएं जांच,

    दो सप्ताह से अधिक की खांसी
    शाम को पसीने के साथ बुखार
    सीने में दर्द
    सांस फूलना
    वजन कम होना
    बलगम में खून आना

  • एम्स गोरखपुर में आयोजित हुई स्किललॉग IV कार्यशाला प्रोफेसर (डॉ.) शिखा सेठ की अध्यक्षता में

    एम्स गोरखपुर में आयोजित हुई स्किललॉग IV कार्यशाला प्रोफेसर (डॉ.) शिखा सेठ की अध्यक्षता में

    गोरखपुर, 23 नवंबर 2024: एम्स गोरखपुर के स्त्री रोग विभाग की अध्यक्ष, डॉ. प्रोफेसर शिखा सेठ की अध्यक्षता में आयोजित स्किललॉग IV कार्यशाला ने सीजेरियन सेक्शन की बढ़ती दर को कम करने और मातृ स्वास्थ्य को बेहतर बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया है। इस कार्यशाला में विभाग के सभी चिकित्सकों ने सक्रिय रूप से भाग लिया और सीजेरियन सेक्शन से जुड़ी विभिन्न चुनौतियों और उनके समाधानों पर गहन चर्चा की। इस कार्यशाला में एम्स गोरखपुर की स्त्री रोग विशेषज्ञों, नर्सिंग अधिकारियों और छात्रों ने सक्रिय रूप से भाग लेकर सीजेरियन सेक्शन से जुड़ी विभिन्न चुनौतियों और उनके समाधानों पर गहन चर्चा की।

    कार्यशाला का उद्देश्य:

    इस कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य सीजेरियन सेक्शन की बढ़ती दर को कम करना और मां और बच्चे दोनों के स्वास्थ्य को सुनिश्चित करना था। विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि सीजेरियन सेक्शन एक जरूरी सर्जरी हो सकती है, लेकिन इसे आखिरी विकल्प के रूप में ही अपनाना चाहिए।

    कार्यशाला में हुए प्रमुख बिंदु:

    सीजेरियन सेक्शन की जटिलताएं और उनका प्रबंधन: विशेषज्ञों ने सीजेरियन सेक्शन के दौरान होने वाली विभिन्न जटिलताओं और उनके निवारण के उपायों पर विस्तार से चर्चा की।
    रॉब्सन वर्गीकरण: इस वर्गीकरण के माध्यम से सीजेरियन सेक्शन के विभिन्न प्रकारों और उनके कारणों को समझाया गया।
    पेट के सर्जिकल घावों की देखभाल: सर्जरी के बाद घावों की उचित देखभाल के महत्व पर जोर दिया गया।

    पैनल चर्चा: पैनल चर्चा में विशेषज्ञों ने जटिल मामलों को संभालने के अपने अनुभव साझा किए और सीजेरियन सेक्शन की दर को कम करने के उपाय सुझाए।

    सीजेरियन सेक्शन दर में कमी: कार्यक्रम में सीजेरियन सेक्शन की बढ़ती दर को कम करने के लिए विभिन्न उपायों पर विचार-विमर्श किया गया।
    विशेषज्ञों की भागीदारी:

    कार्यक्रम में डॉ. शिखा सेठ, डॉ. प्रीतिबाला सिंह, डॉ. आराधना सिंह, डॉ. प्रीति प्रियदर्शिनी और डॉ. प्रियंका सिंह शिशोदिया जैसे जाने-माने विशेषज्ञों ने सक्रिय रूप से भाग लिया।

    एम्स, गोरखपुर का योगदान:

    एम्स, गोरखपुर ने इस कार्यशाला के आयोजन के माध्यम से मातृ और शिशु स्वास्थ्य को बेहतर बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है