Category: धर्म

  • महानिर्वाणी अखाड़े के महंत रवींद्र पुरी ने बताया, कुंभ के बाद कहां चले जाते हैं नागा साधु ?

    महानिर्वाणी अखाड़े के महंत रवींद्र पुरी ने बताया, कुंभ के बाद कहां चले जाते हैं नागा साधु ?

    धर्म की ख़बरें : महानिर्वाणी अखाड़े के महंत रवींद्र पुरी ने बताया, कुंभ के बाद कहां चले जाते हैं नागा साधु ?

    महाकुंभ में आकर्षण का केंद्र होते हैं साधु संन्यासियों के अखाड़े. इनमें भी नागा साधुओं की दुनिया पूरी दुनिया को अपनी ओर खींचती है. आइए जानते हैं इस दुनिया के झरोखे में.

    जगद्गुरु शंकराचार्य ने सनातन की सुरक्षा के लिए ईसवी सदी से करीब सात सौ साल पहले बौद्ध धर्म में आए बदलाव और अन्य मान्यताओं से सनातन को सुरक्षित करने के लिए युवा संन्यासियों की सेना बनाई. नाम दिया गया- ‘अखंड.’

    बस आगे चलकर वही अखाड़ा बना. उत्तम प्रबंधन के लिए अखंड में भी विभाजन हुआ और सेना बढ़ती गई. आज शैव मत के संन्यासियों के सात मुख्य अखाड़े हैं. जूना, आवाहन, अग्नि, महानिर्वाणी, अटल, निरंजनी और आनंद.

    महानिर्वाणी अखाड़ा के श्री महंत रवींद्र पुरी ने बताया कि अखाड़ों के मूल देव तो शिव हैं, लेकिन आराध्य देवता अलग-अलग. धर्म की रक्षा के लिए बनाए गए अखाड़े अब समाज निर्माण में अपना योगदान करते हैं.

    महाकुंभ से पहले सभी अखाड़ों में धर्म ध्वजा स्थापित की जाती है. ध्वजा स्थापना का अर्थ है कि अब अखाड़े के सभी संन्यासियों और श्रद्धालुओं के रहने और भोजन की व्यवस्था के लिए अखाड़ा तैयार है. अखाड़ों की धर्म ध्वजा का रंग तो भगवा होता है लेकिन उन्हें ध्वज दंड पर फहराने के तरीके अलग अलग हैं.

    सदियों बाद भी ये नागा संन्यासी कमांडो की भूमिका में तो आज भी रहते हैं. शास्त्रों के साथ शस्त्रों की शिक्षा भी लेते हैं. लेकिन अब इनकी भूमिका समाज को शिक्षित और अपनी सनातनी परंपरा के प्रति जागरूक करने की भी है.

    शरीर पर भस्म, माथे पर तिलक, कानों में कुंडल… 16 नहीं नागा साधु करते हैं 17 शृंगार,

    प्रयागराज महाकुंभ में आए ‘चश्मे वाले नागा बाबा’,

    ‘नागा देश के दुश्मनों से लड़ने को तैयार, बंदूक चलाना आता’, महाकुंभ में बोले ‘चश्मे वाले बाबा’,

    भाला फेंकते हैं, लाठी भांजते हैं और स्कूल… कैसा होता है बाल नागा साधुओं का जीवन,

    ऐबक, अब्दाली और औरंगजेब… जब नागा साधुओं ने उठाए हथियार और आक्रांताओं से ली टक्कर,

    नागा साधुओं को नहीं दी जाती मुखाग्नि… फिर कैसे होता है अंतिम संस्कार,

    महंत रवींद्र पुरी बताते हैं कि सनातन की इस कमांडो फोर्स को अपने इस लोक और परलोक की भी चिंता नहीं. क्योंकि इन्होंने स्वयं को स्वयं से स्वयं ही मुक्त कर लिया है. सभी चारों कुंभ में पहले अमृत स्नान के बाद और दूसरे से पहले नए नागा संन्यासी दीक्षित किए जाते हैं. उसकी भी पारंपरिक विधि है. नागा संन्यासी बनना आसान नहीं होता.

    अब बड़ा प्रश्न लोगों के जेहन में उठता है कि कुंभ में हजारों की संख्या में दिखते ये नागा संन्यासी कुंभ के बाद कहां गायब हो जाते हैं? इस सवाल का भी उत्तर जान लीजिए.

    निरंजनी अखाड़ा के महंत रवींद्र पुरी ने बताया कि अब इतना जान लीजिए कि साधना और सुअवसरों में नागा संन्यासी नग्न यानी दिगंबर रहते हैं. लेकिन समाज में आते जाते समय लोक मर्यादा से उपवस्त्र यानी कौपीन लंगोट या गमछा धारण करते हैं. ये संन्यासी गांव, खेड़ों, कस्बों शहरों में स्थित मंदिरों मठों आश्रमों का प्रबंधन करते हुए समाज में भी रहते हैं, तो कई गिरी गुफाओं में अपनी साधना से देश-दुनिया कल्याण के लिए ध्यान तपस्या में मग्न रहते हैं।

  • आस्था, मनोरंजन और रोजगार का संगम बना खिचड़ी मेला

    आस्था, मनोरंजन और रोजगार का संगम बना खिचड़ी मेला

    आस्था, मनोरंजन और रोजगार का संगम बना खिचड़ी मेला,

    बाबा गोरखनाथ को खिचड़ी चढ़ाने के साथ जमकर मनोरंजन और खरीदारी कर रहे हैं श्रद्धालु,

    मकर संक्रांति के दिन अभूतपूर्व जनसैलाब से दुकानदारों का व्यवसाय रहा आकाश पर,

    गोरखपुर, 16 जनवरी। नाथपंथ के विश्व प्रसिद्ध गोरखनाथ मंदिर में आयोजित खिचड़ी मेला आस्था, मनोरंजन और रोजगार का संगम बन गया है। यहां बाबा गोरखनाथ का दर्शन कर खिचड़ी चढ़ाने के बाद श्रद्धालु मेले में मनोरंजन कर जरूरी सामानों की खूब खरीदारी कर रहे हैं। मेले में उमड़ रही श्रद्धालुओं की भीड़ इतनी अधिक है कि यहां दुकान लगाने वालों का रोजगार-कारोबार उनकी आर्थिकी में अभूतपूर्व वृद्धि कर रहा है। मकर संक्रांति के दिन मंगलवार को गोरखनाथ मंदिर में 15 लाख से अधिक श्रद्धालुओं का आगमन हुआ। बुधवार और गुरुवार को भी समूचा मेला परिसर श्रद्धालुओं की भीड़ से खचाखच भरा रहा। खिचड़ी मेला महाशिवरात्रि तक जारी रहेगा। गोरक्षपीठाधीश्वर एवं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मार्गदर्शन में यहां श्रद्धालुओं से लेकर कारोबारियों तक के लिए सुरक्षा, सुविधा और सहूलियत के विशेष प्रबंध किए गए हैं।

    गोरखनाथ मंदिर में इस साल मकर संक्रांति के दिन उमड़ा आस्था का जनसैलाब अभूतपूर्व रहा। इस पावन पर्व पर पंद्रह लाख से अधिक श्रद्धालुओं का मंदिर आना हुआ। श्रद्धा का उफान ऐसा था कि भोर से लेकर शाम तक गोरखनाथ मंदिर आने वाले दो प्रमुख मार्गों (धर्मशाला से और बरगदवा से) पर कुल मिलाकर करीब तीन किलोमीटर तक श्रद्धालुओं की कतार नहीं टूटी। यह कतार लंबाई में तो थी ही, चौड़ाई में भी पूरे सड़क को कवर किए हुए थी। मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी मेले के दुकानदारों की आर्थिकी में आकाशीय समृद्धि हुई। अनुमान लगाया जा रहा है कि खिचड़ी मेले के दौरान मकर संक्रांति पर प्रति श्रद्धालु द्वारा प्रसाद, फूलमाला, मनोरंजन, नाश्ता और जरूरी सामानों की खरीदारी पर औसतन 300 रुपये ही खर्च किए गए हों तो गुरु गोरखनाथ के प्रति उमड़ी श्रद्धा ने एक दिन में ही 45 करोड़ रुपये की आर्थिक गतिविधियों को गति दी।

    मेला प्रबंधक शिव शंकर उपाध्याय बताते हैं कि खिचड़ी मेले में आने वाले दुकानदारों का कारोबार प्रतिवर्ष बहुत ही अच्छा होता है और इस बार इसमें और भी अप्रत्याशित वृद्धि होती दिख रही है। मेले में करीब छह सौ दुकानें सजी हैं। दुकान लगाने वाले 90 प्रतिशत कारोबारी प्रदेश के अन्य जिलों या अन्य राज्यों से हैं। यहां राजस्थान, दिल्ली कोलकाता के अलावा प्रदेश के मुरादाबाद, सहारनपुर, इटावा, बुलंदशहर आदि जिलों से बड़ी संख्या में कारोबारियों ने दुकानें लगाई हैं। इस बार आस्था का जन ज्वार देखकर सभी बेहद प्रफुल्लित हैं। मंदिर परिसर में डेढ़-दो माह तक लगने वाला खिचड़ी मेला भी जाति-धर्म के बंटवारे से इतर बड़ी संख्या में लोगों की आजीविका का माध्यम बना हुआ है। मंदिर परिसर में नियमित रोजगार करने वालों से लेकर मेला में दुकान लगाने वालों तक, बड़ी भागीदारी अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों की है।

  • मुंजेश्वरनाथ मंदिर भौवापार में जनकल्याण हेतु सुंदरकांड एवं भण्डारे का आयोजन

    मुंजेश्वरनाथ मंदिर भौवापार में जनकल्याण हेतु सुंदरकांड एवं भण्डारे का आयोजन

    आज दिनांक 15 जनवरी , बुधवार को जनकल्याणकारी समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष नैमिष त्रिपाठी तथा अन्य सम्मानित पदाधिकारियों के द्वारा मुंजेश्वर नाथ शिव मंदिर, भौवापार गोरखपुर में समिति के महासचिव पंचानन पाण्डेय ‘गुड्डू’ के जन्मदिवस के शुभ अवसर पर जनकल्याण हेतु महाकल्याणकारी ‘सुंदर काण्ड’ के पाठ के साथ ही भजन कीर्तन तथा भंडारे का आयोजन किया गया।
    इस कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में उप जिलाधिकारी चौरी-चौरा प्रदीप कुमार सिंह एवं उप जिलाधिकारी बांसगांव केशरी नन्दन तिवारी की गरिमामयी उपस्थिति रहीं। समिति के महासचिव और उद्यमी पंचानन पाण्डेय ‘गुड्डू’ को समिति के सभी पदाधिकारीयों और अतिथियों के द्वारा जन्मदिवस शुभकामनाओं के साथ उनके उज्जवल भविष्य की कामना की गई।
    आयोजन में उपस्थित सभी लोगों ने समाज सेवा के प्रति उनके समर्पण तथा जनकल्याण हेतु उनके प्रयासों की सराहना की।
    इस कार्यक्रम का आयोजन समाज में एकता एवं भाईचारे की भावना को बढ़ाने के उद्देश्य से किया गया।

  • पिता जो अपनी मर्जी से दे वह दान है, दहेज न मांगें: राजनजी

    पिता जो अपनी मर्जी से दे वह दान है, दहेज न मांगें: राजनजी

    पिता जो अपनी मर्जी से दे वह दान है, दहेज न मांगें: राजनजी,

    ब्यूरो प्रभारी —-विनय तिवारी

    बडहगंज/गोरखपुर(निष्पक्ष टुडे) बड़हलगंज स्थानीय नेशनल इण्टर कालेज के खेल मैदान पर श्री हनुमान सेवा समिति चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा आयोजित श्रीराम कथा यज्ञ के छठवें दिन कथावाचक परम् पूज्य स्वामी राजन जी महाराज ने भगवान राम का सीता जी व लखन जी के साथ वन गमन , केवट राज की भक्ति और भगवान के प्रयागराज तक पहुंचने तक के प्रसंग को सुनाया । आज पूज्यवर ने केवट की भक्ति की खूबसूरती को प्रमुखता से सुनाकर उपस्थित भक्तों को भावविभोर कर सियाराममय कर दिया। ___राम कथा के छठवें दिन हजारों की तादात में जुटे श्रद्धालुओं पर राम रस की बौछार करते हुए पूज्य राजन जी ने मंगलवार को कहा कि शादी के बाद बारात जनवासे में रुकती है। शुभ मुहूर्त से पन्द्रह दिन पहुंची बारात विवाह के बाद भी बहुत दिनों तक रुकी रही। ऐसा लगता था कि विदेह जनक के प्रेम ने उन्हें बांध लिया ही। इसी तरह दिन बीतने के बाद आखिरकार बिदाई होती है।बेटी सीता की बिदाई के समय गले लगती हैं।विदेह जनक भी रो पड़ते हैं। हजारों हाथी,घोड़े, स्वर्ण पात्रों में भरी मणियां, अगणित गऊएं यानी कह सकते हैं कि कुबेर से भी अधिक धन सम्पदा देकर बेटी को विदा किया। महाराज दशरथ ने भी अपनी ओर से लोगों में काफी उपहार बांटे।यहां राजनजी ने लोगों से कहा कि दहेज को दान समझा जाय। बेटी का पिता जो अपनी मर्जी से दे वह स्वीकार करें। मांगें न। मांगना दहेज है। मांगना गलत है।बारात को कुछ दूर तक बिदा करने स्वयं राजा जनक जी आते हैं और राजा दशरथ से सत्कार में अगर कोई चूक हुई हो तो उसके लिये माफी मांगते हैं और कहते हैं, महाराज आपने हमारी चारो पुत्रियों को अपनी बहू के रूप में स्वीकार करके हमारा बड़ा ही सम्मान बढ़ाया है।वहीं दशरथ जी कहते हैं कि महाराज जनक जी आभारी तो मैं आपका हूं कि मैं एक बहू लेने आया था आपकी कृपा से चार चार ले जा रहा हूं।चारो बहुओं के साथ बारात उल्लास के साथ अयोध्या वापस आ जाती है।ऋषि विश्वामित्र बिदा लेकर जब चलने लगते हैं तो महाराज दशरथ उनके चरणों मे गिरकर कहते हैं “नाथ सकल संपदा तुम्हारी” जो राजा दशरथ कभी विश्वामित्र जी को राम चन्द्र जी को देने से मना कर दिये थे वो आज कह रहे नाथ,यह धन- दौलत, पुत्र,पत्नी, सकल परिवार जो भी है वह आपका है।कृपा करके बच्चों पर दया करने के लिये दर्शन देते रहिएगा। जब से श्री रामचन्द्रजी विवाह करके घर आए, तब से अयोध्या में नित्य नए मंगल हो रहे हैं और आनंद की बधाइयां बज रही हैं।
    इधर एक दिन दशरथ जी दर्पण में अपने आप को देखा है। फिर मुकुट को सीधा किया है।
    श्रवन समीप भए सित केसा। मनहुँ जरठपनु अस उपदेसा॥ महाराज को अपने कानों के पास सफ़ेद बाल दिखाई दिया है। अब महाराज समझ गए की वैराग्य का समय हो गया है।क्यों ना अब रामजी को राजा बनाकर अपने जीवन और जन्म का लाभ लूं। अपने मन की बात गुरु वशिष्ठ जी को बताई।गुरुदेव कहते हैं कि तुम्हारी सोच बड़ी उत्तम है। दशरथ जी कहते हैं तो ठीक है आप मुहूर्त निकलवाएं।गुरुदेव कहते हैं मुहर्त निकलवाने की कोई जरुरत नहीं है। जिस समय रामजी राजसिंहासन पर बैठ जायेंगे उससे अनुकूल कोई मुहूर्त हो ही नहीं सकता।”सुदिन सुमंगलु तबहिं जब रामु होहिं जुबराजु।” रामचन्द्रजी के राज्याभिषेक की सुहावनी खबर सुनते ही अवध में धूम मच गई।गुरुदेव सीता-राम के पास गए। राम और सीता ने गुरुदेव के चरणों में शीश नवाया है फिर बोले,गुरुदेव , आपने हमें ही बुला लिया होता पर आप ने स्वयं यहाँ पधारकर जो स्नेह किया, इससे आज यह घर पवित्र हो गया! हे गोसाईं! (अब) जो आज्ञा हो, मैं वही करूँ।श्रीराम के युवराज पद देने की घोषणा से मंथरा के कहने पर महारानी कैकेई नाराज होकर कोप भवन में चली गयी।राजा ने यह बात सुनी तो तुरंत कोप भवन गये और कैकेई अपने दो वचन देने के लिये सौगंध ले ली।अब राजा दशरथ ने राम की सौगंध खा ली और बोल दिया कि जो मांगना है मांग लो। कैकेई ने मांगा कि मेरे पुत्र भरत का राजतिलक हो। साथ ही,”तापस बेष बिसेषि उदासी। चौदह बरिस रामु बनबासी।” तपस्वियों के वेष में राम को 14 वर्ष का वनवास दिया जाय। राजा दशरथ ने बहुत समझाया लेकिन रानी नहीं मानी।विलाप करते-करते ही राजा को सबेरा हो गया।रघुवंशमणि श्रीरामचन्द्रजी ने जाकर देखा कि राजा अत्यन्त ही बुरी हालत में पड़े हैं।रामजी ने आज अपने जीवन में पहली बार यह दुःख देखा, इससे पहले कभी उन्होंने दुःख सुना भी न था। फिर हृदय में धीरज धरकर उन्होंने मीठे वचनों से माता कैकेयी से पूछा-हे माता! मुझे पिताजी के दुःख का कारण कहो। उन्होंने बताया और कहा कि ये महाराज की आज्ञा और आदेश है।जब रामजी ने सुना तो उनकी मुस्कान वैसी ही बनी हुई हैं। मन मुसुकाइ भानुकुल भानू। रामु सहज आनंद निधानू॥ श्रीरामचन्द्र ने पिता और कैकेयी को प्रणाम करके उनकी प्रदक्षिणा की और कौशल्या के चरणों में मस्तक झुकाकर उन्हें सान्त्वना दी। फिर लक्ष्मण और पत्नी सीता को साथ ले सुमंत के साथ रथ पर बैठकर वे नगर से बाहर निकले। रात में तमसा नदी के तट पर निवास किया। उनके साथ बहुत-से पुरवासी भी गये थे। उन सबको सोते छोड़कर वे आगे बढ़ गए।वे रथ पर बैठे-बैठे श्रृंगवेरपुर जा पहुँचे। वहाँ निषादराज गुह ने उनका पूजन, स्वागत-सत्कार किया। श्रीरघुनाथ ने इंगुदी-वृक्ष की जड़ के निकट विश्राम किया। लक्ष्मण और गुह दोनों रात भर जागकर पहरा देते रहे।
    प्रात:काल श्रीराम ने रथ सहित सुमंत को विदा कर दिया तथा स्वयं लक्ष्मण और सीता के साथ नाव से गंगा जी के तट पर जाकर केवट राज को पार जाने के लिये अपनी नाव लाने को कहते हैं तब केवट राज कहता है,”मांगी नाव न केवटु आना। कहइ तुम्हार मरमु मैं जाना॥
    चरन कमल रज कहुं सबु कहई। मानुष करनि मूरि कछु अहई॥ छुवत शिला भई नारि सुहाई, पाहन ते न काठ कठिनाई।।”
    केवट कहने लगा- मैंने तुम्हारा मर्म जान लिया। तुम्हारे चरण की धूल से पत्थर नारी बन जाता है। मैं इसी नाव से अपना परिवार पालते हैं।वह कहता है कि पहले आप अपना पांव धुलवाइए।मैं परख लूंगा फिर नाव पर चढ़ाऊंगा।”सुनि केवट के बैन प्रेम लपेटे अटपटे,बिहसे करुनाऐन चितइ जानकी लखन तन।:
    प्रभु राम ने माता जानकी और लखन लाल की तरफ देख कर बोले अब तो फंस ही गया हूँ , चरण धुलवाने ही पड़ेंगे।भगवान ने कहा जो तुम्हारी इच्छा हो वह करो। केवट उनका चरण पखार सपरिवार चरणामृत का पान कर सभी को उस पार उतारा।पार उतरने के बाद भगवान श्रीराम उतराई देने लगते है तो केवट मना करते हुए कहता है कि प्रभु एक नाविक दूसरे से उतराई नहीं लेता है। आज मैंने आपको उतारा है कल आप मुझको भवसागर से पार उतार दीजिएगा।गंगा-पार कर भगवान प्रयागराज पहुंचे है । वहाँ उन्होंने महर्षि भारद्वाज को प्रणाम किया और उनकी आज्ञा ले वहाँ से चित्रकूट पर्वत को प्रस्थान किया।चित्रकूट पहुँच कर उन्होंने पर्णकुटी बना वास्तु पूजा कर मन्दाकिनी के तट पर निवास किया। रघुनाथ जी ने सीता को चित्रकूट पर्वत का रमणीय दृश्य दिखलाया।इसके पूर्व कथा के मुख्य यजमान डा एस.एन चौबे व शांति चौबे,सन्तोष कटियार व सीमा कटियार,युगल किशोर पाण्डेय व मंशा पाण्डेय,राजेश सिंह,पूनम सिंह,पूनम शाही ने व्यास पीठ का पूजन व आरती कर कथा प्रारम्भ कराई।इस अवसर पर अध्यक्ष सुबेदार राय, उपाध्यक्ष कुलदीप राय, अनिल कुमार पाण्डेय, संरक्षक डाक्टर ए ने चौबे, वरिष्ठ सदस्य कैलाश नाथ मिश्रा, राम हर्ष गुप्ता, कमलेश सिंह, राजीव राय, अजय प्रसाद राय, योगेश राय ,मुकेश राय, तारा राय, सरोज, सुष्मिता, कविता,अनिल पाण्डेय व प्रेम सागर तिवारी सहित भारी संख्या में श्रद्धालु श्रोता मौजूद रहे।

  • मकर संक्रांति पर श्रद्धालुओं ने मंदिरों में चढ़ाई खिचड़ी

    मकर संक्रांति पर श्रद्धालुओं ने मंदिरों में चढ़ाई खिचड़ी

    मकर संक्रांति पर श्रद्धालुओं ने मंदिरों में चढ़ाई खिचड़ी,

    सरयू में डुबकी लगा कर किया दान पुण्य,

    ब्यूरो प्रभारी —-विनय तिवारी

    बड़हलगंज/ गोरखपुर (निष्पक्ष टुडे) बड़हलगंज मकर संक्रांति पर्व पर मंगलवार को श्रद्धालुओं ने सरयू नदी में डुबकी लगाई और ब्राह्मणों तथा गरीबों में दान पुण्य कर मंदिरों में खिचड़ी चढ़ाई। पर्व को लेकर पूरे दिन क्षेत्र में उत्साह का माहौल था। पर्व पर बच्चों ने पतंगें उड़ाई। लोगों ने लाई, तिल, खिचड़ी, दही खाकर पर्व की महत्ता को बरकरार रखा।
    मकर संक्रांति पर्व से पूर्व ही घरों में लाई तिल का धुंधा तैयार होना शुरू हो गया था। जिसके चलते बाजार में गुड़, लाई व तिल के साथ सब्जियों की खरीददारी के लिए चहल पहल बढ़ गई थी। त्योहार पर लोग अपनी बहन बेटियों के यहां खिचड़ी पहुंचाने के रस्म को भी बरकरार रखे। मंगलवार को प्रातः काल से ही उपनगर के सरयू तट स्थित लेटाघाट, मुक्तिपथ स्थित रामकवल शाही स्नान घाट, कलूट शाह शिवाला, नई एवं पुरानी हनुमानगढ़ी घाट, तरकुलही घाट, पोहिला, रजौली, दलुआ, पिड़हनी, डेरवा व पटनाघाट पर नदी में स्नान के लिए लोगों की भारी भीड़ देखी गई। इसके बाद लोगों ने ब्राह्मणों तथा गरीबों में चावल, दाल, तिल, लाई आदि छू कर दान किया और मंदिरों में देवी देवताओं के दर्शन पूजा पाठ किया। उपनगर के बाबा जलेश्वरनाथ मंदिर व खड़ेसरी स्थित साईंनाथ मंदिर में लोगों ने खिचड़ी भी चढ़ाई। तमाम श्रद्धालु बाबा गोरखनाथ मंदिर में खिचड़ी चढ़ाने के लिए गोरखपुर के लिए रवाना हुए। पर्व पर बच्चों ने खूब पतंगें उड़ा कर त्योहार का लुत्फ उठाया। आज के दिन लोगों ने दही के साथ खिचड़ी, तिल, लाई व गंजी का सेवन किया।

  • खिचड़ी मेले में श्रद्धालुओं पर हेलीकॉप्टर से हुई पुष्पवर्षा

    खिचड़ी मेले में श्रद्धालुओं पर हेलीकॉप्टर से हुई पुष्पवर्षा

    खिचड़ी मेले में श्रद्धालुओं पर हेलीकॉप्टर से हुई पुष्पवर्षा,

    योगी सरकार की तरफ से हुए इस अभिवादन पर अभिभूत हुए श्रद्धालु,

    श्रद्धालुओं ने खूब लगाए शिवावतार गुरु गोरक्षनाथ के जयकारे,

    गोरखपुर, 14 जनवरी। मकर संक्रांति के पावन पर्व पर गोरखनाथ मंदिर में आयोजित विश्व प्रसिद्ध खिचड़ी मेले में आए लाखों श्रद्धालु योगी सरकार की तरफ से किए गए अभिवादन से अभिभूत हो गए। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर खिचड़ी मेले में आए श्रद्धालुओं पर हेलीकॉप्टर से पुष्पवर्षा की गई। इस अभूतपूर्व स्वागत से हर्षित श्रद्धालुओं ने शिवावतार गुरु गोरक्षनाथ के खूब जयकारे लगाए और मुख्यमंत्री के प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित की।

    गोरखनाथ मंदिर का खिचड़ी मेला श्रद्धालुओं की संख्या के मामले में अभूतपूर्व रहा तो उनका स्वागत भी दिल जीतने वाला रहा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के दिशानिर्देश पर मेले में आए श्रद्धालुओं पर हेलीकॉप्टर से पुष्पवर्षा की गई। आसमान से अपने ऊपर स्वागत के फूल गिरते देख श्रद्धालु भाव विभोर हो गए। पुष्पवर्षा के साथ पहले से गुंजित गुरु गोरक्षनाथ के जयकारे की गति तेज और ध्वनि गगनभेदी हो गई। श्रद्धालुओं ने कहा कि मुख्यमंत्री की यह पहल हृदय को स्पंदित करने वाली है।

  • सीएम योगी ने महायोगी गोरखनाथ को चढ़ाई आस्था की पवित्र खिचड़ी

    सीएम योगी ने महायोगी गोरखनाथ को चढ़ाई आस्था की पवित्र खिचड़ी

    सीएम योगी ने महायोगी गोरखनाथ को चढ़ाई आस्था की पवित्र खिचड़ी,

    मकर संक्रांति पर श्रीनाथ जी का विधिविधान से पूजन कर गोरक्षपीठाधीश्वर ने की प्रदेशवासियों के सुखमय जीवन की कामना,

    गोरखनाथ मंदिर में बाबा को खिचड़ी चढ़ाने उमड़ा आस्था का अभूतपूर्व सैलाब,

    गोरखपुर, 14 जनवरी। मकर संक्रांति के पावन पर्व पर गोरक्षपीठाधीश्वर एवं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मंगलवार भोर में चार बजे शिवावतार महायोगी गुरु गोरखनाथ को नाथपंथ की विशिष्ट परंपरा के अनुसार आस्था की पवित्र खिचड़ी चढ़ाई और लोकमंगल की कामना की। फिर नाथ योगियों, साधु संतों ने खिचड़ी चढ़ाकर पूजा अर्चना की। इसके साथ मंदिर के गर्भगृह के कपाट को आमजन के लिए खोल दिया गया। महाकुंभ के योग में खिचड़ी चढ़ाने के लिए मंदिर में आस्था का अभूतपूर्व सैलाब नजर आया। कड़ाके की ठंड के बावजूद गोरखनाथ मंदिर में लाखों की संख्या में श्रद्धालु महायोगी गोरखनाथ को खिचड़ी चढ़ाने के लिए उमड़े। हर श्रद्धालु का कहना था कि गोरखपुर में आस्था का ऐसा ज्वार पहले कभी नहीं देखा था। खिचड़ी चढ़ाने के बाद श्रद्धालुओं ने मंदिर परिसर में लगे विशाल मेले का भ्रमण कर आनंद उठाया। मनोरंजन के साथ जरूरी वस्तुओं की खरीदारी की।

    मकर संक्रांति पर मंगलवार भोर में गोरक्षपीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ ने नाथपंथ की परंपरा के अनुसार गोरखनाथ मंदिर के गर्भगृह में जमीन पर बैठ कर, गुरु गोरखनाथ को प्रणाम कर आदेश लिया। फिर विधिविधान से पूजन कर गोरक्षपीठ की ओर से श्रीनाथ जी को खिचड़ी चढ़ाई। इसके बाद उन्होंने योगिराज बाबा गंभीरनाथ, महंत दिग्विजयनाथ, महंत अवेद्यनाथ और अन्य नाथ योगियों की प्रतिमाओं समक्ष शीश नवाकर खिचड़ी भोग अर्पित किया। मकर संक्रांति के पावन पर्व पर शिवावतार गुरु गोरखनाथ को लोक आस्था की खिचड़ी चढ़ाने लाखों श्रद्धालु कड़ाके की ठंड के बीच गोरखनाथ मंदिर में उमड़े पड़े। सुख समृद्धि एवं आरोग्य की मंगलकामना को लेकर उत्तर प्रदेश, बिहार समेत अन्य राज्यों और पड़ोसी देश नेपाल से आए श्रद्धालुओं ने सीएम योगी द्वारा बाबा गोरखनाथ को खिचड़ी भोग अर्पित करने के बाद कतारबद्ध होकर श्रद्धा की खिचड़ी निवेदित की।

    महायोगी गोरखनाथ को खिचड़ी चढ़ाने का सिलसिला लगातार चलता रहा। पूरे दिन भक्तों की कतार नहीं टूटी। दोपहर बाद दो बजे तक मंदिर और मेला परिसर में तिल रखने की जगह नहीं थी तो मंदिर आने वाले सभी रास्तों पर अगणित लोग पंक्तिबद्ध होकर अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। खिचड़ी चढ़ाने के बाद श्रद्धालुओं ने मंदिर परिसर में स्थित सभी देवी देवताओं के विग्रहों का पूजन कर ब्रह्मलीन महंत बाबा गंभीरनाथ, ब्रह्मलीन महंत दिग्विजनाथ एवं ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ की समाधि पर माथा टेक आशीर्वाद भी लिया। पूरा दिन मंदिर परिसर गुरु गोरखनाथ की जय जयकार से गूंजता रहा। इस दौरान श्रद्धालुओं की सुरक्षा, सुविधा व सहूलियत को लेकर मंदिर व जिला प्रशासन की ओर से मुकम्मल इंतजाम किए गए। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ खुद सभी व्यवस्थाओं पर नजर बनाए हुए थे।

    गोरखनाथ मंदिर का खिचड़ी मेला लोक श्रद्धा भाव के साथ सामाजिक समरसता का भी मेला है। अमीर-गरीब सभी नंगे पाव कतारबद्ध होकर बारी बारी भगवान गोरखनाथ को आस्था की पवित्र खिचड़ी चढ़ा रहे थे। कोई मुठ्ठी भर श्रद्धा का चावल लेकर आ रहा था तो कोई झोली भर। पर, महायोगी के प्रति भाव सभी का एकसमान था। न जाति का बंधन था न ही धर्म का। सोमवार से ही श्रद्धालु बाबा गोरखनाथ को खिचड़ी चढ़ाने पहुंच गए थे। मंगलवार को यह संख्या लाखों में हो गई। सुबह चार बजे ही श्रद्धालुओं की लम्बी कतार मंदिर परिसर से बाहर सड़क तक लग गई थी। अलग अलग गेट और बैडिकेडिंग से श्रद्धालुओं की भीड़ को संभाला जा रहा था।

    मकर संक्रांति के पावन पर्व पर मंगलवार को गोरखनाथ मंदिर परिसर में श्रद्धा के साथ सभी श्रद्धालुओं को खिचड़ी का प्रसाद वितरित करने के लिए सहभोज का आयोजन किया गया। अमीर-गरीब, जाति, वर्ग का भेदभाव भुलाकर सबने खिचड़ी का प्रसाद ग्रहण किया। मंदिर परिसर में आमंत्रित अतिथियों के लिए भी सहभोज का आयोजन किया गया। इसमें बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधियों, प्रशासन एवं पुलिस के अधिकारियों, उद्यमियों, विभिन्न संगठनों के पदाधिकारियों एवं गणमान्य लोगों की सहभागिता रही।

    खिचड़ी चढ़ाने आए बच्चों को सीएम योगी ने दिया आशीर्वाद,

    मकर संक्रांति पर बाबा गोरखनाथ को खिचड़ी चढ़ाने के लिए अपने परिजनों के साथ आए बच्चों को सीएम योगी का आत्मीय सानिध्य मिला। सीएम ने उन्हें मकर संक्रांति की शुभकामनाएं और खूब आशीर्वाद दिया। बच्चों से संवाद करने के साथ ही उन्होंने चॉकलेट भी गिफ्ट किया।

  • गोरक्षपीठाधीश्वर आज अर्पित करेंगे गुरु गोरखनाथ को खिचड़ी का भोग

    गोरक्षपीठाधीश्वर आज अर्पित करेंगे गुरु गोरखनाथ को खिचड़ी का भोग

    गोरक्षपीठाधीश्वर आज अर्पित करेंगे गुरु गोरखनाथ को खिचड़ी का भोग
    लाखों की संख्या में जुटेंगे श्रद्धालु, खिचड़ी चढ़ाने के लिए सोमवार से श्रद्धालुओं ने डाला डेरा
    खिचड़ी मेले की हर व्यवस्था पर खुद नजर बनाए हुए हैं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ

    गोरखपुर, 13 जनवरी। मकर संक्रांति के पावन पर्व पर गोरक्षपीठाधीश्वर एवं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ नाथपंथ की विशिष्ट परंपरा के अनुसार मंगलवार को ब्रह्म मुहूर्त में शिवावतार गुरु गोरखनाथ को लोक आस्था की खिचड़ी चढ़ाकर समूचे जनमानस की सुख-समृद्धि की मंगलकामना करेंगे। हालांकि बाबा गोरखनाथ को खिचड़ी चढ़ाने के लिए श्रद्धालुओं के आने का सिलसिला सोमवार से ही शुरू हो गया। मंगलवार को यहां आस्था का जन ज्वार नजर आएगा,

    पूरी प्रकृति को ऊर्जस्वित करने वाले सूर्यदेव के उत्तरायण होने पर खिचड़ी चढ़ाने की यह अनूठी परंपरा पूरी तरह लोक को समर्पित है। मान्यता है कि बाबा गोरखनाथ को खिचड़ी चढ़ाकर मन्नत मांगने वाला कभी निराश नहीं होता। अरुणोदय काल में मकर संक्रान्ति का महापर्व मंगलवार को मनाया जायेगा। इस दिन उत्तर प्रदेश, बिहार तथा देश के विभिन्न भागों के साथ-साथ पड़ोसी राष्ट्र नेपाल से भी लाखों की संख्या में श्रद्धालु बाबा गोरखनाथ को खिचड़ी चढ़ाएंगे। आनुष्ठानिक कार्यक्रमों का शंखनाद भोर में ही हो जाएगा। सबसे पहले गोरक्षपीठ की तरफ से पीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ खिचड़ी चढ़ाकर बाबा को भोग अर्पित करेंगे। इसके बाद नेपाल राजपरिवार की ओर से आई खिचड़ी बाबा को चढ़ेगी। इसके बाद मंदिर के कपाट खोल दिए जाएंगे और जनसामान्य की आस्था खिचड़ी के रूप में निवेदित होनी शुरू हो जाएगी,

    मंदिर व प्रशासन की ओर से खिचड़ी महापर्व को लेकर श्रद्धालुओं की सुरक्षा व सुविधा का पूर्ण इंतजाम किया गया है। गोरक्षपीठाधीश्वर एवं मुख्यमंत्रखुद सभी व्यवस्थाओं पर नजर बनाए हुए हैं। मकर संक्रांति पर्व को लेकर मंदिर व मेला परिसर सज धजकर पूरी तरह तैयार है। समूचा मंदिर क्षेत्र सतरंगी रोशनी में नहाया हुआ है। यहां श्रद्धालुओं के आने का सिलसिला सोमवार से ही प्रारम्भ हो गया है। मंदिर प्रबंधन की तरफ से उनके ठहरने और अन्य सुविधाओं का पूरा इंतज़ाम किया गया है। प्रशासन की तरफ से रैन बसेरों में भी पूरी व्यवस्था की गई है।

  • महाकुंभ 2025 और मकर संक्रांति का वैज्ञानिक आधार

    महाकुंभ 2025 और मकर संक्रांति का वैज्ञानिक आधार

    वीर बहादुर सिंह नक्षत्र शाला ( तारामण्डल) गोरखपुर, उत्तर प्रदेश के
    खगोल विद अमर पाल सिंह के द्वारा एक संक्षिप्त खगोलीय विश्लेषण
    यह बात आज से लगभग हजारों वर्षों पहले की है, जब से मानव सभ्यता का प्रादुर्भाब हुआ है तब से आज तक मानव सभ्यताओं ने जाने या अनजाने में ही सही लेकिन आकाश को अपने अपने नजरियों से निहारा तो है ,चाहें हम बात करें उन प्राचीन कालीन मानव सभ्यताओं की जिन्होने रात्रि के आकाश में टिमटिमाते आकाश दीपों को देख कर और उनसे निर्मित कुछ विशिष्ट आकार प्रकार की आकृतियों को अपने अपने हिसाब से समय, देश काल और परिस्थितियों में अनेकों कहानियों को भी गढ़ा ,जिस से आगे आने वाली पीढ़ियों को भी निरन्तर इस गूढ़ ज्ञान की धारा का विशेष लाभ ,खगोलीय ज्ञान और भान के रूप में होता रहे और जिस ज्ञान की अविरल धारा को आगे चलकर खगोल विज्ञान कहा गया ,इस प्रकार हम पाते हैं कि तमाम भारतीय प्राचीन कालीन पर्व और त्यौहारों में भी विज्ञान सम्मिलित है जिनमें कुछ प्राचीन तो कुछ आधुनिक वैज्ञानिक आधार भी प्राप्त होते हैं, आज हम एक प्राचीन कालीन पहलू पर बात करेंगे, जैसा कि हम जानते हैं कि परिवर्तन ब्रह्मांडीय नियम है जो होता है ,होता था ,और होता रहेगा, और होना अपरिहार्य है, उसी कड़ी में मानव सभ्यताओं ने भी समय के साथ अपने आप को भी ढाला है और इस बदलाव रूपी ऊबड़ खाबड़ ढलान से गुजरते हुए प्राचीन कालीन सभ्यताओं से भी समय के साथ में, आगे चल कर केबल कुछेक रीति रिवाजें , संस्कृति ,परंपराएं और रूढ़ी वादियां छूट गईं और कुछ समय विशेष के साथ रूढ़ हो गईं और कुछ समय के साथ परिभाषित होकर परिवर्तित हो गईं और कुछ ख़ास ने मानवीय परंपराओं का रूप ले लिया उनमें से एक विशेष है मकर संक्रांति और महाकुम्भ महोत्सव का संयोजन, खगोल विद अमर पाल सिंह आपको बताने जा रहे हैं इन दोनों से सम्बन्धित कुछ ख़ास बातें , जोकि जनहित में अति महत्वपूर्ण हैं,
    महाकुंभ और मकर संक्रांति दोनों का गहरा वैज्ञानिक और खगोलीय महत्व भी है, जो आकाशीय पिंडों की गतिविधियों और पृथ्वी पर उनके प्रभाव में निहित है। इन घटनाओं के पीछे का वैज्ञानिक आधार कुछ इस प्रकार है: खगोल विद अमर पाल सिंह के अनुसार:

    मकर संक्रांति: वैज्ञानिक व्याख्या, यह एक खगोलीय घटना है , खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि मकर संक्रांति के पीछे का विज्ञान_ पृथ्वी का अपने अक्ष पर घूर्णन के कारण हम दिन ब रात का अनुभव करते हैं, लेकिन ये दिन ब रात सम्पूर्ण पृथ्वी पर सब जगह एक जैसा नहीं होता है , जितनी सूर्य की किरणें प्रथ्वी के जिस भाग पर पड़ रही होती हैं उसी हिसाब से दिन तय होता है, जैसे प्रथ्वी को दो गोलार्धों में बांटा गया है एक उत्तरी गोलार्ध ब दूसरा दक्षिणी गोलार्ध जिनमें जिस पर पड़ने बाली सूर्य की किरणें प्रथ्वी पर दिन तय करती हैं, और इसका अपने अक्ष पर 23.5 अंश झुके होने के कारण दोनो गोलार्धों में मौसम भी अलग अलग होता है, अगर हम बात करें उत्तरायण ब दक्षिणायन की तो हम पाते हैं कि यह एक खगोलीय घटना है, 14/15 जनवरी के बाद सूर्य उत्तर दिशा की ओर अग्रसर या जाता हुआ होता है,जिसमें सूर्य दक्षिणी गोलार्ध से उत्तरी गोलार्ध में प्रवेश ( दक्षिण से उत्तर की ओर गमन प्रतीत ) करता है, इसे उत्तरायण या सूर्य उत्तर की ओर के नाम से भी जाना जाता है, वैज्ञानिकता के आधार पर इस घटना के पीछे का मुख्य कारण है पृथ्वी का छः महीनों के समय अवधि के उपरांत उत्तर से दक्षिण की ओर बलन करना,जो कि एक प्राकृतिक प्रक्रिया है ,जो लोग उत्तरी गोलार्ध में रहते हैं उनके लिए सूर्य की इस राशि परिबर्तन के कारण 14/15 जनवरी का दिन मकर संक्रांति के तौर पर मनाते हैं,और उत्तरी गोलार्ध में निवास करने वाले व्यक्तियों द्वारा ही समय के साथ धीरे धीरे मकर मण्डल के आधार पर ही मकर संक्रांति की संज्ञा अस्तित्व में आई है, मकर संक्रांति का अर्थ है सूर्य का क्रांतिवृत्त के दक्षिणायनांत या उत्तरायनारंभ बिंदु पर पहुंचना, प्राचीन काल से सूर्य मकर मण्डल में प्रवेश करके जब क्रांतिवृत्त के सबसे दक्षिणी छोर से इस दक्षिणायनांत या उत्तरायनारंभ बिंदु पर पहुंचता था, तब वह दिन ( 21 या 22 दिसंबर) सबसे छोटा होता था, अमर पाल सिंह ने बताया कि मगर अब सूर्य जनवरी के मध्य में मकर मण्डल में प्रवेश करता है, वजह यह है कि अयन चलन के कारण दक्षिणायनांत (या उत्तरायनारंभ) बिंदु अब पश्चिम की ओर के धनु मण्डल में सरक गया है, अब बास्तबिक मकर संक्रांति (दक्षिणायनांत या उत्तरायनारंभ बिंदु) का आकाश के मकर मण्डल से कोई लेना देना नहीं रह गया है, मकर संक्रांति सूर्य के मकर राशि में संक्रमण का प्रतीक होता है जो सूर्य की उत्तर की ओर यात्रा (उत्तरायण) का संकेत देता है,
    यह परिवर्तन शीतकालीन संक्रांति के बाद होता है जब उत्तरी गोलार्ध में दिन लंबे होने लगते हैं, जो गर्मी और नवीनीकरण की शुरुआत का भी प्रतीक है,
    सौर विकिरण में परिवर्तन
    सूर्य के कर्क रेखा की ओर बढ़ने से उत्तरी गोलार्ध में सौर ऊर्जा बढ़ती है, जो जलवायु और कृषि चक्र को तो प्रभावित करती ही है और साथ साथ यह संक्रमण जैविक लय को प्रभावित करता है, जोकि इस समय ख़ासकर उत्तरी गोलार्ध में निवास करने वाले लोगों में कायाकल्प और जीवन शक्ति को प्रोत्साहित करता है,
    जैसे कि विटामिन डी का अवशोषण आदि
    इस अवधि के दौरान, लोग पारंपरिक रूप से धूप सेंकते हैं या धूप में अधिक समय बिताते हैं, जिससे शरीर को अधिक विटामिन डी का उत्पादन करने में मदद मिलती है, जो हड्डियों के स्वास्थ्य और प्रतिरक्षा के लिए एक हद तक आवश्यक होता है।
    इसके साथ ही अगर हम बात करें संस्कारों में निहित वैज्ञानिक आधारों की तो हम पाते हैं कि कुछ संस्कारों का वैज्ञानिक आधार भी प्राप्त होता है, खगोल विद अमर पाल सिंह ने बताया कि जैसे कि
    तिल और गुड़ का सेवन केवल सांस्कृतिक ही नहीं है ,बल्कि ये खाद्य पदार्थ पोषक तत्वों से भी भरपूर होते हैं जो ठंड के महीनों के दौरान शरीर को गर्म और ऊर्जावान बनाए रखने में मदद करते हैं,

    अब हम बात करते हैं महाकुम्भ और इसमें निहित वैज्ञानिक आधारों की तो हम पाते हैं कि
    खगोल विद अमर पाल सिंह ने बताया कि
    महाकुंभ और इसकी वैज्ञानिक व्याख्या में हम पाते हैं कि यह अति प्राचीन एवं बृहद त्यौहार भी खगोलीय संरेखण पर आधारित हैं,
    जैसा हम जानते हैं कि आज की अंतर्राष्ट्रीय खगोल वैज्ञानिक संघ की ग्रहीय परिभाषा के अनुसार आज हमारे सौर मंडल में आठ ग्रह हैं , जिनका सूर्य से दूरी के क्रम में नाम निम्नानुसार है बुद्ध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, बृहस्पति, शनि, अरुण और बरुण हैं,उनमें से सबसे बड़ा ग्रह है बृहस्पति, जिसे गुरु भी कहा जाता है,प्राचीन कालीन सभ्यताओं ने भी पांच ग्रहों को अपनी साधारण आंखों से ही पहचान लिया था, जिनमें से बृहस्पति भी एक था, आज के समय में भी अगर आप भी थोड़ा अधिक प्रयास करेंगे तो अलग अलग रात्रि के दौरान दिखाई देने वाले इन पांचों ग्रहों को विभिन्न समय पर आप भी पहचान सकते हैं , बृहस्पति जोकि शुक्र ग्रह के बाद सबसे ज्यादा चमकीला पिण्ड है, यह मुख्य रूप से लगभग 75 प्रतिशत हाइड्रोजन और 24 प्रतिशत हीलियम ब अन्य से बना हुआ है, दूरबीन से देखने पर इस पर बाहरी वातावरण में दृश्य पट्टियां भी दिखाई देती हैं और एक लाल धब्बा भी है जिसे ग्रेट रेड स्पॉट कहा जाता है , जिसे गैलीलियो ने 17वीं सदी में अपनी दूरबीन से देखा था, और सर्व प्रथम 1610 में गैलीलियो गैलिली ने इसके चार बड़े चंद्रमाओं को भी खोजा था, जिनके नाम हैं, गैनिमेड, यूरोपा, आयो, कैलिस्टो, खगोलीय अनुसंधान से प्राप्त जानकारी से यूरोपा पर निकट या दूर भविष्य में ही सही लेकिन इस पर जीवन की प्रबल संभावना है क्योंकि इस पर पानी का भण्डार जो मौजूद है, अगर हम बृहस्पति ग्रह की तुलना अपनी पृथ्वी से करें तो हम पाते हैं कि इसमें लगभग 1331 पृथ्वियां समा सकती हैं, और इसका चुंबकीय क्षेत्र पृथ्वी की तुलना में 14 गुना ज्यादा शक्तिशाली है, और यह सूर्य से लगभग 77 करोड़ 80 लाख किलोमीटर दूर है, और सूर्य का एक चक्कर लगाने में 11.86 वर्ष का समय लगता है जोकि लगभग 12 बर्ष के बराकर होता है, बृहस्पति का अक्षीय झुकाब केबल 3.13 डिग्री है जिस कारण इस पर कोई मौसम परिवर्तन नहीं होता है, यह बहुत तेज़ गति से घूर्णन करता है अपने अक्ष पर 09 घंटा 56 मिनट्स में एक बार घूमता है, इसका मतलब होता है कि इसका दिन लगभग 10 घंटे का ही होता है,
    अमर पाल सिंह ने बताया कि इसे आधुनिक खगोल विज्ञान में वैक्यूम क्लीनर भी कहा जाता है, जोकि पृथ्वी पर आने वाली धूमकेतुओं से भी बचाता है, बृहस्पति ग्रह जिसे गुरु भी कहा जाता है का हमारे देश में एक विशेष स्थान है क्योंकि भारत में कुम्भ मेला आयोजित होता है, कुम्भ का शाब्दिक अर्थ होता है कलश, कलश का मतलब होता है घड़ा, सुराही या पानी रखने वाला बर्तन और मेला का मतलब होता है कि जहां पर मिलन होता है, इस मेला के दौरान शिक्षा, प्रवचन, सामूहिक सभाएं, मनोरंजन और यह सामुदायिक वाणिज्यिक उत्सव भी हैं, बड़ी बात यह है कि यह त्यौहार दुनिया की सबसे बड़ी सभा माना जाता है, इस उत्सव को यूनेस्को की मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया गया है, खगोलीय गणनाओं के हिसाब से यह मेला मकर संक्रांति के दिन प्रारंभ होता है और जब एक ख़ास खगोलीय संयोजन घटित होता है तभी यह मेला घटित होता,
    महाकुंभ तब आयोजित होता है जब सूर्य मकर राशि में, चंद्रमा मेष राशि में और बृहस्पति कुंभ राशि में होता है, इस बार वर्ष 2025 में प्रयागराज में पूर्ण कुम्भ मेला आयोजित किया जा रहा है,
    महाकुम्भ मेला प्रयाग में प्रत्येक 144 वर्ष अर्थात 12 पूर्ण कुम्भ मेलों के बाद आयोजित होता है, महाकुम्भ मेला अगली बार 2157 में लगेगा, जब गुरु कुम्भ राशि में सूर्य मेष राशि में और चन्द्रमा धनु राशि में होता है तब कुम्भ मेला हरिद्वार में लगता है, और जब गुरु वृषभ राशि में सूर्य, चन्द्रमा मकर राशि में होते हैं तब प्रयागराज में कुम्भ मेला आयोजित होता है, और जब गुरु सिंह राशि में सूर्य,चन्द्रमा कर्क राशि में होते हैं तो नासिक में कुम्भ मेला आयोजित होता है और जब गुरु सिंह राशि में सूर्य, चन्द्रमा मेष राशि में होते हैं तो कुम्भ मेला उज्जैन में आयोजित होता है जब गुरु सिंह राशि में होते हैं तो त्रांबकेशर नासिक और उज्जैन में आयोजित होता है जिसे सिंहस्थ कुंभ मेला भी कहा जाता है,
    निष्कर्ष के तौर पर कह सकते हैं कि दोनों घटनाएँ, मकर संक्रांति और महाकुंभ, महत्वपूर्ण खगोलीय गतिविधियों के साथ संरेखित होती हैं जो मौसमी परिवर्तनों, मानव शरीर विज्ञान और पर्यावरण को प्रभावित करती हैं। जोकि हमारे पूर्वजों के विशिष्ट प्राचीन ज्ञान को भी दर्शाते हैं जो खगोलीय ज्ञान को स्वास्थ्य और कल्याण को बढ़ावा देने वाली प्रथाओं के साथ एकीकृत भी करता है ।

    https://youtube.com/shorts/CQRMp6a2CJw?si=Rj6J9fHTnu3ltpSi

  • लोक आस्था और असीम श्रद्धा के पावन पर्व पौष पूर्णिमा की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं

    लोक आस्था और असीम श्रद्धा के पावन पर्व पौष पूर्णिमा की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं

    आज से तीर्थराज प्रयाग में पवित्र गंगा स्नान एवं महाकुंभ का शुभारंभ हो रहा है। मां गंगा की अमृतधारा में करोड़ों श्रद्धालु डुबकी लगाएंगे। महाकुंभ हमारी हजारों साल पुरानी आस्था, धार्मिक संस्कृति और आध्यात्मिक परंपरा से जुड़ा मानवता का उत्सव है। करोड़ों देवताओं, श्रद्धालुओं और संतों को प्रणाम करते हुए देश के कल्याण की कामना करती हूं। प्रियंका गांधी वाड्रा