Category: हेल्थ
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एम्स गोरखपुर ने ‘स्टॉप द ब्लीड’ CNE सत्र आयोजित कर नर्सों की आपातकालीन प्रतिक्रिया क्षमता को सशक्त किया
गोरखपुर। आपातकालीन परिस्थितियों में नर्सों की त्वरित प्रतिक्रिया और ट्रॉमा देखभाल दक्षता को बढ़ाने के उद्देश्य से, AIIMS गोरखपुर के कॉलेज ऑफ नर्सिंग ने ‘स्टॉप द ब्लीड’ विषय पर सतत नर्सिंग शिक्षा (CNE) सत्र का आयोजन किया। यह कार्यक्रम संस्थान की नर्सिंग टीम को गंभीर रक्तस्राव को रोकने की आवश्यक तकनीकों में प्रशिक्षित करने के लिए आयोजित किया गया, ताकि जीवनरक्षक हस्तक्षेप को और प्रभावी बनाया जा सके।
AIIMS गोरखपुर की कार्यकारी निदेशक, मेजर जनरल (डॉ.) विभा दत्ता, एसएम (सेवानिवृत्त) के दूरदर्शी नेतृत्व और नर्सिंग डीन, प्रो. (डॉ.) संतोष कुमार शर्मा के मार्गदर्शन में आयोजित इस सत्र में लगभग 50 नर्सिंग पेशेवरों ने भाग लिया। प्रतिभागियों को गंभीर रक्तस्राव प्रबंधन के व्यावहारिक कौशल सिखाए गए, जो ट्रॉमा के मामलों में रोकी जा सकने वाली मृत्यु के प्रमुख कारणों में से एक है।
*नर्सों को सशक्त बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम*
मुख्य नर्सिंग अधिकारी (CNO) और प्रिंसिपल, डॉ. रेणुका के. ने इस प्रशिक्षण की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए कहा, “आपातकालीन स्थितियों में समय पर रक्तस्राव को रोकना अनगिनत जीवन बचा सकता है। नर्सों को इन महत्वपूर्ण जीवनरक्षक कौशलों से सुसज्जित करना हमारी प्राथमिकता है।”
इस हैंड्स-ऑन सत्र का संचालन श्री अरुण वर्गीस, असिस्टेंट प्रोफेसर, द्वारा किया गया। उन्होंने मूलेज-आधारित सिमुलेशन तकनीकों का उपयोग करते हुए वास्तविक आपातकालीन परिदृश्यों का निर्माण किया, जिससे प्रतिभागियों को वास्तविक परिस्थितियों में रक्तस्राव रोकने का अभ्यास करने का अवसर मिला। इस इंटरएक्टिव प्रशिक्षण ने नर्सिंग स्टाफ के आत्मविश्वास और ट्रॉमा देखभाल दक्षता में उल्लेखनीय वृद्धि की।
*निरंतर प्रशिक्षण से नर्सिंग क्षमताओं को मिलेगा नया आयाम*
AIIMS गोरखपुर का CNE सेल नर्सिंग पेशेवरों के सतत प्रशिक्षण और कौशल विकास के लिए प्रतिबद्ध है। इस तरह के नियमित प्रशिक्षण सत्र न केवल नर्सिंग स्टाफ की क्षमता को मजबूत करते हैं बल्कि मरीजों की सुरक्षा और बेहतर देखभाल सुनिश्चित करने में भी सहायक होते हैं।
सत्र में भाग लेने वाले नर्सिंग पेशेवरों ने इस गहन प्रशिक्षण को अत्यधिक प्रभावी बताया और कहा कि इससे आपातकालीन स्थितियों में उनकी त्वरित प्रतिक्रिया क्षमता में सुधार होगा। AIIMS गोरखपुर इस तरह की पहलों के माध्यम से स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता को और ऊंचे स्तर पर ले जाने के लिए निरंतर प्रयासरत है।
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मेडिसिन एवं फार्मेसी से युवा रोजगार एवं स्वव्यवसाय के प्रति जागरूक होंगे – जेपी चन्द्र
“राष्ट्रीय फार्मेसी शिक्षा दिवस पर जागरूकता कार्यक्रम”
गोला । उपनगर गोला के बनकटा में स्थित बाबा जीत नारायण चंद फार्मेसी कॉलेज में राष्ट्रीय फार्मेसी शिक्षा दिवस पर एक जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम का विषय फार्मेसी क्षेत्र में उद्यमिता और नवाचार – नवाचार केंद्रों और औषधीय स्टार्टअप को बढ़ावा देना रहा।कार्यक्रम का शुभारंभ अध्यक्षता कर रहे कालेज के प्रबंधक जे पी चंद ने मां सरस्वती के चित्र पर पुष्प अर्पित कर किया। कार्यक्रम के दौरान छात्रों को फार्मेसी उद्योग में नए व्यवसाय शुरू करने और नवाचार के अवसरों के बारे में जानकारी दी गई। कॉलेज के प्रबंधक श्री चंद ने अध्यनरत फार्मासिस्ट छात्र छात्रों की उज्जवल भविष्य की कामना करते हुए कहा कि जनपद के दक्षिणांचल में मेडिसिन एवं फार्मेसी जैसे कोर्स लाने के लिए हम प्रयासरत है।जिससे यहा का युवा रोजगार एवं स्वव्यवसाय कर सके और आम जनता को अच्छी स्वास्थ्य व्यवस्था व उच्च गुणवत्ता की शिक्षा प्राप्त हो सके।
कॉलेज के प्रधानाचार्य डॉ मनीष त्रिपाठी ने बताया कि उन्होंने दवा के डॉक्टर नाम से एक नवाचार शुरू किया है। जिसे उद्योग संवर्धन और आंतरिक व्यापार विभाग द्वारा मान्यता प्राप्त है। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार समाज को अच्छे चिकित्सकों की जरूरत होती है। उसी तरह योग्य फार्मेसी विशेषज्ञों की भी आवश्यकता है। उन्होंने फार्मेसी कानून 2015 और फार्मेसी प्रथा संशोधन 2021 के बारे में जानकारी दी और बताया कि यह कानून फार्मासिस्टों के कार्यों को और प्रभावी बनाने में मदद करते हैं। उन्होंने विद्यार्थियों को फार्मेसी क्षेत्र में स्टार्टअप और रोजगार के नए अवसरों के बारे में जागरूक किया। इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों को फार्मेसी के क्षेत्र में आगे बढ़ने और नए अवसरों का लाभ उठाने के लिए प्रेरित करना था।इस अवसर पर नंदलाल जायसवाल शंकर पांडे विनोद उमेश कुमार गुप्ता अजीत सिंह दुर्गेश यादव अभिषेक सहित अधिक संख्या में शिक्षक शिक्षिकाएं व छात्र छात्राएं मौजूद रहे -

एम्स गोरखपुर का ट्रॉमा एवं इमरजेंसी मेडिसिन विभाग बना जटिल ट्रॉमा सर्जरी का प्रमुख केंद्र
गोरखपुर। AIIMS गोरखपुर का ट्रॉमा एवं इमरजेंसी मेडिसिन विभाग जटिल ट्रॉमा सर्जरी के लिए एक उभरते हुए केंद्र के रूप में अपनी पहचान बना रहा है। हाल ही में, ट्रॉमा टीम ने ट्रॉमेटिक स्पाइनल इंजरी और ट्रॉमेटिक एस्टेटबलम इंजरी के मरीजों के लिए उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की है। टीम ने इन जटिल सर्जरी को सफलतापूर्वक अंजाम देते हुए 10 स्पाइनल इंजरी और 10 एस्टेटबलम फ्रैक्चर मामलों में शत-प्रतिशत सफलता प्राप्त की है।
AIIMS गोरखपुर की कार्यकारी निदेशक मेजर जनरल (डॉ.) प्रो. विभा दत्ता, एसएम (सेवानिवृत्त) ने इस उपलब्धि की सराहना करते हुए कहा, “AIIMS गोरखपुर का ट्रॉमा एवं इमरजेंसी मेडिसिन विभाग उच्चस्तरीय उपचार प्रदान करने के लिए लगातार प्रयासरत है। जटिल ट्रॉमा सर्जरी में मिली यह सफलता टीम की दक्षता और संस्थान की उत्कृष्टता को दर्शाती है। यह उपलब्धि पूरे क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है, जिससे मरीजों को अब बेहतरीन इलाज अपने ही शहर में उपलब्ध हो सकेगा।”
जटिल एस्टेटबलम फ्रैक्चर सर्जरी में विशेषज्ञता
एस्टेटबलम (hip socket) का फ्रैक्चर एक अत्यंत जटिल स्थिति होती है, जिसका उपचार विशेष विशेषज्ञता की मांग करता है। AIIMS गोरखपुर की ट्रॉमा टीम ने इस चुनौती को स्वीकार करते हुए इसे एक नए स्तर पर पहुंचाया है। **स्त्रोपा एप्रोच**, जिसमें सर्जरी पेट के रास्ते की जाती है, के माध्यम से सफल सर्जरी करके AIIMS गोरखपुर ने इस क्षेत्र में एक नई मिसाल कायम की है। यह एक जटिल लेकिन प्रभावी तकनीक है, जिसका मुख्य उद्देश्य कम से कम नुकसान के साथ हड्डी को पुनर्स्थापित करना और जोड़ की संरचना को संरक्षित रखना होता है।
एस्टेटबलम, यानी वह स्थान जहां जांघ की हड्डी (फीमर) और कूल्हे की हड्डी (पेल्विस) आपस में जुड़ती हैं, जब टूट जाता है तो इसे एस्टेटबलम फ्रैक्चर कहते हैं। यह फ्रैक्चर अक्सर भारी दुर्घटनाओं, गिरने या उच्च ऊर्जा वाले ट्रॉमा के कारण होता है। चूंकि यह शरीर का एक गहरा भाग होता है, इसलिए इसके ऑपरेशन के लिए विशेष तकनीक और सावधानी की आवश्यकता होती है।
इससे पहले, इस तरह के जटिल मामलों को उपचार के लिए लखनऊ या वाराणसी भेजना पड़ता था, लेकिन अब AIIMS गोरखपुर में यह सुविधा उपलब्ध होने से मरीजों को न केवल बेहतरीन इलाज मिल रहा है, बल्कि उनकी यात्रा से जुड़ी कठिनाइयां और वित्तीय बोझ भी कम हुआ है।
ट्रॉमेटिक स्पाइनल इंजरी सर्जरी में सफलता
स्पाइनल इंजरी के मामलों में त्वरित सर्जरी मरीजों की रिकवरी को बहुत अधिक प्रभावित करती है। AIIMS गोरखपुर की ट्रॉमा टीम ने एक विशेष प्रोटोकॉल विकसित किया है, जिसके तहत स्पाइनल इंजरी वाले मरीजों को प्राथमिकता देते हुए तेजी से ऑपरेशन किया जाता है। अब तक 10 जटिल स्पाइनल सर्जरी सफलतापूर्वक पूरी की जा चुकी हैं, जिससे मरीजों को शीघ्र उपचार मिल सका और उनकी रिकवरी की संभावनाएं कई गुना बढ़ गईं।
AIIMS गोरखपुर: ट्रॉमा केयर में एक नई पहचान
AIIMS गोरखपुर का ट्रॉमा एवं इमरजेंसी मेडिसिन विभाग लगातार नई ऊंचाइयों को छू रहा है। जटिल सर्जरी की ये सफलताएं न केवल इस संस्थान की विशेषज्ञता को दर्शाती हैं, बल्कि यह भी साबित करती हैं कि उत्तर प्रदेश के पूर्वी हिस्से में अब ट्रॉमा मरीजों को उच्च स्तरीय इलाज के लिए अन्य शहरों में जाने की आवश्यकता नहीं होगी।
AIIMS गोरखपुर की ट्रॉमा टीम इस क्षेत्र में अपनी सेवाओं को और विस्तारित करने के लिए प्रतिबद्ध है, जिससे भविष्य में और अधिक मरीजों को जीवनरक्षक उपचार मिल सकेगा।
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एनवीएचसीपी द्वारा वायरल हेपेटाइटिस उन्मूलन हेतु सफल प्रशिक्षण सम्पन्न
गोरखपुर, 5 मार्च 2025। राष्ट्रीय वायरल हेपेटाइटिस नियंत्रण कार्यक्रम (NVHCP) के तहत एम्स गोरखपुर में नोडल/मेडिकल अधिकारियों के लिए तीन दिवसीय व्यापक प्रशिक्षण कार्यक्रम (3-5 मार्च) का सफल आयोजन किया गया। सामुदायिक एवं परिवार चिकित्सा विभाग और गैस्ट्रोएंटेरोलॉजी विभाग द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम का उद्देश्य हेपेटाइटिस बी और सी के प्रभावी निदान, उपचार, और प्रबंधन में चिकित्सा अधिकारियों की क्षमता विकसित करना था। यह प्रशिक्षण राष्ट्रीय स्तर पर वायरल हेपेटाइटिस के बोझ को कम करने और 2030 तक इसके उन्मूलन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था।
“कार्यक्रम का उद्घाटन एवं प्रारंभिक सत्र”
कार्यक्रम की शुरुआत डॉ. अनिल कोपारकर (अतिरिक्त प्रोफेसर, सामुदायिक एवं परिवार चिकित्सा विभाग) और डॉ. सौरभ केडिया (अतिरिक्त प्रोफेसर, गैस्ट्रोएंटेरोलॉजी विभाग) द्वारा उद्घाटन संबोधन से हुई। डॉ. विकासेंदु अग्रवाल, राज्य नोडल अधिकारी, एनवीएचसीपी उत्तर प्रदेश ने वर्चुअल माध्यम से जुड़कर प्रशिक्षण के उद्देश्यों को स्पष्ट किया, जबकि एम्स गोरखपुर के चिकित्सा अधीक्षक प्रो. अजय भारती और डीन (अकादमिक) डॉ. महिमा मित्तल ने कार्यक्रम की महत्ता पर प्रकाश डाला।
इसके बाद, परिचय एवं आइस-ब्रेकिंग सत्र आयोजित किया गया, जिसमें प्रतिभागियों ने एक-दूसरे से परिचय प्राप्त किया और प्रशिक्षण के नियम निर्धारित किए।
“प्रशिक्षण के प्रमुख विषय”
तीन दिवसीय प्रशिक्षण में हेपेटाइटिस बी और सी के व्यापक पहलुओं को कवर किया गया:
– पहले दिन एनवीएचसीपी की रूपरेखा, वायरल हेपेटाइटिस की वैश्विक और राष्ट्रीय स्थिति, लिवर की संरचना एवं कार्यप्रणाली, संक्रमण और रोकथाम रणनीतियाँ, तथा हेपेटाइटिस बी टीकाकरण पर गहन चर्चा हुई।– दूसरे दिन हेपेटाइटिस बी और सी के परीक्षण,
सीरोलॉजिकल मार्कर्स की व्याख्या, तीव्र (acute) एवं दीर्घकालिक (chronic) हेपेटाइटिस के बीच अंतर, नैदानिक प्रबंधन एवं उपचार रणनीतियाँ पर विशेषज्ञ सत्र हुए।
– तीसरे दिन विशेष परिस्थितियों में हेपेटाइटिस का
प्रबंधन, MIS-NVHCP पोर्टल पर डेटा प्रबंधन, उपचार स्थलों का चयन, सेवाओं का संगठन, वित्तीय योजना, और कार्यक्रम की निगरानी एवं मूल्यांकन (M&E) रूपरेखा जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा हुई।
विशेषज्ञों द्वारा सत्र
प्रशिक्षण के दौरान कई प्रतिष्ठित विशेषज्ञों ने अपने व्याख्यान दिए:
– डॉ. प्रशांत ठाकुर, डॉ. आलोक सिंह, डॉ. दावेश यादव और डॉ. सौरभ केडिया ने हेपेटाइटिस बी और सी के परीक्षण, निदान, और उपचार पर गहन चर्चा की।
– डॉ प्रो. राजकिशोर सिंह ने गर्भावस्था, किडनी फेल्योर, HIV और HCV सह-संक्रमण, सिरोसिस और लिवर कैंसर से पीड़ित मरीजों में हेपेटाइटिस बी के उपचार की रणनीतियाँ प्रस्तुत कीं।– डॉ. विकासेंदु अग्रवाल और डॉ. अभिषेक यादव ने वर्चुअल सत्र के माध्यम से एनवीएचसीपी के वित्तीय प्रबंधन और निगरानी प्रणाली को विस्तार से समझाया।
सत्रों की व्यावहारिकता और समापन समारोह
प्रशिक्षण को ऑनलाइन एवं ऑफलाइन इंटरैक्टिव सत्रों, केस स्टडीज और लाइव डेमोंस्ट्रेशन के माध्यम से अधिक प्रभावी बनाया गया। अंत में प्रश्नोत्तर सत्र, पोस्ट-टेस्ट, और फीडबैक सत्र आयोजित किए गए। समापन समारोह में प्रतिभागियों को प्रमाणपत्र वितरित किए गए।
कार्यक्रम की सराहना एवं बधाई
एम्स गोरखपुर की कार्यकारी निदेशक मेजर जनरल प्रो. डॉ. विभा दत्ता ने इस सफल प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए आयोजन समिति, संकाय सदस्यों और प्रतिभागियों को बधाई दी। उन्होंने एनवीएचसीपी के लक्ष्य को साकार करने में ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रमों की भूमिका को रेखांकित किया और प्रशिक्षित मेडिकल अधिकारियों से अपने-अपने क्षेत्रों में ज्ञान का प्रसार कर हेपेटाइटिस उन्मूलन में योगदान देने का आह्वान किया।
हेपेटाइटिस उन्मूलन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम
यह प्रशिक्षण NVHCP के लक्ष्य – “2030 तक वायरल हेपेटाइटिस को सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या के रूप में समाप्त करने” की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास था। यह न केवल स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं की क्षमता निर्माण में सहायक होगा, बल्कि सामुदायिक स्तर पर जागरूकता बढ़ाने, प्रारंभिक पहचान, और समय पर उपचार को भी प्रोत्साहित करेगा।
एनवीएचसीपी का यह मिशन सस्ती और सुलभ चिकित्सा सेवाओं के माध्यम से वायरल हेपेटाइटिस के बोझ को कम करने और स्वस्थ भारत की दिशा में कदम बढ़ाने का संकल्प है।
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टी बी मुक्त भारत अभियान मे रेडक्रास की अहम भूमिका:आनंदी बेन पटेल
“टी बी मुक्त भारत अभियान मे रेडक्रास की अहम भूमिका:आनंदी बेन पटे”
“महामहिम ने रक्तदान प्रभारी ज्ञानेन्द्र ओझा सहित 8 को सामाजिक कार्यों के लिए किया सम्मानित”
गोरखपुर। टी बी मुक्त भारत अभियान मे प्रबुद्ध वर्ग की नैतिक जिम्मेदारी तो है ही वहीं इस लोक कल्याण कार्य मे रेडक्रास की अहम जिम्मेदारी है।
महा. राज्यपाल आनंदी बेन पटेल ने एनेक्सी सभागार मे रेडक्रास गोरखपुर के तत्वाधान मे 200 क्षय रोग पीड़ितों मरीजों को पोषण पोटली वितरण एवं प्रबुद्ध वर्ग से संवाद कार्यक्रम सम्बोधित करते उन्होंने कही।
उन्होंने नशा मुक्ति अभियान के साथ ही टी बी मुक्त अभियान को और प्रभावी ढंग से आम जनता में जागरुकता पैदा करे,शत प्रतिशत गोद लिए जाने के बाबत उन्होंने आह्वान किया।
राज्यपाल ने 200 टीबी मरीजों को पोषण पोटली वितरित की टी बी मरीजों गोद लेने वाले 11 लोगों सम्मान पत्र देकर सम्मानित किया।महासचिव डॉ हेमा बिन्दु नायक ने रेडक्रास के दायित्व के बाबत विस्तार से चर्चा कर रेडक्रास वॉलंटियर्स का उत्साहवर्धन किया।
सचिव अजय प्रताप सिंह ने रेडक्रास गोरखपुर की प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत किया एवं भविष्य की योजनाओं के राज्यपाल महोदया बिंदु वार प्रस्तुत की गयी,
उपसभापति राज्य शाखा अखिलेन्द्र शाही ने आभार प्रकट कर सभी धन्यवाद ज्ञापित किया।गोरखपुर रेडक्रॉस के सभापति शिवेन्द्र विक्रम सिंह ने महामहिम राज्यपाल का स्वागत किया।
कार्यक्रम का संचालन डॉ दिनेश मणि त्रिपाठी ने किया।रेडक्रास की तरफ 51 सेट पुस्तक बच्चों के लिए राज्यपाल को संरक्षक सदस्य राम जन्म सिंह भेट किया।
महामहिम राज्यपाल आनंदी बेन पटेल ने रेडक्रॉस के रक्तदान प्रभारी ज्ञानेन्द्र ओझा सहित 5 अन्य को उनके टी बी मुक्त अभियान, रक्तदान आदि सामाजिक कार्यों के लिए सम्मानित किया।
कार्यक्रम में रेडक्रास के पदाधिकारी विशाल जायसवाल, नागेन्द्र प्रताप सिंह मुन्ना, डॉ भानु प्रताप सिंह, डॉ अवधेश शुक्ल, डॉ प्रियंका यादव, ज्ञानेन्द्र ओझा, संगीता राय, लक्ष्मी प्रजापति, आदित्य निगम इमरान एहसान डॉ राकेश कुमार उमेश चौधरी, राकेश सिंह सहित भारी तादात मे रेडक्रास वॉलंटियर उपस्थित रहे। -

12 वर्षों से बंद मरीज के मुंह को 3 घंटे चले ऑपरेशन से खोला गया
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), गोरखपुर के दंत रोग विभाग ने एक जटिल सर्जरी को सफलतापूर्वक अंजाम दिया, जिससे 12 वर्षों से बंद मरीज का मुंह फिर से खुल सका। इस ऑपरेशन को ओरल एंड मैक्सिलोफेशियल सर्जन डॉ. शैलेश कुमार एवं उनकी टीम ने पूरा किया।
गोरखपुर ज़िले के बेलघाट निवासी 22 वर्षीय युवती पिछले 12 वर्षों से कान के घाव एवं उसके ऑपरेशन के बाद जटिलता से ग्रसित थी। धीरे-धीरे उसके सिर और निचले जबड़े की हड्डी आपस में जुड़ गई, जिससे वह मुंह खोलने में असमर्थ हो गई। परिणामस्वरूप, वह केवल तरल आहार पर निर्भर थी और कुपोषण का शिकार हो गई थी। कई अस्पतालों और डॉक्टरों से परामर्श के बाद भी राहत न मिलने पर युवती के पिता ने एम्स गोरखपुर में दंत रोग विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. शैलेश कुमार से संपर्क किया।
“जटिल ऑपरेशन को 3 घंटे में किया गया पूरा”
जांच और स्कैन के बाद पता चला कि मरीज के खोपड़ी की हड्डी और निचले जबड़े की हड्डी पूरी तरह से जुड़ चुकी थी। सामान्यत: ऐसे ऑपरेशन में 5-6 घंटे का समय लगता है, लेकिन एक नई तकनीक अपनाकर डॉक्टरों ने केवल 3 घंटे में सर्जरी को सफलतापूर्वक पूरा कर लिया।
ऑपरेशन के दौरान चेहरे की नसों को सुरक्षित रखते हुए जुड़ी हुई हड्डी को निकाला गया। हड्डी दोबारा न जुड़े, इसके लिए मरीज के सिर के अंदर से फैट का एक हिस्सा काटकर जबड़े के जॉइंट में डाला गया। इस प्रक्रिया को “इंटरपोजीशनल आर्थोप्लास्टी” कहा जाता है।
“बेहोशी की प्रक्रिया भी थी चुनौतीपूर्ण”
ऐसे मामलों में बेहोशी देना एक बड़ी चुनौती होती है, क्योंकि मरीज का मुंह पूरी तरह से बंद था। इस कारण निश्चेतना विभाग की टीम ने नाक के जरिए फाइबर ऑप्टिक स्वास नली डालकर बेहोशी देने की प्रक्रिया पूरी की।
“एम्स निदेशक एवं ED ने की सराहना”
एम्स निदेशक एवं सीईओ मेजर जनरल (डॉ.) विभा दत्ता को दंत रोग विभाग द्वारा इस विशेष ऑपरेशन की जानकारी दी गई। उन्होंने डॉ. शैलेश कुमार एवं उनकी टीम को बधाई देते हुए कहा कि यह एम्स गोरखपुर के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। उन्होंने यह भी कहा कि एम्स गोरखपुर में अब इस तरह की जटिल सर्जरी संभव हो गई है, जिससे मरीजों को दिल्ली या लखनऊ जाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।
दंत रोग विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर डॉ. श्रीनिवास ने पूरी टीम को इस जटिल ऑपरेशन की सफलता पर बधाई दी और इसे विभाग के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया।
“ऑपरेशन टीम में ये विशेषज्ञ रहे शामिल”
इस जटिल ऑपरेशन को सफलतापूर्वक पूरा करने वाली टीम में शामिल थे:
– मैक्सिलोफेशियल सर्जन: डॉ. शैलेश कुमार
– सहयोगी सर्जन: डॉ. प्रवीण सिंह (सीनियर रेजिडेंट), डॉ. सौरभ सिंह (जूनियर रेजिडेंट)
– निश्चेतना विभाग: प्रोफेसर डॉ. संतोष कुमार शर्मा, डॉ. शफाक (सीनियर रेजिडेंट), डॉ. अभिषेक (एकेडमिक जूनियर रेजिडेंट)“भविष्य के लिए महत्वपूर्ण संदेश”
डॉ. शैलेश कुमार ने बताया कि सही समय पर उचित इलाज मिलने से इस तरह के जटिल ऑपरेशन से बचा जा सकता है। उन्होंने आम जनता से अपील की कि चेहरे की किसी भी चोट या समस्या को नज़रअंदाज़ न करें और हमेशा ओरल एंड मैक्सिलोफेशियल सर्जन से परामर्श लें, क्योंकि वे ऐसे मामलों के सुपरस्पेशलिस्ट होते हैं।
ऑपरेशन के बाद मरीज की हालत स्थिर है, और वह एम्स गोरखपुर के ओएमएफएस वार्ड में डॉक्टरों की निगरानी में है।इस सर्जरी से युवती के चेहरे की विकृति, साँस की समस्या (OSA) एवं मानसिक दुष्प्रभावों को रोकने में मदद मिली है।
यह सफल ऑपरेशन न केवल एम्स गोरखपुर के लिए एक बड़ी उपलब्धि है, बल्कि इस क्षेत्र के मरीजों के लिए भी एक आशा की किरण साबित हुआ है।
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महिलाओं के स्वास्थ्य एवं जागरूकता शिविर का सफल आयोजन
बांसगांव, 28 फरवरी 2025: महिलाओं के स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता बढ़ाने और आवश्यक चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, बांसगांव में एम्स गोरखपुर के प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग के तत्वावधान में एक विशेष स्वास्थ्य शिविर का आयोजन किया गया।
इस शिविर में विभागाध्यक्ष डॉ. शिखा सेठ एवं एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. प्रीति प्रियदर्शनी ने भाग लिया और महिलाओं को स्वास्थ्य संबंधी महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान की। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के चिकित्सा अधिकारी डॉ. के. एम. अग्रवाल ने इस शिविर के सफल आयोजन में अहम भूमिका निभाई।
महिलाओं को मिली निःशुल्क स्वास्थ्य जांच एवं परामर्श ,
शिविर के दौरान गर्भवती महिलाओं एवं अन्य स्वास्थ्य समस्याओं से ग्रसित महिलाओं की निःशुल्क स्वास्थ्य जांच की गई। उन्हें गर्भावस्था के दौरान संभावित जटिलताओं, उनके लक्षणों की पहचान और समय पर उपचार के महत्व के बारे में जागरूक किया गया।
आशा कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण ,
महिलाओं की बेहतर देखभाल सुनिश्चित करने के लिए आशा स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को गर्भावस्था के दौरान उच्च जोखिम वाली स्थितियों की पहचान एवं प्रबंधन के लिए विशेष प्रशिक्षण दिया गया। साथ ही, गर्भाशय ग्रीवा (सर्वाइकल) कैंसर की समय पर जांच एवं रोकथाम के लिए महिलाओं को प्रेरित किया गया।
एम्स गोरखपुर की निदेशक एवं सीईओ मेजर जनरल (डॉ.) विभा दत्ता ने इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि वह हमेशा ऐसे जागरूकता कार्यक्रमों को बढ़ावा देने के लिए तत्पर रहती हैं, क्योंकि ये जनता के हित में बेहद लाभकारी होते हैं। उन्होंने आगे कहा कि एम्स गोरखपुर का उद्देश्य केवल उन्नत चिकित्सा सेवाएं प्रदान करना ही नहीं, बल्कि समुदाय में स्वास्थ्य जागरूकता फैलाना भी है।
महिलाओं ने लिया लाभ, जागरूकता को मिला बढ़ावा ,
इस स्वास्थ्य शिविर में बड़ी संख्या में महिलाओं ने भाग लिया और चिकित्सा सेवाओं का लाभ उठाया। यह आयोजन गर्भवती महिलाओं एवं अन्य जरूरतमंद महिलाओं के स्वास्थ्य संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ। एम्स गोरखपुर भविष्य में भी ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन करता रहेगा, जिससे समुदाय में गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं और जागरूकता बढ़ाई जा सके।
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बाल टीबी रोगियों को खोजने में मददगार बनेंगी स्टॉफ नर्स
बाल टीबी रोगियों को खोजने में मददगार बनेंगी स्टॉफ नर्स ,
जिले के सरकारी और निजी अस्पतालों के स्टॉफ नर्स को मिला प्रशिक्षण ,

गोरखपुर। जिले के सरकारी और निजी अस्पतालों पर तैनात स्टॉफ नर्सेज बाल टीबी रोगियों को खोजने में मददगार बनेंगी। इसके लिए उन्हें वर्ल्ड हेल्थ पार्टनर संस्था के सहयोग से जिला क्षय रोग केंद्र में प्रशिक्षित किया गया है। यह जानकारी जिला क्षय उन्मूलन अधिकारी डॉ गणेश यादव ने दी। उन्होंने बताया कि स्टॉफ नर्सेज को बच्चों में टीबी के लक्षणों की पहचान, उपचार, टीबी जांच के महत्व और प्रक्रिया के बारे में जानकारी दी गई।
डीटीओ डॉ यादव ने बताया कि मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ आशुतोष कुमार दूबे के दिशा निर्देशन में मास्टर ट्रेनर डॉ अरविंद उपाध्याय और डॉ सुशील कुमार द्वारा सभी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और कई निजी अस्पतालों के नर्सेज को प्रशिक्षित किया गया। उन्हें चौदह वर्ष तक के बच्चों में गैस्ट्रिक एस्प्रेट एवं इन्ड्स स्पूटम की प्रक्रिया द्वारा सैम्पल निकालने की विधि के बारे में बताया गया है। उप जिला क्षय उन्मूलन अधिकारी डॉ विराट स्वरूप श्रीवास्तव, जिला परियोजना प्रबंधक संदीप कौशल, डब्ल्यूएचपी के समन्वयक रामेंद्र श्रीवास्तव, आकाश गोविंद राव, अनिता सिंह, पीपीएम समन्वयक अभय नारायण मिश्र, मिर्जा आफताब बेग और डीपीसी धर्मवीर प्रताप सिंह ने प्रशिक्षण में विशेष योगदान दिया।
डॉ यादव ने बताया कि जिले में चल रहे 100 दिवसीय टीबी उन्मूलन अभियान के दौरान जनजागरूकता और प्रशिक्षण संबंधी विविध गतिविधियों का आयोजन किया जा रहा है। इनके साथ ही नये टीबी मरीज भी खोजे जा रहे हैं। अभियान के दौरान जिले में 4163 नये मरीज ढूंढे जा चुके हैं। जिले में इस समय डीआर टीबी के 391 उपचाराधीन और डीएस टीबी के 9904 उपचाराधीन मरीज हैं। उन्होंने लोगों से अपील की कि अगर दो सप्ताह से अधिक की खांसी, पसीने के साथ बुखार, तेजी से वजन घटने, भूख न लगने, बलगम में खून आने, गले में गिल्टी जैसे लक्षण हों तो नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र पर टीबी की जांच अवश्य करवाएं। टीबी की शीघ्र जांच, पहचान और उपचार से यह बीमारी पूरी तरह से ठीक हो जाती है। बच्चों में इसकी समय से पहचान बेहद जरूरी है।
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भारतीय सोसाइटी फॉर प्रिसीजन मेडिसिन एंड मॉलीक्यूलर मेडिसिन का प्रथम राष्ट्रीय सम्मेलन
भारतीय सोसाइटी फॉर प्रिसीजन मेडिसिन एंड मॉलीक्यूलर मेडिसिन का प्रथम राष्ट्रीय सम्मेलन ,
1-2 मार्च 2025, एम्स गोरखपुर। भारतीय सोसाइटी फॉर प्रिसीजन मेडिसिन एंड मॉलीक्यूलर मेडिसिन (ISPMMM) ने 1 और 2 मार्च 2025 को एम्स गोरखपुर में अपने प्रथम राष्ट्रीय सम्मेलन का सफल आयोजन किया। यह आयोजन प्रिसीजन मेडिसिन और मॉलीक्यूलर अनुसंधान को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि साबित हुआ। इस ऐतिहासिक सम्मेलन में भारत और विदेशों के प्रसिद्ध वैज्ञानिकों और चिकित्सकों ने भाग लिया और प्रिसीजन मेडिसिन, मॉलीक्यूलर डायग्नोस्टिक्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), जीनोमिक्स, प्रोटीओमिक्स, नैनोमेडिसिन और उन्नत चिकित्सीय रणनीतियों** की भूमिका पर गहन चर्चा की, जो रोगों के प्रबंधन में क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकती हैं।
## **उद्घाटन समारोह एवं प्रमुख अतिथि**
सम्मेलन की शुरुआत **मेजर जनरल डॉ. विभा दत्ता, कार्यकारी निदेशक, एम्स गोरखपुर** के नेतृत्व में हुई। उन्होंने अपने उद्घाटन भाषण में **प्रिसीजन मेडिसिन को मुख्यधारा की चिकित्सा पद्धति में शामिल करने के महत्व** पर प्रकाश डाला। इसके बाद, **अटल बिहारी वाजपेयी मेडिकल यूनिवर्सिटी, लखनऊ के कुलपति प्रो. संजीव मिश्रा** ने **मल्टीडिसिप्लिनरी सहयोग** को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर बल दिया, जिससे **भारत में मॉलीक्यूलर मेडिसिन के विकास को गति** मिल सके।**सम्मेलन अध्यक्ष एवं एम्स गोरखपुर के बायोकैमिस्ट्री विभागाध्यक्ष डॉ. आकाश बंसल** ने अपने संबोधन में **मॉलीक्यूलर मेडिसिन की बढ़ती शाखाओं और उनके माध्यम से अब तक असाध्य माने जाने वाले रोगों के निश्चित इलाज की संभावनाओं** पर विस्तृत चर्चा की।
सम्मेलन में कई प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों और चिकित्सकों ने भाग लिया, जिनमें प्रमुख रूप से शामिल थे:
– **प्रो. आलोक धवन, निदेशक, सेंटर फॉर बायोमेडिकल रिसर्च (CBMR), लखनऊ**
– **प्रो. सुनीत सिंह, निदेशक, ACBR, दिल्ली विश्वविद्यालय**
– **प्रो. जगत राकेश कवार, एम्स भोपाल**
– **वैज्ञानिक एस.के. रथ, सेंट्रल ड्रग रिसर्च इंस्टीट्यूट (CDRI), लखनऊ**
– **प्रो. जय राम रावतानी, एसएनएम मेडिकल कॉलेज, जोधपुर**
– **प्रो. निमा चंदा, एसजीटी यूनिवर्सिटी**
– **डॉ. इन्ना मिनिस्कोवा, अंतर्राष्ट्रीय एंडोक्राइनोलॉजिस्ट, मॉस्को सरकार, रूस**
– **डॉ. स्वेतलाना शोकुर, रूसी वैज्ञानिक**—
## **वैज्ञानिक सत्र एवं प्रमुख चर्चाएँ**
इस सम्मेलन में **प्रिसीजन मेडिसिन के उभरते रुझानों** पर विशेष ध्यान केंद्रित किया गया, जिसमें **कैंसर, मधुमेह, नैनोमेडिसिन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, जीनोमिक्स और प्रोटीओमिक्स** जैसे विषय शामिल थे।### **कैंसर और नैनोमेडिसिन**
– **डॉ. इन्ना मिनिस्कोवा और डॉ. स्वेतलाना शोकुर (रूस)** ने **एंडोक्राइन विकारों और कैंसर प्रगति के आणविक तंत्रों** पर अपना शोध प्रस्तुत किया। उन्होंने **जीनोमिक बायोमार्कर्स** की भूमिका को प्रारंभिक निदान और उपचार में उपयोगी बताया।
– **प्रो. आलोक धवन** ने **नैनोमेडिसिन के ऑन्कोलॉजी में अनुप्रयोगों** पर चर्चा की और बताया कि **नैनोपार्टिकल-आधारित दवा वितरण प्रणाली** कैसे **दवा की विषाक्तता को कम** कर सकती है और उपचार की प्रभावशीलता को बढ़ा सकती है।### **मधुमेह और मेटाबॉलिक विकार**
– **प्रो. सुनीत सिंह** ने **मधुमेह रोगियों के जीनोमिक एवं प्रोटीओमिक प्रोफाइलिंग** पर चर्चा की और बताया कि **प्रिसीजन मेडिसिन के माध्यम से रोग की पूर्वसूचना प्राप्त कर व्यक्तिगत उपचार रणनीति बनाई जा सकती है**।
– **प्रो. जगत राकेश कवार** ने **AI-संचालित एल्गोरिदम** की भूमिका पर चर्चा की, जो **मधुमेह रोगियों के डेटा का विश्लेषण करके ग्लाइसेमिक नियंत्रण में मदद कर सकते हैं**।### **आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और जीनोमिक्स**
– **वैज्ञानिक एस.के. रथ (CDRI, लखनऊ)** ने बताया कि **AI और डीप लर्निंग मॉडल** जीनोमिक अध्ययन में क्रांति ला रहे हैं, जिससे **रोगों की त्वरित पहचान और उपचार का निजीकरण संभव** हो रहा है।
– **प्रो. जय राम रावतानी (SNM मेडिकल कॉलेज, जोधपुर)** ने **CRISPR जीन-संपादन तकनीक** पर चर्चा की, जो **आनुवंशिक विकारों के सटीक उपचार के लिए अत्यधिक प्रभावी साबित हो रही है**।### **मॉलीक्यूलर मेडिसिन और ऑटोइम्यून रोगों की चिकित्सा**
– **डॉ. सुनील कुमार गुप्ता, प्रमुख, त्वचा विभाग**, ने **मॉलीक्यूलर मेडिसिन की भूमिका ऑटोइम्यून रोगों के इलाज में** बताई। उन्होंने बताया कि **जीनोमिक और प्रोटीओमिक शोध** से ऑटोइम्यून विकारों की बेहतर समझ विकसित हो रही है, जिससे अधिक प्रभावी और लक्षित उपचार विकसित किए जा रहे हैं।
– **संयुक्त आयोजन सचिव डॉ. रुचिका अग्रवाल और डॉ. मोहन राज** ने **मॉलीक्यूलर मेडिसिन के भविष्य** पर चर्चा की और बताया कि यह क्षेत्र **अनुसंधान और नैदानिक अनुप्रयोगों के बीच की खाई को पाटने में मदद कर रहा है**।—
## **आयोजन सचिव का दृष्टिकोण**
**डॉ. शैलेन्द्र द्विवेदी, आयोजन सचिव, ISPMMM**, ने कहा कि **प्रिसीजन मेडिसिन चिकित्सा क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने के लिए तैयार है, क्योंकि ‘एक ही इलाज सभी पर लागू नहीं हो सकता’**। उन्होंने इस सोसाइटी की प्रतिबद्धता दोहराई कि **चिकित्सा को व्यक्तिगत जेनेटिक एवं मॉलीक्यूलर प्रोफाइल के आधार पर अनुकूलित किया जाना चाहिए**।—
## **सम्मेलन संचालन और समन्वय**
इस सम्मेलन का संचालन एवं मंच संचालन **डॉ. दीपिका और डॉ. जसलीन कौर (विभाग: पैथोलॉजी)** द्वारा किया गया। उनके प्रयासों से सम्मेलन **सुगठित और प्रभावी** बना।—
## **निष्कर्ष और भविष्य की दिशा**
इस **प्रथम राष्ट्रीय सम्मेलन** ने **प्रिसीजन मेडिसिन और मॉलीक्यूलर मेडिसिन में अनुसंधान, सहयोग और नीति निर्माण के लिए एक ठोस आधार** तैयार किया।सम्मेलन ने **अधिक अनुसंधान वित्तपोषण, बहुविषयक सहयोग और प्रिसीजन मेडिसिन को राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीतियों में एकीकृत करने की आवश्यकता** को उजागर किया।
**भारतीय सोसाइटी फॉर प्रिसीजन मेडिसिन एंड मॉलीक्यूलर मेडिसिन** ने एक **नई मानक स्थापना की**, जिससे **भारत इस क्षेत्र में अग्रणी बना रहे**। सम्मेलन ने इस प्रतिबद्धता को दोहराया कि **अनुसंधान और नैदानिक चिकित्सा के बीच की दूरी को कम कर रोगियों के लिए अधिक प्रभावी और व्यक्तिगत उपचार सुनिश्चित किए जाएंगे।










